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रीवा: हार्डनेस, नाइट्रेट और कैल्शियम की अधिकता से बढ़ता पेयजल संकट

रीवा में पेयजल की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पानी में हार्डनेस, नाइट्रेट और कैल्शियम की अधिक मात्रा लोगों की सेहत पर भारी पड़ रही है.

रीवा: हार्डनेस, नाइट्रेट और कैल्शियम की अधिकता से बढ़ता पेयजल संकट

रीवा: पानी को जीवन का आधार कहा जाता है, लेकिन जब यही पानी बीमारी की वजह बन जाए तो स्थिति चिंताजनक हो जाती है.रीवा जिले सहित कई क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. जल में हार्डनेस, नाइट्रेट और कैल्शियम की अधिक मात्रा लोगों के स्वास्थ्य पर सीधा असर डाल रही है.

ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों से पेट संबंधी समस्याएं, पथरी, त्वचा रोग और अन्य जलजनित बीमारियों की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं. सबसे बड़ी चिंता यह है कि जिस पानी को लोग सुरक्षित समझकर पी रहे हैं, वही धीरे-धीरे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहा है.

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समस्या की असली तस्वीर

जिले में जल आपूर्ति व्यवस्था मौजूद होने के बावजूद पानी की गुणवत्ता को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आ रही है. कई स्थानों पर पाइपलाइन और हैंडपंप से निकलने वाले पानी में खनिज तत्वों की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक पाई जा रही है.

विशेषज्ञों के अनुसार पानी में तीन प्रमुख समस्याएं देखी जा रही हैं:

  • हार्डनेस (कठोरता) का उच्च स्तर

  • नाइट्रेट की अधिक मात्रा

  • कैल्शियम का असंतुलन

इन तीनों तत्वों का संतुलन बिगड़ने पर पानी पीने योग्य नहीं रहता, लेकिन लोगों को इसकी जानकारी तक नहीं दी जा रही.

हार्डनेस क्या है और क्यों खतरनाक है?

पानी की हार्डनेस मुख्य रूप से कैल्शियम और मैग्नीशियम की अधिकता से होती है. सामान्य मात्रा में ये तत्व शरीर के लिए आवश्यक होते हैं, लेकिन अधिक मात्रा स्वास्थ्य के लिए जोखिम बन जाती है.

हार्ड पानी के प्रभाव:

  • किडनी स्टोन (पथरी) की संभावना बढ़ती है

  • त्वचा और बालों से जुड़ी समस्याएं

  • पेट में भारीपन और पाचन गड़बड़ी

  • बच्चों और बुजुर्गों में कमजोरी

ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय से हार्ड पानी पीने वाले लोगों में पथरी के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है.

नाइट्रेट: धीमा लेकिन गंभीर खतरा

नाइट्रेट आमतौर पर कृषि क्षेत्रों में उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से भूजल में पहुंचता है. जब यह पानी पीने के स्रोतों में मिल जाता है, तो यह बेहद खतरनाक साबित होता है.

नाइट्रेट से होने वाले खतरे:

  • बच्चों में “ब्लू बेबी सिंड्रोम” का खतरा

  • रक्त में ऑक्सीजन की कमी

  • पाचन तंत्र की समस्याएं

  • लंबे समय में गंभीर स्वास्थ्य जोखिम

विशेषज्ञ बताते हैं कि नाइट्रेट की अधिक मात्रा तुरंत बीमारी नहीं दिखाती, लेकिन धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती है.

कैल्शियम की अधिकता भी बन रही समस्या

कैल्शियम हड्डियों के लिए जरूरी है, लेकिन पानी में इसकी अत्यधिक मात्रा शरीर में खनिज संतुलन बिगाड़ देती है.

संभावित प्रभाव:

  • किडनी स्टोन

  • जोड़ों में दर्द

  • पाचन समस्या

  • मूत्र संबंधी परेशानियां

जिले के कई हिस्सों में पानी का स्वाद खारा या भारी महसूस होना इसी असंतुलन का संकेत माना जा रहा है.

जल परीक्षण की कमी: सबसे बड़ी लापरवाही

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि कई जगहों पर पानी की नियमित जांच ही नहीं हो रही. जल परीक्षण प्रयोगशालाएं होने के बावजूद नमूनों की जांच सीमित स्तर पर की जा रही है.

समस्या के मुख्य कारण:

  • नियमित सैंपलिंग का अभाव

  • रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होना

  • ग्रामीण क्षेत्रों में निगरानी की कमी

  • तकनीकी स्टाफ की कमी

जब पानी की गुणवत्ता की जानकारी ही लोगों तक नहीं पहुंचेगी, तो वे खुद को सुरक्षित कैसे रख पाएंगे?

पुरानी पाइपलाइन और बदलता भूजल स्तर

विशेषज्ञ मानते हैं कि पानी की गुणवत्ता बिगड़ने के पीछे केवल प्राकृतिक कारण नहीं, बल्कि व्यवस्था भी जिम्मेदार है.

प्रमुख कारण:

  1. पुरानी और जर्जर पाइपलाइन

  2. भूजल स्तर में गिरावट

  3. अत्यधिक बोरवेल उपयोग

  4. कृषि रसायनों का प्रभाव

  5. जल स्रोतों का संरक्षण न होना

ग्रामीण क्षेत्रों में कई हैंडपंप वर्षों से बिना तकनीकी परीक्षण के उपयोग में हैं.

लोगों की बढ़ती स्वास्थ्य समस्याएं

स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों में पेट दर्द, दस्त, पथरी और त्वचा रोग के मरीजों की संख्या बढ़ना इस संकट की गंभीरता को दिखाता है.

डॉक्टरों के अनुसार:

  • दूषित पानी लंबे समय तक पीने से शरीर पर धीरे-धीरे असर होता है.

  • लोग बीमारी को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.

  • वास्तविक कारण पानी होने के बावजूद इलाज केवल लक्षणों का होता है.

प्रशासनिक जिम्मेदारी और सवाल

पेयजल उपलब्ध कराना केवल पानी पहुंचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षित पानी उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है.

उठते सवाल:

  • क्या नियमित जल परीक्षण हो रहा है?

  • क्या रिपोर्ट जनता के लिए उपलब्ध है?

  • क्या प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की गई?

  • क्या वैकल्पिक जल स्रोत उपलब्ध कराए गए?

यदि इन सवालों के जवाब स्पष्ट नहीं हैं, तो समस्या और गंभीर हो सकती है.

समाधान क्या हो सकते हैं?

स्थिति चिंताजनक जरूर है, लेकिन समाधान संभव हैं यदि समय रहते कदम उठाए जाएं.

प्रशासनिक स्तर पर:

  • हर महीने जल गुणवत्ता परीक्षण

  • रिपोर्ट ऑनलाइन सार्वजनिक करना

  • प्रभावित क्षेत्रों में RO या फिल्ट्रेशन प्लांट

  • पाइपलाइन का नवीनीकरण

  • जल स्रोतों का वैज्ञानिक संरक्षण

नागरिक स्तर पर:

  • पानी उबालकर पीना

  • घरेलू वाटर फिल्टर का उपयोग

  • पानी का स्वाद या रंग बदलने पर जांच कराना

  • स्थानीय प्रशासन को शिकायत दर्ज करना

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

जल विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के कई हिस्सों में भूजल गुणवत्ता तेजी से बदल रही है. यदि समय रहते वैज्ञानिक निगरानी नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में पेयजल संकट स्वास्थ्य आपदा में बदल सकता है.

भविष्य की चुनौती

पानी की समस्या अब केवल उपलब्धता की नहीं रही, बल्कि गुणवत्ता की हो गई है. यदि लोगों को शुद्ध पानी नहीं मिला, तो स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा.

यह केवल एक जिले की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है कि विकास के साथ जल संरक्षण और गुणवत्ता नियंत्रण अनिवार्य है.

निष्कर्ष

पेयजल जीवन का आधार है, लेकिन जब वही पानी बीमारी की वजह बनने लगे तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है. हार्डनेस, नाइट्रेट और कैल्शियम की अधिकता केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुकी है.

जरूरत है पारदर्शिता, नियमित जांच और जागरूकता की — ताकि हर घर तक सिर्फ पानी नहीं, बल्कि सुरक्षित पानी पहुंच सके

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