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Toggleमध्यप्रदेश: मध्यप्रदेश गेहूं खरीदी संकट, किसानों की बढ़ती परेशानी पर सियासत तेज
मध्यप्रदेश में इस बार गेहूं खरीदी का सीजन किसानों के लिए राहत से ज्यादा परेशानी लेकर आया है. प्रदेशभर से सामने आ रही शिकायतों ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष Jitendra Patwari ने भाजपा सरकार पर किसानों के साथ अन्याय और खरीदी व्यवस्था में भारी अव्यवस्था फैलाने के आरोप लगाए हैं.
ई-उपार्जन पोर्टल की तकनीकी दिक्कतों से लेकर खरीदी केंद्रों की बदहाल स्थिति, भुगतान में देरी और बारदानों की कमी तक… कांग्रेस ने सरकार को कई मोर्चों पर घेरा है.अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या प्रदेश की गेहूं खरीदी व्यवस्था वास्तव में किसानों के लिए संकट बन चुकी है, या फिर यह केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा है.
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किसानों के लिए मुश्किल बना खरीदी सीजन
हर साल गेहूं खरीदी सीजन किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय होता है. किसान उम्मीद करते हैं कि उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP पर समय पर भुगतान मिलेगा और उनकी मेहनत का सही दाम मिलेगा.
लेकिन इस बार प्रदेश के कई जिलों से जो तस्वीर सामने आ रही है, वह चिंता बढ़ाने वाली है.
किसानों का कहना है कि सरकारी खरीदी केंद्रों पर व्यवस्था बेहद धीमी है और कई जगहों पर उन्हें घंटों नहीं बल्कि कई-कई दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है.
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार जमीन पर व्यवस्था सुधारने के बजाय केवल आंकड़ों और प्रचार पर ध्यान दे रही है.
ई-उपार्जन पोर्टल बना किसानों की सबसे बड़ी परेशानी
गेहूं खरीदी प्रक्रिया में इस बार सबसे ज्यादा शिकायतें ई-उपार्जन पोर्टल को लेकर सामने आई हैं.
किसानों का कहना है कि स्लॉट बुकिंग की प्रक्रिया बेहद जटिल हो गई है.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के मुताबिक—
- किसानों को समय पर स्लॉट नहीं मिल रहे
- पोर्टल बार-बार डाउन हो रहा है
- स्लॉट खुलते ही कुछ मिनटों में भर जा रहे हैं
- तकनीकी खराबी के कारण कई किसानों का पंजीयन अटक गया है
इस वजह से किसान अपनी उपज लेकर खरीदी केंद्रों के चक्कर काटने को मजबूर हैं.
ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट और तकनीकी जानकारी की कमी पहले से ही बड़ी समस्या है. ऐसे में पूरी प्रक्रिया के डिजिटल होने से छोटे और सीमांत किसानों की परेशानियां और बढ़ गई हैं.
सैटेलाइट सर्वे और AI सत्यापन पर उठे सवाल
इस बार सरकार ने खरीदी प्रक्रिया में सैटेलाइट सर्वे और AI आधारित सत्यापन प्रणाली का उपयोग किया है.
सरकार का उद्देश्य फर्जी पंजीयन रोकना और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना बताया गया था.
लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि तकनीकी सत्यापन में भारी गड़बड़ी हुई है.
कई किसानों का कहना है कि उनके खेतों में गेहूं की फसल मौजूद होने के बावजूद रिकॉर्ड में जानकारी गलत दिखाई गई.
कुछ मामलों में—
- किसानों का पंजीयन निरस्त हो गया
- कई आवेदन लंबित दिखाए गए
- जमीन और फसल के रिकॉर्ड मेल नहीं खा रहे
इससे असली किसान खरीदी प्रक्रिया से बाहर होने का खतरा महसूस कर रहे हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक का उपयोग जरूरी है, लेकिन यदि स्थानीय स्तर पर सत्यापन मजबूत न हो तो इसका नुकसान सीधे किसानों को उठाना पड़ सकता है.
खरीदी केंद्रों पर अव्यवस्था के आरोप
प्रदेशभर के कई खरीदी केंद्रों से अव्यवस्था की तस्वीरें और शिकायतें सामने आ रही हैं.
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि कई केंद्रों पर बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है.
मुख्य शिकायतें इस प्रकार हैं—
तौल मशीनों की कमी
कई केंद्रों पर पर्याप्त तौल मशीनें उपलब्ध नहीं हैं, जिससे प्रक्रिया धीमी हो रही है.
लंबी कतारें
किसानों को अपनी ट्रॉलियों के साथ कई दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है.
कर्मचारियों की कमी
कुछ केंद्रों पर पर्याप्त कर्मचारी नहीं होने से खरीदी कार्य प्रभावित हो रहा है.
धूप और गर्मी में इंतजार
भीषण गर्मी के बीच किसानों को खुले में इंतजार करना पड़ रहा है, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ गई है.
ग्रामीण इलाकों से सामने आ रही तस्वीरें यह दिखाती हैं कि कई किसानों को रात तक खरीदी केंद्रों पर रुकना पड़ रहा है.
बारदानों की कमी बना नया विवाद
इस बार गेहूं खरीदी में बारदानों यानी बोरे की कमी भी बड़ा मुद्दा बन गई है.
कांग्रेस का आरोप है कि कई जगह किसानों पर खुद बारदाने लाने का दबाव बनाया जा रहा है.
यदि ऐसा होता है तो किसानों की लागत बढ़ना तय है.
किसानों का कहना है कि—
- उन्हें अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है
- समय बर्बाद हो रहा है
- खरीदी प्रक्रिया और धीमी हो रही है
हालांकि सरकार की ओर से कई बार यह दावा किया गया है कि बारदानों की पर्याप्त व्यवस्था की गई है, लेकिन जमीनी स्तर पर शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं.
MSP भुगतान में देरी से बढ़ी चिंता
गेहूं खरीदी में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भुगतान का होता है.
किसान उम्मीद करते हैं कि उपज बेचने के तुरंत बाद उन्हें पैसा मिल जाए ताकि वे अगली फसल की तैयारी कर सकें.
लेकिन इस बार भुगतान को लेकर भी कई शिकायतें सामने आई हैं.
कांग्रेस का आरोप है कि—
- कई किसानों को समय पर भुगतान नहीं मिला
- बैंकिंग लिंकिंग में तकनीकी दिक्कतें हैं
- पोर्टल अपडेट में देरी हो रही है
- भुगतान की स्थिति स्पष्ट नहीं है
इससे किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है.
कई किसान कर्ज, खाद-बीज और घरेलू खर्चों के लिए खरीदी भुगतान पर निर्भर रहते हैं.
नमी और गुणवत्ता के नाम पर कटौती के आरोप
किसानों की एक बड़ी शिकायत यह भी है कि नमी और गुणवत्ता जांच के नाम पर उनकी उपज में कटौती की जा रही है.
कुछ किसानों का आरोप है कि—
- गेहूं को रिजेक्ट किया जा रहा है
- वजन कम दर्ज किया जा रहा है
- गुणवत्ता मानकों को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं दी जा रही
इससे किसानों में नाराजगी बढ़ रही है.
विशेषकर छोटे किसानों के लिए यह स्थिति ज्यादा मुश्किल बनती जा रही है, क्योंकि उनके पास लंबे समय तक उपज रोककर रखने की क्षमता नहीं होती.
बिचौलियों की भूमिका पर कांग्रेस का हमला
कांग्रेस ने खरीदी केंद्रों पर बिचौलियों के सक्रिय होने का भी आरोप लगाया है.
पटवारी का कहना है कि छोटे किसान सरकारी प्रक्रिया से परेशान होकर मजबूरी में व्यापारियों को कम दाम पर गेहूं बेचने को मजबूर हो रहे हैं.
यदि ऐसा हो रहा है तो यह MSP व्यवस्था के मूल उद्देश्य पर सवाल खड़े करता है.
सरकारी खरीदी का मकसद किसानों को उचित मूल्य और सुरक्षित बाजार उपलब्ध कराना होता है.
लेकिन यदि किसान कम कीमत पर निजी व्यापारियों को उपज बेचने लगें, तो इसका सीधा नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ता है.
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
प्रदेश सरकार के लिए यह मुद्दा अब केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक चुनौती भी बनता जा रहा है.
क्योंकि मध्यप्रदेश देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में शामिल है और यहां बड़ी संख्या में किसान सरकारी खरीदी व्यवस्था पर निर्भर रहते हैं.
यदि किसानों की नाराजगी बढ़ती है तो इसका असर राजनीतिक माहौल पर भी दिखाई दे सकता है.
सरकार लगातार दावा कर रही है कि खरीदी प्रक्रिया सुचारु रूप से चल रही है और रिकॉर्ड स्तर पर गेहूं खरीदा जा रहा है.
लेकिन विपक्ष का कहना है कि सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर है.
कांग्रेस ने आंदोलन की चेतावनी दी
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने साफ कहा है कि यदि जल्द व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो कांग्रेस किसानों के साथ सड़क पर उतरकर आंदोलन करेगी.
कांग्रेस इस मुद्दे को किसान हित और सरकारी लापरवाही से जोड़कर लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए है.
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन आरोपों पर क्या जवाब देती है और जमीनी स्तर पर सुधार के लिए क्या कदम उठाती है.
बड़ा सवाल यही है…
- क्या मध्यप्रदेश की गेहूं खरीदी व्यवस्था किसानों को राहत देने में नाकाम हो रही है?
- क्या तकनीकी व्यवस्थाएं किसानों के लिए नई मुश्किल बन गई हैं?
- और क्या सरकार समय रहते इन समस्याओं का समाधान कर पाएगी?
प्रदेश के लाखों किसानों की नजर अब सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई है.
निष्कर्ष
मध्यप्रदेश में गेहूं खरीदी को लेकर बढ़ता विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं दिख रहा.
जमीनी स्तर पर किसानों की समस्याओं की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं.
डिजिटल व्यवस्था, पोर्टल सिस्टम और तकनीकी सत्यापन का उद्देश्य प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना था, लेकिन यदि इससे किसानों को परेशानी हो रही है तो सरकार को तत्काल समाधान की दिशा में काम करना होगा.
क्योंकि कृषि केवल अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका और भरोसे का सवाल है.
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