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क्या विकास की दौड़ में जंगलों के असली रक्षक पीछे छूट रहे हैं?

भारत में करीब 1.7 करोड़ (17 मिलियन) वनवासी और घुमंतू जनजातियों की आजीविका जंगलों और चरागाहों पर निर्भर करती है. लेकिन बड़े हाईवे, सोलर पार्क, माइनिंग और अभयारण्यों के नाम पर लाखों लोगों को उनके पारंपरिक घरों से बेदखल किया जा रहा है. सरकार द्वारा बनाए गए कानून और नीतियां इन समुदायों की रक्षा के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो रही हैं.

वन अधिकार कानून (FRA) और उसकी स्थिति
2006 में लागू हुए वन अधिकार कानून (Forest Rights Act – FRA) का उद्देश्य पारंपरिक वनवासियों और आदिवासियों को उनकी जमीन पर कानूनी अधिकार देना था. इस कानून के तहत दो प्रमुख समुदायों को सुरक्षा दी जानी थी:

  1. घुमंतू पशुपालक (Pastoralists) – ये लोग अपने मवेशियों को चराने के लिए लंबी दूरी तय करते हैं और आमतौर पर उनके पास स्थायी जमीन नहीं होती है. भारत में करीब 70 समुदाय ऐसे हैं, जिनकी कुल जनसंख्या 1.3 करोड़ से अधिक है.
  2. विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs) – ये 75 आदिवासी समुदाय अब भी शिकार, जड़ी-बूटियों और जंगलों पर निर्भर हैं. इनकी कुल आबादी 28 से 44 लाख के बीच मानी जाती है.

सरकार की निष्क्रियता
फरवरी 2020 में आदिवासी मामलों के मंत्रालय (MoTA) ने स्वीकार किया कि अभी तक इन समुदायों को उनके कानूनी अधिकार नहीं मिले हैं. इसके समाधान के लिए 2021 में एक विशेषज्ञ समिति बनाई गई, जिसने सरकार को विस्तृत गाइडलाइन्स सौंपी. लेकिन चार साल बाद भी इन गाइडलाइन्स पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.

समुदायों पर प्रभाव
अगर सरकार इन गाइडलाइन्स को लागू नहीं करती, तो इन समुदायों के सामने कई गंभीर संकट खड़े हो सकते हैं जैसे-

  • बेदखली और विस्थापन – सोलर पार्क, माइनिंग और हाईवे प्रोजेक्ट्स के नाम पर कई घुमंतू पशुपालकों और PVTGs को उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है.
  • वन विभाग का नियंत्रण – गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में वन विभाग FRA को नजरअंदाज कर जंगलों पर एकतरफा नियंत्रण बनाए रखना चाहता है.
  • सांस्कृतिक और सामाजिक अधिकारों की अनदेखी – पारंपरिक जंगलों से बेदखली का मतलब इन समुदायों की संस्कृति, रीति-रिवाज और जीवनशैली का धीरे-धीरे समाप्त होना है.

इसके समाधान

  • FRA को सख्ती से लागू करे और समुदायों को उनके कानूनी अधिकार दे.
  • राज्य सरकारें अपने स्तर पर इन गाइडलाइन्स को लागू करें.
  • वन विभाग और स्थानीय प्रशासन को प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे इन समुदायों के अधिकारों को समझें.

न्याय बनाम विकास
क्या विकास केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और बिजली परियोजनाओं से होगा, या फिर उन लोगों के अधिकारों की रक्षा से, जो सदियों से जंगलों के संरक्षक रहे हैं? जब तक सरकार इन समुदायों के अधिकारों को प्राथमिकता नहीं देती, तब तक वनवासी और घुमंतू जनजातियों का भविष्य संकट में बना रहेगा.