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MP 5-Day Working संकट: CM ने तय की ऑफिस टाइमिंग

MP 5-Day Working संकट: CM ने तय की ऑफिस टाइमिंग

MP 5-Day Working संकट: CM ने तय की ऑफिस टाइमिंग

MP 5-Day Working संकट:  मध्यप्रदेश में 5-डे वर्किंग सिस्टम पर संकट गहराता दिख रहा है. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सरकारी कर्मचारियों के लिए ऑफिस पहुँचने की स्पष्ट टाइमिंग तय कर दी है. जानिए नए निर्देश, प्रशासन की सख्ती, कर्मचारियों की चिंता और 5-डे वर्किंग का भविष्य.

मध्यप्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के लिए लागू 5-डे वर्किंग सिस्टम एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस व्यवस्था को लेकर अब संकट के संकेत मिलने लगे हैं. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में स्पष्ट कर दिया है कि यदि 5-डे वर्किंग जारी रखनी है, तो सरकारी कर्मचारियों को समय की सख्ती से पालन करना होगा. इसी क्रम में मुख्यमंत्री ने ऑफिस पहुँचने की तय टाइमिंग को लेकर सख्त निर्देश जारी किए हैं.

राज्य सरकार का मानना है कि 5-डे वर्किंग का लाभ तभी संभव है जब प्रशासनिक कामकाज में अनुशासन और कार्यक्षमता बनी रहे. समय पर कार्यालय न खुलना, कर्मचारियों की देर से उपस्थिति और काम में देरी जैसी शिकायतें लगातार सामने आ रही थीं, जिसके बाद मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा.

क्या है 5-डे वर्किंग सिस्टम?

मध्यप्रदेश में 5-डे वर्किंग सिस्टम के तहत सरकारी कार्यालयों में सोमवार से शुक्रवार तक काम होता है, जबकि शनिवार और रविवार अवकाश रहता है. इस व्यवस्था का उद्देश्य कर्मचारियों को बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस देना और कार्यक्षमता बढ़ाना था.

हालांकि, समय बीतने के साथ यह सामने आया कि कई कार्यालयों में समय का पालन ठीक से नहीं हो रहा है. इससे आम जनता को सरकारी कामों के लिए अनावश्यक इंतजार करना पड़ रहा है, जो शासन की छवि के लिए भी चिंता का विषय बना.

CM मोहन यादव का सख्त रुख

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सरकारी कार्यालयों में सुबह 10 बजे कार्य शुरू होना अनिवार्य होगा. उन्होंने यह भी संकेत दिए कि कार्यालय समय का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई की जा सकती है.

मुख्यमंत्री का कहना है कि 5-डे वर्किंग कोई अधिकार नहीं, बल्कि एक सुविधा है, और यह सुविधा तभी मिलेगी जब कर्मचारी पूरा कार्य समय ईमानदारी से दें. उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि उपस्थिति और समयपालन पर कड़ी निगरानी रखी जाए.

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बायोमेट्रिक अटेंडेंस पर जोर

सरकार अब बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम को और प्रभावी ढंग से लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है. इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि कर्मचारी समय पर कार्यालय पहुंचें और बिना उपस्थिति दर्ज कराए काम से न जाएं.

प्रशासन का मानना है कि डिजिटल निगरानी से लापरवाही पर रोक लगेगी और सरकारी कार्यालयों की कार्यसंस्कृति में सुधार आएगा. यह कदम सीधे तौर पर 5-डे वर्किंग संकट से जुड़ा हुआ माना जा रहा है.

क्यों बढ़ा 5-डे वर्किंग पर संकट?

बीते कुछ महीनों में कई विभागों से शिकायतें सामने आईं कि:

  • कार्यालय देर से खुलते हैं

  • कर्मचारी समय से पहले चले जाते हैं

  • फाइलों का निपटारा धीमा हो गया है

  • आम जनता को परेशानी उठानी पड़ रही है

इन्हीं कारणों से सरकार को यह सोचना पड़ा कि यदि व्यवस्था पर नियंत्रण नहीं हुआ, तो 5-डे वर्किंग को जारी रखना मुश्किल हो सकता है.

क्या खत्म हो सकती है 5-डे वर्किंग?

हालांकि सरकार ने अभी तक 5-डे वर्किंग सिस्टम को समाप्त करने का कोई आधिकारिक फैसला नहीं लिया है, लेकिन मुख्यमंत्री के बयान को कड़ी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है.

संकेत साफ हैं—
अगर समयपालन और कार्य अनुशासन में सुधार नहीं हुआ, तो सरकार इस व्यवस्था पर पुनर्विचार कर सकती है.  इससे कर्मचारियों में भी चिंता बढ़ गई है.

कर्मचारी संगठनों की प्रतिक्रिया

कर्मचारी संगठनों का कहना है कि 5-डे वर्किंग से कर्मचारियों का मनोबल बढ़ता है और कार्यक्षमता में भी सुधार होता है. उनका तर्क है कि कुछ मामलों के कारण पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है.

हालांकि वे यह भी स्वीकार करते हैं कि अनुशासन जरूरी है, और समय की पाबंदी का पालन सभी को करना चाहिए.

सरकार की आगे की रणनीति

राज्य सरकार अब प्रशासनिक सुधारों पर फोकस कर रही है। इसमें:

  • कार्यालय समय का सख्त पालन

  • तकनीक आधारित निगरानी

  • लंबित मामलों का तेजी से निपटारा

  • योजनाओं की समयबद्ध समीक्षा

जैसे कदम शामिल हैं. सरकार का लक्ष्य है कि सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर हो और जनता को समय पर राहत मिले.

निष्कर्ष

मध्यप्रदेश में MP 5-Day Working संकट एक गंभीर प्रशासनिक मुद्दा बनता जा रहा है. मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा तय की गई ऑफिस टाइमिंग और सख्त निर्देश यह साफ संकेत देते हैं कि सरकार अब किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है.

आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि कर्मचारी समयपालन को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या 5-डे वर्किंग सिस्टम अपनी विश्वसनीयता बनाए रख पाता है या नहीं.

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