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ToggleCTE रीवा में गूँजा पर्यावरण संरक्षण का संदेश, जीवनशैली बदलाव पर विशेषज्ञों की चेतावनी
रीवा: वैश्विक स्तर पर बढ़ते पर्यावरणीय संकट, बदलती जीवनशैली और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच शासकीय शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय (CTE) रीवा में आयोजित एक महत्वपूर्ण सेमिनार ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर विमर्श की दिशा प्रस्तुत की. महाविद्यालय के इको क्लब द्वारा पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन, भोपाल के मार्गदर्शन में आयोजित इस संगोष्ठी का विषय था — “पर्यावरण अनुकूल जीवन शैली”.
कार्यक्रम का उद्देश्य भावी शिक्षकों में पर्यावरणीय चेतना विकसित करना, उन्हें आधुनिक जीवनशैली के दुष्प्रभावों से अवगत कराना तथा प्रकृति के साथ संतुलित जीवन के प्रति प्रेरित करना रहा. सेमिनार में विशेषज्ञों ने स्पष्ट कहा कि यदि मानव समाज ने अपनी जीवनशैली में आवश्यक बदलाव नहीं किए, तो पर्यावरणीय संकट भविष्य में मानव अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है.
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भारतीय परंपराओं में निहित है प्रकृति संरक्षण का विज्ञान
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय के पर्यावरण जीव विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. अतुल तिवारी ने अपने विचारों में भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण के गहरे संबंध को रेखांकित किया.
उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता ने प्रकृति को केवल संसाधन नहीं माना, बल्कि जीवनदायिनी चेतना के रूप में सम्मान दिया. अथर्ववेद का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा:
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”
अर्थात पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं.
डॉ. तिवारी के अनुसार, प्राचीन भारतीय जीवन पद्धति में पर्यावरण संरक्षण सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ा हुआ था. वृक्षों, नदियों और पर्वतों के प्रति श्रद्धा का भाव दरअसल प्रकृति संतुलन बनाए रखने की एक वैज्ञानिक सामाजिक व्यवस्था थी.
उन्होंने बताया कि:
- वृक्षारोपण को पुण्य कार्य माना जाता था,
- पीपल, बरगद, तुलसी और नीम जैसे पौधों की पूजा के पीछे पर्यावरणीय महत्व था,
- लोकपरंपराओं के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को जनजीवन का हिस्सा बनाया गया था.
उन्होंने चिंता व्यक्त की कि आधुनिक विकास की दौड़ में समाज अपनी पारंपरिक पर्यावरणीय समझ से दूर होता जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप वायु एवं जल प्रदूषण गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन रहे हैं.
रासायनिक खेती और स्वास्थ्य संकट पर वैज्ञानिक चेतावनी
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि एवं बायोटेक्नोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. अरविंद त्रिपाठी ने आधुनिक कृषि पद्धतियों और मानव स्वास्थ्य के बीच संबंधों पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया.
उन्होंने कहा कि अधिक उत्पादन की प्रतिस्पर्धा में कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग ने मिट्टी की गुणवत्ता, जल स्रोतों और खाद्य श्रृंखला को प्रभावित किया है. पंजाब के कृषि मॉडल का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि रसायनों के अत्यधिक उपयोग से कई क्षेत्रों में गंभीर बीमारियों की घटनाएँ बढ़ी हैं.
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि पर्यावरणीय प्रदूषण जीन स्तर पर परिवर्तन (Gene Mutation) और डीएनए संरचना को प्रभावित कर सकता है, जिसके दीर्घकालिक परिणाम मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत चिंताजनक हैं.
सिंगल यूज प्लास्टिक: वैश्विक पर्यावरण संकट
डॉ. त्रिपाठी ने सिंगल यूज प्लास्टिक को वर्तमान समय की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बताते हुए कहा कि प्रतिवर्ष लगभग 14 मिलियन टन प्लास्टिक नदियों और समुद्रों में पहुंच रहा है. इससे समुद्री जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं.
उन्होंने समाज से अपील की कि:
- प्लास्टिक उपयोग को न्यूनतम किया जाए,
- पुन: उपयोग योग्य सामग्री अपनाई जाए,
- पर्यावरण अनुकूल उपभोग संस्कृति विकसित की जाए.
उनके अनुसार, पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी नीतियों से संभव नहीं, बल्कि व्यक्तिगत व्यवहार परिवर्तन से ही वास्तविक परिणाम मिल सकते हैं.
व्यावहारिक पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. आर.एन. पटेल ने पर्यावरण संरक्षण को दैनिक जीवन से जोड़ने पर विशेष बल दिया.
उन्होंने कहा कि जागरूकता तभी सार्थक है जब वह व्यवहार में दिखाई दे. उन्होंने प्रशिक्षार्थियों से अपील की कि गर्मी के मौसम में पक्षियों के लिए जलपात्र रखें और लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल करें.
उन्होंने यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि जैव विविधता और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक है.
शून्य प्लास्टिक और ‘ग्रीन वेलकम’ की अनुकरणीय पहल
कार्यक्रम की विशेषता इसका पूर्णतः पर्यावरण अनुकूल आयोजन रहा. पूरे कार्यक्रम में सिंगल यूज प्लास्टिक का प्रयोग नहीं किया गया. अतिथियों का स्वागत पारंपरिक बुके या फूलमालाओं के स्थान पर जीवित पौधे भेंट कर किया गया, जो स्थायी पर्यावरणीय संदेश का प्रतीक बना.
यह पहल दर्शाती है कि संस्थान केवल विचार प्रस्तुत नहीं कर रहा, बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी को व्यवहारिक रूप में भी अपनाने का प्रयास कर रहा है.
सामूहिक संकल्प के साथ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित सभी प्राध्यापकों, प्रशिक्षार्थियों एवं नागरिकों ने पर्यावरण संरक्षण की सामूहिक शपथ लेकर प्रकृति संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की.
कार्यक्रम का संचालन सहायक प्राध्यापक डॉ. संजीव तिवारी ने प्रभावी शैली में किया, जबकि आभार प्रदर्शन श्रीमती रेखा त्रिपाठी द्वारा किया गया. इस अवसर पर महाविद्यालय के अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी, एम.एड. एवं बी.एड. प्रशिक्षार्थी तथा गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे.
शिक्षा संस्थानों की भूमिका: सतत भविष्य की आधारशिला
यह सेमिनार इस तथ्य को रेखांकित करता है कि शिक्षा संस्थान पर्यावरण जागरूकता के सबसे प्रभावी केंद्र बन सकते हैं. जब भावी शिक्षक पर्यावरणीय मूल्यों को अपनाते हैं, तो उसका सकारात्मक प्रभाव व्यापक समाज पर पड़ता है.
विशेषज्ञों ने निष्कर्ष रूप में कहा कि:
- पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय आवश्यक है,
- सतत विकास के लिए जीवनशैली परिवर्तन अनिवार्य है,
- पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक आंदोलन बनाना होगा.
निष्कर्ष
CTE रीवा में आयोजित यह सेमिनार पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामूहिक जागरूकता का सशक्त उदाहरण बनकर सामने आया. कार्यक्रम ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना विकास की कोई भी अवधारणा अधूरी है.
मानव सभ्यता का भविष्य सुरक्षित रखने के लिए अब समय आ गया है कि पर्यावरण संरक्षण को विचार नहीं, बल्कि जीवनशैली बनाया जाए.
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