Vindhya First

भारत में मैकाले का ढांचा विवाद: ‘राम मंदिर बनाना आसान था, मैकाले का ‘ढांचा’ गिराना बहुत कठिन’

भारत में मैकाले का ढांचा विवाद: 'राम मंदिर बनाना आसान था, मैकाले का 'ढांचा' गिराना बहुत कठिन'

भारत में मैकाले का ढांचा विवाद: ‘राम मंदिर बनाना आसान था, मैकाले का ‘ढांचा’ गिराना बहुत कठिन’

भारत में मैकाले का ढांचा विवाद: भव्य राम मंदिर का निर्माण हो चुका है और अयोध्या में फिर से भगवान राम विराजमान हैं. यह एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उपलब्धि है जिसने करोड़ों लोगों के हृदय में एक नया उत्साह और गर्व भर दिया है. लेकिन अब एक बड़ा सवाल उठ रहा है: क्या भौतिक ढांचे का निर्माण कर लेना ही एकमात्र लक्ष्य था? या इससे भी बड़ी चुनौती अब हमारे सामने है – वह है हमारी सोच में गहराई तक बैठे ‘मैकाले के ढांचे’ को तोड़ने की?

भारत में मैकाले का ढांचा विवाद: 'राम मंदिर बनाना आसान था, मैकाले का 'ढांचा' गिराना बहुत कठिन'
भारत में मैकाले का ढांचा विवाद: ‘राम मंदिर बनाना आसान था, मैकाले का ‘ढांचा’ गिराना बहुत कठिन’

मैकाले का ‘ढांचा’ क्या है?

1835 में, ब्रिटिश शासन के दौरान, लॉर्ड थॉमस बबिंगटन मैकाले ने ‘मैकाले मिनट’ पेश किया था. इसका स्पष्ट उद्देश्य था – ऐसे एक ‘वर्ग’ का निर्माण करना जो “रक्त और रंग से तो भारतीय हो, लेकिन रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज हो”.

यह ढांचा केवल एक शिक्षा प्रणाली नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति थी हमारे आत्म-गौरव, हमारी भाषाओं, और हमारी सांस्कृतिक पहचान को नष्ट करने की. इसने अंग्रेजी को ज्ञान और उच्चता की भाषा बना दिया और भारतीय भाषाओं व ज्ञान-विज्ञान को हेय दृष्टि से देखना सिखाया.

भौतिक ढांचा बनाम मानसिक ढांचा

राम मंदिर का निर्माण एक भौतिक और प्रतीकात्मक ढांचा है. यह एक स्पष्ट, ठोस और दिखने वाला लक्ष्य था. इसके लिए कानूनी, सामाजिक और तकनीकी लड़ाई लड़ी गई और अंततः सफलता मिली.

लेकिन मैकाले का ढांचा एक मानसिक ढांचा है. यह हमारे दिमाग में, हमारी सोच में, हमारे मूल्यों में चुपचाप बैठा हुआ है. इसे गिराने के लिए किसी न्यायालय या सरकार का फैसला काफी नहीं है. इसके लिए आत्म-मंथन, शिक्षा में सुधार और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की लंबी लड़ाई लड़नी होगी.

क्यों है यह इतना कठिन?

मैकाले का ढांचा गिराना इतना कठिन है क्योंकि:

  1. यह गहराई तक समाया हुआ है: यह व्यवस्था 150 साल से भी अधिक समय से चली आ रही है. इसने कई पीढ़ियों की मानसिकता को आकार दिया है.

  2. अंग्रेजी का वर्चस्व: आज भी उच्च शिक्षा, बेहतर नौकरियों और सामाजिक प्रतिष्ठा का रास्ता अंग्रेजी भाषा से होकर ही गुजरता है.

  3. आत्म-विश्वास की कमी: इस व्यवस्था ने हमें अपनी परंपराओं, ज्ञान और इतिहास पर संदेह करना सिखा दिया है. हम अक्सर पश्चिमी मानकों को ही श्रेष्ठ मान बैठते हैं.

  4. शिक्षा प्रणाली में जड़ें: हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली अब भी उसी ढांचे पर काफी हद तक चल रही है, जहां रटंत विद्या और अंकों पर जोर है, मौलिक सोच और भारतीय चिंतन पर नहीं.

रास्ता क्या है?

इस मानसिक गुलामी से मुक्ति का रास्ता स्पष्ट है लेकिन चुनौतीपूर्ण है:

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 एक साहसिक कदम है जो मातृभाषा में शिक्षा और भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देती है.

  • हमें अपने बच्चों को भारतीय भाषाओं, इतिहास, दर्शन और वैज्ञानिक उपलब्धियों से गर्व कराना होगा.

  • अंग्रेजी को एक कौशल के रूप में सीखें, लेकिन उसे श्रेष्ठता का पर्याय बनने न दें.

निष्कर्ष

राम मंदिर का निर्माण एक चिरप्रतीक्षित सपने का साकार होना है. यह एक शानदार शुरुआत है. लेकिन असली स्वतंत्रता तब मिलेगी जब हम अपनी मानसिक दासता की जंजीरों को तोड़ देंगे. मैकाले के ढांचे को गिराना कोई विरोध या घृणा का अभियान नहीं, बल्कि आत्म-बोध और सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का अभियान है. यह वह लड़ाई है जो हर भारतीय को अपने भीतर लड़नी है. भौतिक मंदिर बन गया है, अब समय है अपने भीतर के मंदिर को फिर से स्थापित करने का.

पूर्व CJI बीआर गवई: ‘मुझे हिंदू विरोधी कहना पूरी तरह गलत… नहीं स्वीकार करूंगा सरकारी पद’, बोले पूर्व CJI बीआर गवई