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इंदौर: इंदौर के भागीरथपुरा कांड में हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से जवाब तलब किया है. दूषित पानी से मौतों, प्रशासनिक लापरवाही, याचिकाकर्ताओं की दलील और नए IAS अधिकारियों की भूमिका पर पढ़ें पूरी रिपोर्ट.
भागीरथपुरा कांड: हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से मांगा जवाब, प्रशासन पर गंभीर सवाल
इंदौर मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के भागीरथपुरा इलाके में सामने आए दूषित पानी कांड ने अब संवैधानिक और प्रशासनिक स्तर पर गंभीर रूप ले लिया है. इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए राज्य के मुख्य सचिव (Chief Secretary) से सीधे जवाब तलब किया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा मामला है.
भागीरथपुरा में दूषित पेयजल की आपूर्ति के कारण बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े, कई को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और कुछ मौतों की भी पुष्टि हुई. इस घटना ने इंदौर जैसे स्मार्ट सिटी के दावों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.
दूषित पानी से फैली बीमारी, बढ़ा मौतों का आंकड़ा
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार बीते दिनों भागीरथपुरा और आसपास के इलाकों में उल्टी-दस्त, तेज बुखार और डिहाइड्रेशन के मामले तेजी से सामने आए. सरकारी आंकड़ों में दर्जनों मरीजों के अस्पताल में भर्ती होने की बात कही गई है, जबकि स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का दावा है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है.
अस्पतालों में मरीजों की भीड़, दवाओं की कमी और साफ पानी की वैकल्पिक व्यवस्था न होने से स्थिति और गंभीर होती गई। लोगों का आरोप है कि शिकायतों के बावजूद नगर निगम और जल आपूर्ति विभाग ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए.
हाईकोर्ट की सख्ती: मुख्य सचिव से जवाब क्यों?
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने नगर निगम और राज्य सरकार द्वारा पेश की गई रिपोर्ट पर असंतोष जताया. अदालत ने कहा कि केवल टैंकरों से पानी पहुंचाने या अस्थायी उपायों से इस गंभीर संकट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
इसी के साथ कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव को 15 जनवरी को वर्चुअल रूप से पेश होकर जवाब देने के निर्देश दिए हैं. न्यायालय यह जानना चाहता है कि
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दूषित पानी की आपूर्ति कैसे हुई
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जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की गई
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भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए क्या स्थायी व्यवस्था की जा रही है
यह कदम इस बात का संकेत है कि कोर्ट इस मामले को बेहद गंभीरता से ले रहा है.
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याचिकाकर्ताओं की दलील: “नए IAS आ रहे हैं, जो इंदौर को समझेंगे”
हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका के दौरान याचिकाकर्ताओं ने प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा सवाल उठाया. उनका कहना था कि इंदौर जैसे बड़े और जटिल शहर को चलाना किसी प्रयोगशाला या “चारागाह” की तरह नहीं होना चाहिए.
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि जल्द ही नए IAS अधिकारी शहर में पदस्थ हो रहे हैं और उम्मीद है कि वे जमीनी हकीकत को समझते हुए काम करेंगे. उनका तर्क था कि बार-बार अधिकारियों का तबादला और स्थानीय समस्याओं की समझ की कमी ऐसे हादसों को जन्म देती है.
हालांकि इस बयान पर सरकार की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन यह टिप्पणी प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है.
राजनीतिक घमासान और विपक्ष के आरोप
भागीरथपुरा कांड अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है. विपक्षी दलों ने राज्य सरकार और नगर निगम पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा है कि समय रहते जल पाइपलाइन, सीवरेज और फिल्ट्रेशन सिस्टम की जांच होती तो यह हादसा नहीं होता.
कांग्रेस और अन्य संगठनों ने प्रभावित परिवारों के लिए मुआवजे, दोषी अधिकारियों पर आपराधिक कार्रवाई और स्वतंत्र जांच की मांग की है. आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन और न्याय यात्राओं की भी घोषणा की गई है.
प्रशासनिक बदलाव और सुधार के दावे
राज्य सरकार ने मामले के बाद कुछ प्रशासनिक बदलाव किए हैं. नगर निगम स्तर पर अधिकारियों की जिम्मेदारियां तय की गई हैं और जल आपूर्ति व्यवस्था की तकनीकी जांच के आदेश दिए गए हैं.
प्रशासन का दावा है कि
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प्रभावित इलाकों में साफ पानी की नियमित आपूर्ति शुरू कर दी गई है
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मेडिकल कैंप और हेल्थ सर्विलांस टीमें तैनात की गई हैं
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पानी के सैंपल की लैब जांच कराई जा रही है
हालांकि स्थानीय लोग अब भी स्थायी समाधान और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं.
अगली सुनवाई पर टिकी निगाहें
15 जनवरी को होने वाली अगली सुनवाई को इस मामले का निर्णायक मोड़ माना जा रहा है. मुख्य सचिव की पेशी के बाद यह स्पष्ट होगा कि राज्य सरकार इस संकट से क्या सबक लेती है और क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं.
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ, तो भविष्य में कड़े निर्देश और निगरानी समिति का गठन भी किया जा सकता है.
निष्कर्ष
भागीरथपुरा कांड ने यह साबित कर दिया है कि शहरी विकास के दावों के बीच बुनियादी सुविधाओं में लापरवाही कितनी घातक हो सकती है। हाईकोर्ट की सख्ती और मुख्य सचिव से जवाब तलब किया जाना एक मजबूत संदेश है कि जनस्वास्थ्य से जुड़े मामलों में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी.
अब देखना यह है कि प्रशासन सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहता है या वास्तव में इंदौर को सुरक्षित और जवाबदेह व्यवस्था की ओर ले जाता है.