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रीवा में पुलिस पर गंभीर आरोप: दुकानदार से मारपीट, गाली-गलौज और अवैध वसूली का मामला

रीवा में पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल। दुकानदार ने लगाया मारपीट, गाली-गलौज और 50 हजार रुपये की अवैध मांग का आरोप। CCTV फुटेज को बताया अहम सबूत, एसपी से की निष्पक्ष जांच की मांग।

रीवा में पुलिस पर गंभीर आरोप: दुकानदार से मारपीट, गाली-गलौज और अवैध वसूली का मामला

मध्यप्रदेश के रीवा जिले में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. गढ़ थाना क्षेत्र अंतर्गत लालगांव चौकी में पदस्थ पुलिस कर्मियों पर एक स्थानीय दुकानदार ने मारपीट, अभद्र व्यवहार और अवैध वसूली की कोशिश जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं.

घटना सामने आने के बाद क्षेत्र में चर्चा तेज हो गई है और पुलिस की कार्यशैली पर आम नागरिकों के बीच असंतोष भी देखने को मिल रहा है.पीड़ित ने मामले की शिकायत पुलिस अधीक्षक (एसपी) से करते हुए निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है.

क्या है पूरा मामला?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम लालगांव निवासी बाल कृष्ण सोनी (51 वर्ष), जो स्थानीय स्तर पर दुकान संचालित करते हैं, ने आरोप लगाया है कि 1 अप्रैल 2026 की सुबह लगभग 10:30 बजे लालगांव चौकी से जुड़े तीन पुलिस कर्मी — महेश वर्मा, अजय वर्मा और पवन सत्यार्थी — उनकी दुकान पर पहुंचे.

पीड़ित का कहना है कि पुलिस कर्मियों ने आते ही उनसे अभद्र भाषा में बात करना शुरू कर दिया. आरोप है कि बिना किसी स्पष्ट कारण के गाली-गलौज की गई और बाद में उन्हें जबरन दुकान से घसीटते हुए चौकी ले जाया गया.

इस घटनाक्रम ने न केवल पीड़ित बल्कि आसपास मौजूद लोगों को भी हैरान कर दिया.

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चौकी में घंटों बैठाकर दबाव बनाने का आरोप

दुकानदार के अनुसार, चौकी पहुंचने के बाद उसे दोपहर करीब 2 बजे तक बैठाकर रखा गया. इस दौरान पुलिस कर्मियों ने उस पर चोरी का सामान खरीदने का आरोप लगाया.

पीड़ित का दावा है कि आरोपों के साथ-साथ उस पर मानसिक दबाव बनाया गया और कथित तौर पर मामला रफा-दफा करने के नाम पर पैसों की मांग की गई.

दुकानदार के अनुसार, पुलिस कर्मियों ने उससे:

  • 50,000 रुपये नकद, तथा
  • 5 ग्राम सोने की लाकेट

देने की मांग की.

पीड़ित का कहना है कि उसे यह भी कहा गया कि यदि मांग पूरी नहीं की गई तो उसके खिलाफ चोरी का केस दर्ज कर दिया जाएगा.

मोबाइल फोन रखने का भी आरोप

मामले में एक और गंभीर आरोप सामने आया है. दुकानदार का दावा है कि चौकी से छोड़े जाने के बाद भी उसका Vivo कंपनी का मोबाइल फोन (नंबर 9981828070) पुलिस चौकी में ही रख लिया गया.

पीड़ित के अनुसार, पुलिस कर्मियों ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक वह पैसे और सोने की लाकेट नहीं देगा, तब तक मोबाइल वापस नहीं किया जाएगा.

यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल अनुशासनहीनता बल्कि अधिकारों के दुरुपयोग का गंभीर मामला माना जा सकता है.

CCTV फुटेज बना सकता है अहम साक्ष्य

दुकानदार ने बताया कि उसकी दुकान में लगे CCTV कैमरों में पूरी घटना रिकॉर्ड हुई है.

यह फुटेज जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकती है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि:

  • पुलिस किस परिस्थिति में दुकान पहुंची,
  • क्या व्यवहार किया गया,
  • और क्या वास्तव में जबरन ले जाने की घटना हुई.

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल साक्ष्य ऐसे मामलों में जांच की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं.

मानसिक तनाव में पीड़ित, सुरक्षा की मांग

घटना के बाद से पीड़ित खुद को डरा हुआ और मानसिक रूप से परेशान बता रहा है. उसने आरोप लगाया कि पुलिस कार्रवाई के डर से वह सामान्य जीवन नहीं जी पा रहा है.

पीड़ित ने प्रशासन से सुरक्षा और न्याय की मांग करते हुए कहा कि यदि निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो आम नागरिकों का कानून व्यवस्था से विश्वास उठ सकता है.

पुलिस अधीक्षक से शिकायत

दुकानदार ने पूरे मामले की लिखित शिकायत पुलिस अधीक्षक को सौंप दी है. शिकायत में उसने मांग की है कि:

  • मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए,
  • CCTV फुटेज की जांच हो,
  • आरोपित पुलिस कर्मियों को जांच पूरी होने तक लाइन अटैच किया जाए,
  • और दोष सिद्ध होने पर सख्त विभागीय कार्रवाई की जाए.

अब सभी की नजर पुलिस प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है.

कानूनी दृष्टि से कितना गंभीर है मामला?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो पुलिस कर्मियों पर कई गंभीर धाराएं लागू हो सकती हैं, जिनमें शामिल हो सकते हैं:

  • अवैध हिरासत (Illegal Detention)
  • मारपीट और धमकी
  • जबरन वसूली (Extortion)
  • पद का दुरुपयोग

भारतीय कानून के तहत पुलिस को जांच और पूछताछ का अधिकार है, लेकिन नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करना अपराध की श्रेणी में आता है.

पुलिस की छवि पर असर

ऐसी घटनाएं सामने आने पर पुलिस विभाग की छवि पर सीधा असर पड़ता है। जहां एक ओर पुलिस जनता की सुरक्षा और न्याय का प्रतीक मानी जाती है, वहीं इस तरह के आरोप आम लोगों के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शी जांच और समय पर कार्रवाई ही जनता का भरोसा बनाए रखने का सबसे प्रभावी तरीका है.

स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया

घटना के बाद क्षेत्र में लोगों के बीच चर्चा का माहौल है. कई स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि आरोप सही हैं तो यह बेहद चिंताजनक है.

लोगों का मानना है कि:

  • पुलिस और जनता के बीच विश्वास जरूरी है,
  • शक्ति का उपयोग जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए,
  • और शिकायतों की निष्पक्ष जांच ही न्याय सुनिश्चित कर सकती है.

प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती

यह मामला प्रशासन के लिए एक परीक्षा की तरह माना जा रहा है.

अब देखना यह होगा कि:

  • जांच कितनी पारदर्शी होती है,
  • क्या CCTV फुटेज को आधार बनाया जाता है,
  • और क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है.

निष्पक्ष जांच न केवल पीड़ित को न्याय दिला सकती है बल्कि पुलिस व्यवस्था में विश्वास भी मजबूत कर सकती है.

निष्कर्ष

रीवा जिले के लालगांव चौकी से जुड़ा यह मामला पुलिस-जन संबंधों पर गंभीर सवाल खड़े करता है. एक ओर पीड़ित दुकानदार के आरोप हैं, वहीं दूसरी ओर सत्य सामने लाने की जिम्मेदारी जांच एजेंसियों पर है.

अब पूरे मामले की सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन यह घटना प्रशासन के लिए चेतावनी जरूर है कि कानून लागू करने वाली संस्थाओं की जवाबदेही उतनी ही जरूरी है जितनी उनकी शक्तियां.

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