राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुसार, जहां संभव हो, कक्षा 5 तक और अधिमानतः कक्षा 8 तक शिक्षा मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में होनी चाहिए. विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में अधिक सहजता से सीखते हैं, जिससे उनकी तार्किक और बौद्धिक क्षमता विकसित होती है. अनुसंधानों से यह भी स्पष्ट हुआ है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होने पर बच्चे अन्य भाषाएं भी आसानी से सीख सकते हैं.
क्या अंग्रेज़ी की पढ़ाई बंद हो जाएगी?
NEP 2020 अंग्रेज़ी की शिक्षा को समाप्त नहीं कर रही है. नीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंग्रेज़ी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं को भी समान महत्व मिले. उदाहरण के तौर पर, हरियाणा के आंगनवाड़ियों में हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं की किताबें उपलब्ध कराई जा रही हैं, ताकि बच्चे द्विभाषी शिक्षा का लाभ उठा सकें. इससे यह साफ होता है कि NEP 2020 भाषाओं के चयन में लचीलापन प्रदान करती है, न कि किसी विशेष भाषा को थोपने का प्रयास कर रही है.
भाषा विविधता को बढ़ावा या बाधा?
तीन-भाषा फॉर्मूला भारत में कोई नया विचार नहीं है. यह पहली बार 1968 की शिक्षा नीति में शामिल किया गया था, जिसमें हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेज़ी और एक दक्षिण भारतीय भाषा पढ़ाई जाती थी, जबकि गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषा को प्राथमिकता दी जाती थी. NEP 2020 ने इस नीति को लचीला बनाते हुए राज्यों को यह स्वतंत्रता दी है कि वे अपनी संस्कृति और आवश्यकताओं के अनुसार भाषाओं का चयन कर सकें. इससे क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा मिलेगा और भाषा विविधता को प्रोत्साहित किया जाएगा.
स्कूलों में मातृभाषा की वर्तमान स्थिति
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) के आठवें अखिल भारतीय स्कूल शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा देने वाले स्कूलों की संख्या में गिरावट देखी गई है. पिछले सर्वेक्षण में 92.07% स्कूलों में मातृभाषा में पढ़ाई होती थी, जबकि नवीनतम आंकड़ों में यह घटकर 86.62% रह गई है. विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में यह संख्या तेजी से कम हो रही है. इससे स्पष्ट होता है कि अंग्रेज़ी माध्यम के प्रति रुचि बढ़ रही है, लेकिन यह बच्चों के संज्ञानात्मक विकास को कैसे प्रभावित करेगा, इस पर अभी और अध्ययन की आवश्यकता है.
तीन-भाषा नीति लागू करने में चुनौतियां
तीन-भाषा नीति को लागू करने में सबसे बड़ी बाधा योग्य शिक्षकों की कमी है. उदाहरण के लिए, हरियाणा में तमिल को 1969 में दूसरी भाषा बनाया गया था, लेकिन 2010 में इसे हटाना पड़ा, क्योंकि शिक्षकों की उपलब्धता नहीं थी. इसी तरह, हिमाचल प्रदेश में तमिल और तेलुगु जैसी भाषाओं को पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक नहीं मिल पाए. यह दर्शाता है कि नीति लागू करना आसान नहीं है और इसके लिए पर्याप्त संसाधनों की आवश्यकता है.
मातृभाषा में किताबों की उपलब्धता
NEP 2020 के तहत सरकार ने विभिन्न भाषाओं में किताबें उपलब्ध कराने की योजना बनाई है. NCERT ने 104 भारतीय भाषाओं और बोलियों में डिजिटल किताबें जारी की हैं, जिनमें बंगाली, भीली, खंडेशी, लद्दाखी, तुलु, पश्तो, डोगरी और कार निकोबारी जैसी भाषाएँ शामिल हैं. इसके अलावा, कुछ राज्यों ने द्विभाषी किताबें भी पेश की हैं, जैसे असम में असमिया-अंग्रेज़ी और आंध्र प्रदेश में तेलुगु-अंग्रेज़ी. इससे छात्रों को अपनी मातृभाषा के साथ-साथ अन्य भाषाओं में भी दक्षता हासिल करने में मदद मिलेगी.
विदेशी भाषाओं की पढ़ाई क्यों ज़रूरी है?
NEP 2020 ने कोरियाई, जापानी, थाई, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश, पुर्तगाली और रूसी जैसी विदेशी भाषाओं को माध्यमिक स्तर पर शामिल करने की सिफारिश की है. इसका उद्देश्य छात्रों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय अवसरों के लिए तैयार करना है. CBSE की योजना के तहत, कक्षा 10 तक छात्रों को दो भारतीय भाषाएँ सीखनी होंगी, जबकि कक्षा 11 और 12 में वे एक भारतीय भाषा और एक विदेशी भाषा का चयन कर सकते हैं.