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Toggleरीवा: 500 साल पुराने सोनमहल मंदिर की हालत चिंताजनक, संरक्षण को लेकर उठी आवाज
मध्यप्रदेश के रीवा शहर के अमहिया क्षेत्र में स्थित लगभग 500 वर्ष प्राचीन शासन संधारित श्री राधाकृष्ण सोनमहल गोपालदास मंदिर आज गंभीर उपेक्षा का शिकार बन चुका है. ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व रखने वाला यह मंदिर अब जर्जर स्थिति में पहुंच गया है, जिससे न केवल इसकी संरचना को खतरा है बल्कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा भी दांव पर लगी हुई है.
स्थानीय नागरिकों, श्रद्धालुओं और सामाजिक संगठनों ने एक बार फिर मंदिर के तत्काल जीर्णोद्धार की मांग उठाई है. लोगों का कहना है कि यदि समय रहते मरम्मत कार्य शुरू नहीं किया गया तो यह ऐतिहासिक धरोहर किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है.
इतिहास और आस्था का केंद्र है सोनमहल मंदिर
सोनमहल गोपालदास मंदिर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि रीवा की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है. माना जाता है कि यह मंदिर लगभग पांच शताब्दियों पहले स्थापित हुआ था और लंबे समय से क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है.
मंदिर परिसर में स्थापित प्राचीन मूर्तियां इसकी ऐतिहासिक महत्ता को और बढ़ाती हैं. यहां भगवान राम-लक्ष्मण-जानकी, राधा-कृष्ण तथा हनुमान जी की अष्टधातु की बहुमूल्य प्रतिमाएं विराजमान हैं, जिनकी धार्मिक और पुरातात्विक दृष्टि से विशेष अहमियत मानी जाती है.
लेकिन विडंबना यह है कि इतनी महत्वपूर्ण धरोहर आज संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होती जा रही है.
जर्जर दीवारें बन रहीं खतरे की वजह
मंदिर की संरचनात्मक स्थिति बेहद खराब बताई जा रही है. स्थानीय लोगों के अनुसार—
- मंदिर की पूर्वी सीमा दीवार अत्यंत कमजोर हो चुकी है
- दीवार कभी भी गिर सकती है
- परिसर की कई दीवारों में गहरी दरारें आ चुकी हैं
- भवन के कई हिस्सों का प्लास्टर पूरी तरह झड़ चुका है
विशेषज्ञों का मानना है कि पुरानी इमारतों में समय पर संरक्षण कार्य न होने से ढांचा कमजोर हो जाता है, जिससे अचानक ढहने का खतरा बढ़ जाता है.
श्रद्धालुओं का कहना है कि त्योहारों और विशेष अवसरों पर मंदिर में बड़ी संख्या में लोग आते हैं, ऐसे में किसी दुर्घटना की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता.
पेड़-पौधे भी बना रहे संरचना के लिए खतरा
मंदिर की दीवारों और छतों पर उगे पीपल और बरगद के पेड़ भी भवन को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं. इन पेड़ों की जड़ें दीवारों के भीतर तक फैल चुकी हैं, जिससे पत्थर और ईंटों की पकड़ कमजोर हो रही है.
संरक्षण विशेषज्ञों के अनुसार, पुराने भवनों में उगने वाले पेड़ संरचना को अंदर से तोड़ देते हैं और समय के साथ पूरी दीवार गिरने का जोखिम बढ़ जाता है.
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हनुमान मंदिर की छत भी खतरनाक स्थिति में
मंदिर परिसर स्थित हनुमान मंदिर की छत भी अत्यधिक जर्जर हो चुकी है. स्थानीय लोगों ने आशंका जताई है कि—
- छत किसी भी समय गिर सकती है
- इससे प्राचीन मूर्तियों को नुकसान पहुंच सकता है
- पूजा-अर्चना के दौरान श्रद्धालुओं की जान को खतरा है
यह स्थिति मंदिर प्रशासन और जिला प्रशासन के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है.
2013 में स्वीकृत राशि, लेकिन काम आज तक शुरू नहीं
जानकारी के अनुसार मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए वर्ष 2013 में शासन द्वारा 2 लाख 51 हजार रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी. कलेक्टर रीवा के आदेश क्रमांक 188, दिनांक 23 सितंबर 2013 के माध्यम से इस प्रस्ताव को मंजूरी भी दी गई थी.
लेकिन हैरानी की बात यह है कि मंजूरी मिलने के बावजूद आज तक जीर्णोद्धार कार्य शुरू नहीं हो सका.
स्थानीय नागरिकों का सवाल है कि—
- स्वीकृत राशि का उपयोग क्यों नहीं हुआ?
- कार्य शुरू होने में इतनी देरी किस कारण हुई?
- क्या प्रशासनिक प्रक्रिया में लापरवाही हुई?
इन सवालों के जवाब अब तक स्पष्ट नहीं हो सके हैं.
चोरी का खतरा भी बढ़ा
मंदिर की बाहरी सीमा दीवार टूट जाने के कारण सुरक्षा व्यवस्था भी प्रभावित हुई है. मंदिर परिसर अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह गया है.
यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि मंदिर में स्थापित अष्टधातु की प्राचीन मूर्तियां अत्यंत मूल्यवान हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जल्द सुरक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं की गई तो चोरी या नुकसान की आशंका बनी रहेगी.
पुजारी आवास और भोजन गृह पूरी तरह नष्ट
मंदिर परिसर में स्थित पुजारी का आवास और भोजन गृह भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं. वर्तमान में वहां रहने योग्य स्थिति नहीं बची है.
इस कारण—
- पुजारी को रहने में कठिनाई हो रही है
- मंदिर की नियमित देखरेख प्रभावित हो रही है
- धार्मिक गतिविधियों का संचालन सीमित हो गया है
स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए इन सुविधाओं का पुनर्निर्माण जरूरी है.
जनसहयोग से जीर्णोद्धार की मांग
मंदिर से जुड़े प्रार्थी और स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि मंदिर की गंभीर स्थिति को देखते हुए जनसहयोग के माध्यम से जीर्णोद्धार की अनुमति दी जाए.
लोगों का कहना है कि यदि शासन स्तर पर कार्य में देरी हो रही है तो समाज और श्रद्धालुओं की भागीदारी से इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाया जा सकता है.
धरोहर संरक्षण क्यों जरूरी है
ऐतिहासिक मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं होते, बल्कि किसी शहर की पहचान और सांस्कृतिक इतिहास का प्रतीक होते हैं. ऐसे स्थलों का संरक्षण कई कारणों से महत्वपूर्ण है—
- सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
- धार्मिक आस्था की सुरक्षा
- पर्यटन संभावनाओं का विकास
- स्थानीय पहचान को मजबूती
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते संरक्षण कार्य नहीं किया गया तो कई ऐतिहासिक संरचनाएं हमेशा के लिए नष्ट हो सकती हैं.
प्रशासन से लोगों की मुख्य मांगें
स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन के सामने कुछ प्रमुख मांगें रखी हैं—
- मंदिर का तत्काल तकनीकी निरीक्षण
- जर्जर दीवारों की मरम्मत
- छत और संरचना का पुनर्निर्माण
- पेड़ों की वैज्ञानिक तरीके से कटाई
- सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना
- पुजारी आवास और भोजन गृह का पुनर्निर्माण
आस्था और विरासत बचाने का समय
रीवा का सोनमहल मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था और इतिहास का जीवंत प्रतीक है. आज यह धरोहर प्रशासनिक ध्यान और संरक्षण की प्रतीक्षा कर रही है.
यदि जल्द कदम नहीं उठाए गए, तो यह ऐतिहासिक मंदिर किसी दुर्घटना या स्थायी क्षति का शिकार हो सकता है. स्थानीय लोगों की उम्मीद है कि प्रशासन जल्द निर्णय लेकर मंदिर के जीर्णोद्धार की दिशा में ठोस कार्रवाई करेगा.
निष्कर्ष
500 वर्ष पुराने श्री राधाकृष्ण सोनमहल गोपालदास मंदिर की वर्तमान स्थिति न केवल चिंता का विषय है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है. अब आवश्यकता है त्वरित कार्रवाई, प्रशासनिक संवेदनशीलता और जनभागीदारी की, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस ऐतिहासिक धरोहर से जुड़ सकें.
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