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मऊगंज में भू-माफियाओं का आतंक: हर्रहा गांव की जमीन और प्रशासन की चुप्पी पर विस्तृत रिपोर्ट

मऊगंज में भू-माफियाओं का आतंक: हर्रहा गांव की जमीन और प्रशासन की चुप्पी पर विस्तृत रिपोर्ट

मऊगंज में भू-माफियाओं का आतंक: हर्रहा गांव की जमीन और प्रशासन की चुप्पी पर विस्तृत रिपोर्ट

रिपोर्ट: लवकेश सिंह | मऊगंज

मऊगंज में भू-माफियाओं का आतंक: अक्सर कहा जाता है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं. लेकिन मऊगंज जिले के हर्रहा गांव में ऐसा प्रतीत होता है कि माफियाओं के रसूख और प्रशासनिक लापरवाही ने इन हाथों को बांध दिया है.

यहां अवैध खनन ने स्थानीय आदिवासी समुदाय के जीवन को संकट में डाल दिया है. जबकि एक पीड़ित महिला न्याय के लिए अदालत के चक्कर लगा रही है, वहीं खनिज विभाग के अधिकारी जांच के नाम पर ऐसा अभिनय कर रहे हैं जो सवाल खड़े करता है.

यह मामला केवल अवैध उत्खनन का नहीं, बल्कि संरक्षण, प्रशासनिक उदासीनता और एक पूरे सिस्टम की विफलता का है.


हर्रहा गांव: जहां जमीन ‘मौत की खाई’ बन गई है

हर्रहा गांव (खसरा नंबर 8/13) की कहानी विकास के नाम पर विनाश की है. शिकायतकर्ता ललिता मौर्या के अनुसार, उनकी जमीन पर बिना किसी पट्टा (लीज) या अनुमति के 50 फीट से अधिक गहरे गड्ढे खोदे गए हैं. इन्हें ‘मौत की खाइयां’ कहना गलत नहीं होगा.

ललिता मौर्या का आरोप है कि उनके पति की मृत्यु के बाद, भू-माफिया उपेंद्र सिंह और समरबहादुर सिंह ने उनकी डेढ़ एकड़ जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया. इसके बाद बिना कोई किराया दिए, जमीन का अंधाधुंध उत्खनन शुरू कर दिया गया.

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिस जमीन पर सालों से अवैध खनन हो रहा है, अब उसी जमीन को कानूनी रूप से खदान के रूप में स्वीकृत कराने के लिए आवेदन दिया गया है. यह एक स्पष्ट रणनीति दिखती है – पहले चोरी, फिर उसी पर कानूनी दावा.


प्रभाव: पलायन, दरारें और एक डूटता समुदाय

अवैध खनन, विशेष रूप से अवैध ब्लास्टिंग (विस्फोट) के परिणाम विनाशकारी रहे हैं.

  1. आवासीय संकट: गांव के कई घरों में गहरी दरारें आ गई हैं, जो संरचनात्मक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा हैं.

  2. शिक्षा पर प्रहार: स्थानीय सरकारी स्कूल की इमारत भी इसकी चपेट में आई है और अब खंडहर में तबदील हो रही है.

  3. जबरन पलायन: सुरक्षा और जीविका के संकट के चलते, कई आदिवासी परिवार अपने पुश्तैनी घर छोड़कर पलायन करने को मजबूर हैं.

  4. पर्यावरणीय क्षति: भूजल स्तर और मिट्टी की उर्वरता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ने की आशंका है.

स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी इस “गंदे खेल” को स्वीकार किया है. लेकिन चिंता की बात यह है कि इसके बावजूद खनिज प्रशासन गहरी नींद में सोया प्रतीत होता है.

 

प्रशासन का ‘अभिनय’: “हमें नहीं पता जमीन किसकी है!”

जब मामला न्यायालय पहुंचा और मीडिया की सुर्खियां बना, तो राजस्व एवं खनिज विभाग की एक संयुक्त जांच टीम अंततः मौके पर पहुंची. लेकिन यहां प्रशासन की वास्तविक मंशा पर सवाल उठता है.

टीम के हाथ में शिकायत की फाइल थी. उनके साथ पटवारी भी मौजूद था. लेकिन प्रभारी खनिज अधिकारी, श्री सुनीत राजपूत ने ऑन-कैमरा एक ऐसा बयान दिया जो सनसनीखेज और चौंकाने वाला था.

उन्होंने कहा, “हमें नहीं पता जमीन किसकी है और हम किसकी जांच करने आए हैं.”

यह कथन कई गंभीर सवाल खड़े करता है:

  • क्या बिना बुनियादी तथ्य जाने एक जांच टीम गठित की जाती है?

  • क्या यह वास्तविक अज्ञानता है या फिर माफिया को बचाने के लिए भ्रष्टाचार की चादर ओढ़कर की गई “सोची-समझी साजिश”?

  • अगर जांच अधिकारी को ही नहीं पता कि क्या जांच करनी है, तो जनता से निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद कैसे की जा सकती है?


जांच या खानापूर्ति? 6 महीने में 30% से 80% तक उत्खनन

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि मात्र छह महीने पहले, शिकायत के समय अवैध खनन का स्तर लगभग 30% था. लेकिन तथाकथित “निगरानी” और “जांच” के बाद, यह स्तर बढ़कर लगभग 80% तक पहुंच गया है.

इसका सीधा मतलब है कि प्रशासनिक कार्रवाई न केवल निष्प्रभावी रही, बल्कि उसने माफियाओं के लिए और अधिक उत्खनन का मार्ग भी प्रशस्त किया. ऐसा लगता है कि दिखावे के लिए मशीनें जब्त की जाती हैं और फिर उन्हीं के हवाले कर दी जाती हैं.


सवाल जो मुंह बाए खड़े हैं:

  1. क्या खनिज विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस गठजोड़ से अनभिज्ञ हैं, या फिर वे जानबूझकर मौन धारण किए हुए हैं?

  2. जब एक अधिकारी सार्वजनिक रूप से अपनी जिम्मेदारी से इनकार कर दे, तो उसके पद की गरिमा और कर्तव्यनिष्ठा पर क्या प्रभाव पड़ता है?

  3. क्या राज्य सरकार या शासन-प्रशासन इन अधिकारियों की लापरवाही और संभावित मिलीभगत पर कोक कार्रवाई करेगा?

  4. क्या हर्रहा के आदिवासी समुदाय को न्याय मिल पाएगा, या फिर वे माफिया और एक उदासीन सिस्टम के बीच पिसते रहेंगे?

निष्कर्ष

हर्रहा गांव में जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ बालू या पत्थर की चोरी नहीं है. यह लोकतंत्र की नींव, कानून का शासन और नागरिक अधिकारों पर सीधा हमला है. जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं या अज्ञानता का अभिनय करने लगें, तो समाज का विश्वास टूटता है.

यह मामला एक केस स्टडी है कि कैसे स्थानीय माफिया, भ्रष्ट अधिकारियों और एक ढीले-ढाले सिस्टम की मिलीभगत से संसाधनों की लूट और मानवाधिकारों का हनन बेरोकटोक जारी रहता है. अब यह राज्य सरकार और न्यायपालिका पर निर्भर करता है कि वे हर्रहा के लोगों की आवाज बनें और इस “सुनियोजित चुप्पी” को तोड़ें.

यह रिपोर्ट मौके का जायजा, दस्तावेजों के अध्ययन और प्रत्यक्षदर्शी अकाउंट्स पर आधारित है. तथ्यों की पुष्टि की गई है.

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