Table of Contents
Toggleभागीरथपुरा कांड: मौतों के आंकड़ों पर हाईकोर्ट की सख्ती
भागीरथपुरा कांड: भागीरथपुरा कांड में हाईकोर्ट में तीन याचिकाओं पर सुनवाई तय, मौतों के आंकड़ों को लेकर फिर उठा सवाल. जानिए पूरे मामले का ताजा अपडेट, प्रशासन की भूमिका और याचिकाकर्ताओं की मांगें.
भागीरथपुरा कांड का ताजा घटनाक्रम
इंदौर के भागीरथपुरा कांड को लेकर एक बार फिर न्यायिक हलकों में हलचल तेज हो गई है. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में इस मामले से जुड़ी तीन अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ बहस किए जाने की तैयारी है. हालिया सुनवाई में अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मौतों के वास्तविक आंकड़ों और प्रशासनिक कार्रवाई पर कड़े सवाल उठाए हैं.
यह मामला केवल एक स्थानीय विवाद नहीं रहा, बल्कि अब यह प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है.
तीन याचिकाएँ, एक सवाल: सच क्या है?
हाईकोर्ट के समक्ष जिन तीन याचिकाओं पर बहस होनी है, उनमें प्रमुख रूप से ये बिंदु उठाए गए हैं—
-
भागीरथपुरा कांड में वास्तविक मौतों की संख्या
-
सरकारी रिकॉर्ड और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में अंतर
-
प्रशासन द्वारा घटना के बाद की गई कार्रवाई की निष्पक्षता
-
पीड़ित परिवारों को मुआवजा और न्याय की स्थिति
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि मौतों के आंकड़े कम करके दिखाए गए, जिससे पूरे मामले की गंभीरता को दबाने की कोशिश की गई.
यह भी पढ़ें-अंकिता भंडारी हत्याकांड: पूरा मामला, जांच और ताज़ा अपडेट
मौतों के आंकड़े फिर कटघरे में
इस केस का सबसे संवेदनशील पहलू हमेशा से मौतों की संख्या रहा है. आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज आंकड़े और स्थानीय लोगों के दावों में स्पष्ट अंतर बताया जा रहा है.
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि—
-
कई मौतें रिकॉर्ड में शामिल ही नहीं की गईं
-
कुछ मामलों को “अन्य कारणों” से हुई मौत बताकर अलग कर दिया गया
-
स्वतंत्र जांच के बिना ही अंतिम रिपोर्ट तैयार कर दी गई
इसी वजह से हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब मांगा है.
हाईकोर्ट का रुख और प्रशासन से सवाल
हालिया कार्यवाही के दौरान अदालत ने यह संकेत दिए कि यदि आंकड़ों में विसंगति पाई जाती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच हो सकती है.
कोर्ट ने मुख्य सचिव (CS) स्तर से जवाब तलब करते हुए यह जानना चाहा है कि—
-
जांच किन आधारों पर की गई
-
क्या किसी स्वतंत्र एजेंसी से सत्यापन कराया गया
-
पीड़ित परिवारों की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई
यह भी कहा गया कि “कानून व्यवस्था के नाम पर सच को छुपाया नहीं जा सकता.”
नए अधिकारियों से उम्मीदें
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह दलील भी रखी गई कि हाल के समय में नए IAS अधिकारियों की तैनाती हुई है, जो इंदौर की जमीनी सच्चाई को बेहतर समझ सकते हैं.
उनका मानना है कि—
-
नई प्रशासनिक टीम से निष्पक्ष जांच की उम्मीद
-
पुराने निर्णयों की दोबारा समीक्षा की संभावना
-
पीड़ितों को न्याय मिलने की नई राह
यह तर्क कोर्ट के सामने इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि प्रशासनिक बदलाव अक्सर लंबित मामलों में नई दिशा देते हैं.
भागीरथपुरा कांड क्यों बना बड़ा मुद्दा?
भागीरथपुरा कांड केवल एक घटना नहीं, बल्कि यह कई सवाल खड़े करता है—
-
क्या प्रशासन समय रहते स्थिति संभाल पाया?
-
क्या पीड़ितों की आवाज़ दबाई गई?
-
क्या आंकड़ों की हेराफेरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा है?
इसी कारण यह मामला अब मानवाधिकार संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मीडिया की लगातार निगरानी में है.
आगे क्या?
अदालत में तीनों याचिकाओं पर होने वाली बहस से यह तय होगा कि—
-
क्या मामले की नई या स्वतंत्र जांच होगी
-
क्या मौतों के आंकड़ों का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा
-
क्या दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई संभव है
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुनवाई मध्यप्रदेश में प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए नजीर बन सकती है.
निष्कर्ष
भागीरथपुरा कांड में हाईकोर्ट की सख्ती यह स्पष्ट संकेत देती है कि सच चाहे जितना असहज क्यों न हो, उसे सामने आना ही होगा.
तीन याचिकाओं पर होने वाली बहस न सिर्फ इस मामले की दिशा तय करेगी, बल्कि यह भी बताएगी कि सिस्टम जनता के सवालों के प्रति कितना जवाबदेह है.
अब सबकी निगाहें अदालत के अगले आदेश पर टिकी हैं.