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Toggleसीधी: आहार अनुदान योजना, डेढ़ साल बाद भी इंतज़ार, 3452 बैगा महिलाएं लाभ से वंचित
मध्यप्रदेश सरकार द्वारा विशेष पिछड़ी जनजातियों के पोषण और आर्थिक सहयोग के उद्देश्य से शुरू की गई आहार अनुदान योजना अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है. योजना की घोषणा को डेढ़ साल से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन सीधी जिले की हजारों पात्र महिलाओं तक इसका लाभ अभी तक नहीं पहुंच पाया है.
सरकारी स्तर पर ₹1500 प्रतिमाह सहायता का वादा किया गया था, मगर जमीनी हकीकत यह है कि योजना फिलहाल केवल सरकारी फाइलों तक ही सीमित नजर आ रही है. इससे बैगा समाज की महिलाओं में निराशा और आक्रोश दोनों बढ़ते जा रहे हैं.
योजना की घोषणा और उद्देश्य
अक्टूबर 2023 में मध्यप्रदेश शासन ने विशेष पिछड़ी जनजातियों — विशेष रूप से बैगा और सहरिया समुदाय — की महिलाओं के पोषण स्तर और आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए आहार अनुदान योजना शुरू करने का निर्णय लिया था.
इस योजना के तहत:
- परिवार की महिला मुखिया को
- हर महीने ₹1500 की आर्थिक सहायता
- सीधे लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से देने का प्रावधान किया गया था.
सरकार का उद्देश्य था कि कमजोर जनजातीय परिवारों को पोषण सुरक्षा मिले और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी मजबूत हो.
लेकिन घोषणा और क्रियान्वयन के बीच की दूरी अब सवालों का कारण बन चुकी है.
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डेढ़ साल बाद भी शून्य प्रगति
योजना लागू होने के बाद पंचायत स्तर पर व्यापक प्रक्रिया शुरू की गई. ग्रामीण क्षेत्रों में:
- पात्र महिलाओं के आवेदन फार्म भरवाए गए
- दस्तावेज सत्यापन किया गया
- पंचायतों द्वारा सूची तैयार की गई
इसके बावजूद आज तक एक भी महिला के खाते में राशि नहीं पहुंची.
सीधी जिले में कुल 3452 महिलाएं पात्र पाई गईं, लेकिन लाभ वितरण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी.
बैगा समाज संघ ने लगाए गंभीर आरोप
बैगा समाज संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष गौरीशंकर बैगा ने प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर आरोप लगाए हैं.
उनका कहना है कि शासन ने योजना की घोषणा तो कर दी, लेकिन उसे लागू करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस व्यवस्था नहीं बनाई गई.
उनके अनुसार:
- पंचायतों में आवेदन भरवाए गए
- महिलाओं को नियमित भुगतान का आश्वासन दिया गया
- लेकिन आज तक किसी को एक रुपया भी नहीं मिला
उन्होंने यह भी बताया कि इस संबंध में कई बार मुख्यमंत्री को पत्र भेजे गए और हाल ही में जिले के दौरे पर आए राज्यपाल को भी ज्ञापन सौंपा गया, फिर भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ.
महिलाओं की पीड़ा: उम्मीद से निराशा तक
ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं का कहना है कि उन्हें योजना से बड़ी उम्मीदें थीं.
ग्राम छलवारी की शांति बैगा बताती हैं कि पंचायत में लगभग एक वर्ष पहले फार्म भरवाया गया था और हर महीने ₹1500 मिलने की जानकारी दी गई थी.
इसी तरह बकवा की रामबाई बैगा, ठाडीपाथर की बसंती बैगा और समितियां बैगा का कहना है कि:
“हमें आज तक यह भी नहीं बताया गया कि पैसा क्यों नहीं आ रहा और योजना कहां अटकी हुई है.”
महिलाओं का आरोप है कि जानकारी के अभाव में वे बार-बार पंचायत और अधिकारियों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं.
प्रशासन का पक्ष: निर्देशों का इंतजार
इस पूरे मामले में प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि प्रक्रिया अभी विभागीय निर्देशों के अभाव में अटकी हुई है.
कुसमी जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ज्ञानेंद्र मिश्रा के अनुसार:
- आदिवासी विकास विभाग ने पंचायतों से पात्र महिलाओं की जानकारी मांगी थी
- सभी आवश्यक जानकारी विभाग को भेज दी गई है
- लेकिन अभी तक आगे की कार्यवाही के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं
उन्होंने कहा कि जैसे ही विभागीय आदेश प्राप्त होंगे, योजना पर तत्काल कार्रवाई की जाएगी.
योजनाओं की घोषणा बनाम क्रियान्वयन का सवाल
यह मामला केवल एक योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन मॉडल पर भी प्रश्न खड़े करता है.
अक्सर देखा गया है कि:
- योजनाएं बड़े स्तर पर घोषित होती हैं
- लाभार्थियों का पंजीकरण भी हो जाता है
- लेकिन बजट, प्रक्रिया या प्रशासनिक समन्वय के अभाव में योजनाएं अटक जाती हैं.
आहार अनुदान योजना भी फिलहाल इसी स्थिति का उदाहरण बनती दिखाई दे रही है.
पोषण और आर्थिक सुरक्षा पर असर
बैगा और सहरिया समुदाय देश की सबसे कमजोर जनजातियों में गिने जाते हैं, इन समुदायों में:
- कुपोषण की समस्या अधिक
- आय के सीमित साधन
- स्वास्थ्य सेवाओं तक कम पहुंच
जैसी चुनौतियां पहले से मौजूद हैं.
ऐसे में ₹1500 मासिक सहायता उनके लिए केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि पोषण सुरक्षा का महत्वपूर्ण साधन बन सकती थी.
योजना के लागू न होने से इसका सीधा असर महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है.
ग्रामीण स्तर पर बढ़ता आक्रोश
स्थानीय स्तर पर अब इस मुद्दे को लेकर नाराजगी बढ़ रही है. ग्रामीणों का कहना है कि:
- सरकार ने उम्मीद जगाई
- कागजी प्रक्रिया पूरी करवाई
- लेकिन परिणाम शून्य रहा।
समाज प्रतिनिधियों का मानना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो आंदोलन की स्थिति भी बन सकती है.
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार योजनाओं की सफलता केवल घोषणा से नहीं बल्कि समयबद्ध क्रियान्वयन से तय होती है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि:
- स्पष्ट प्रशासनिक जिम्मेदारी तय हो
- विभागों के बीच समन्वय बढ़े
- लाभार्थियों को नियमित अपडेट मिले
तो ऐसी समस्याओं से बचा जा सकता है.
सबसे बड़ा सवाल
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है —
क्या आहार अनुदान योजना वास्तव में लागू होगी या यह केवल सरकारी रिकॉर्ड तक सीमित रह जाएगी?
3452 महिलाओं के लिए ₹1500 की सहायता आज भी उम्मीद बनकर रह गई है. योजना की सफलता अब प्रशासनिक निर्णय और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है.
निष्कर्ष
आहार अनुदान योजना का उद्देश्य बेहद महत्वपूर्ण था — कमजोर जनजातीय महिलाओं को आर्थिक और पोषण सुरक्षा देना. लेकिन डेढ़ साल बाद भी लाभ वितरण शुरू न होना प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है.
जब योजनाएं समय पर जमीन पर नहीं उतरतीं, तो सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं लोगों को होता है जिनके लिए वे बनाई जाती हैं.
अब जरूरत है स्पष्ट निर्णय, तेज कार्रवाई और जवाबदेही की — ताकि वादे हकीकत बन सकें, न कि सिर्फ फाइलों में दर्ज रह जाएं.
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