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दवा हड़ताल: 15 लाख दवा दुकानों की हड़ताल से स्वास्थ्य व्यवस्था प्रभावित

शभर में दवा दुकानों की बड़ी हड़ताल! ऑनलाइन दवा बिक्री के विरोध में 15 लाख मेडिकल स्टोर बंद

दवा हड़ताल: 15 लाख दवा दुकानों की हड़ताल से स्वास्थ्य व्यवस्था प्रभावित

देशभर में दवा कारोबार से जुड़े लाखों व्यापारियों ने ऑनलाइन दवा बिक्री और कॉर्पोरेट कंपनियों के बढ़ते दबदबे के खिलाफ बड़ा विरोध प्रदर्शन किया. ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) के आह्वान पर भारत के कई राज्यों में करीब 15 लाख मेडिकल स्टोर एक दिन के लिए बंद रहे. इस हड़ताल का असर मध्यप्रदेश, बिहार, चंडीगढ़, पंजाब, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में साफ दिखाई दिया.

इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य छोटे मेडिकल स्टोर संचालकों को बचाना, नकली दवाओं की बिक्री रोकना और ऑनलाइन फार्मेसी कंपनियों पर सख्त नियम लागू करवाना है. दवा व्यापारियों का कहना है कि बिना पर्याप्त नियंत्रण के ऑनलाइन दवा बिक्री लोगों की सेहत के लिए खतरा बन सकती है.

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क्यों हुई देशव्यापी दवा हड़ताल?

दवा विक्रेताओं का आरोप है कि बड़ी ऑनलाइन फार्मेसी कंपनियां नियमों की अनदेखी कर बाजार पर कब्जा करने की कोशिश कर रही हैं. इससे छोटे दुकानदारों का कारोबार तेजी से प्रभावित हो रहा है.

केमिस्ट संगठनों का कहना है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भारी डिस्काउंट देकर ग्राहकों को आकर्षित करते हैं, जबकि स्थानीय मेडिकल स्टोर इतने बड़े स्तर पर छूट नहीं दे सकते. इससे हजारों छोटे व्यवसाय बंद होने की कगार पर पहुंच रहे हैं.

इसके अलावा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिना वैध डॉक्टर पर्ची के दवाएं बेचने और नकली या गलत दवा सप्लाई होने की शिकायतें भी लगातार सामने आ रही हैं.

चार प्रमुख मांगों को लेकर आंदोलन

दवा व्यापारियों ने सरकार के सामने चार प्रमुख मांगें रखी हैं. उनका कहना है कि जब तक इन मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक संघर्ष जारी रहेगा.

1. ऑनलाइन दवा बिक्री पर सख्त नियंत्रण

केमिस्ट संगठनों की मांग है कि बिना स्पष्ट नियमों के ऑनलाइन दवा बिक्री तुरंत रोकी जाए. उनका कहना है कि इससे लोगों की जान को खतरा बढ़ सकता है.

2. ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट में बदलाव वापस हो

व्यापारियों ने आरोप लगाया कि नए बदलाव बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाले हैं. इससे पारंपरिक मेडिकल स्टोर कमजोर हो रहे हैं.

3. फर्जी और नकली पर्चियों पर रोक

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर फर्जी डॉक्टर पर्चियों के जरिए दवाएं बेचने का आरोप लगाया गया है. संगठन चाहते हैं कि इसकी जांच और निगरानी सख्ती से हो.

4. छोटे दुकानदारों को संरक्षण

स्थानीय मेडिकल स्टोर संचालकों का कहना है कि ऑनलाइन कंपनियों की भारी छूट के कारण उनका व्यापार खत्म हो रहा है. सरकार को छोटे व्यापारियों के हित में नीति बनानी चाहिए.

किन राज्यों में दिखा हड़ताल का असर?

मध्यप्रदेश

भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और रीवा समेत कई शहरों में मेडिकल स्टोर बंद रहे. हालांकि अस्पताल परिसरों के अंदर संचालित मेडिकल स्टोर खुले रखे गए ताकि मरीजों को आपातकालीन दवाएं मिल सकें.

बिहार

पटना सहित कई जिलों में मेडिकल स्टोर बंद रहने से मरीजों और उनके परिजनों को परेशानी का सामना करना पड़ा. कई लोग जरूरी दवाओं के लिए इधर-उधर भटकते नजर आए.

चंडीगढ़ और पंजाब

चंडीगढ़ में पीजीआई जैसे बड़े अस्पतालों के बाहर दवा दुकानों के बंद रहने से मरीजों को दिक्कत हुई. पंजाब में भी व्यापक स्तर पर मेडिकल स्टोर बंद रखे गए.

छत्तीसगढ़

राज्य में हजारों मेडिकल स्टोर बंद रहे. हालांकि अस्पतालों से जुड़े स्टोरों को राहत दी गई ताकि गंभीर मरीज प्रभावित न हों.

आम लोगों पर क्या पड़ा असर?

एक दिन की इस हड़ताल का सीधा असर मरीजों और आम नागरिकों पर देखने को मिला. कई लोगों को नियमित दवाएं खरीदने में परेशानी हुई. खासकर बुजुर्ग, गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीज और दूर-दराज क्षेत्रों के लोग ज्यादा प्रभावित हुए.

हालांकि केमिस्ट संगठनों ने दावा किया कि आपातकालीन सेवाओं को ध्यान में रखते हुए अस्पतालों के मेडिकल स्टोर खुले रखे गए थे. फिर भी कई शहरों में दवा उपलब्धता को लेकर अफरा-तफरी का माहौल रहा.

ऑनलाइन दवा बिक्री पर बढ़ती बहस

भारत में ई-फार्मेसी का बाजार तेजी से बढ़ रहा है. कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन दवा डिलीवरी को बढ़ावा मिला, जिससे लोगों को घर बैठे दवाएं मिलने लगीं. लेकिन इसके साथ कई विवाद भी सामने आए.

विशेषज्ञों का मानना है कि ऑनलाइन दवा बिक्री पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन इसके लिए मजबूत नियम और निगरानी जरूरी है. यदि बिना जांच और डॉक्टर सलाह के दवाएं बेची जाएंगी तो यह गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकता है.

दूसरी ओर छोटे दवा व्यापारी इसे अपने रोजगार और अस्तित्व पर खतरा मान रहे हैं. उनका कहना है कि बड़े कॉर्पोरेट मॉडल के कारण पारंपरिक मेडिकल स्टोर खत्म हो सकते हैं.

सरकार के सामने बड़ी चुनौती

सरकार के लिए यह मुद्दा संतुलन बनाने की चुनौती बन गया है. एक तरफ डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ लाखों छोटे व्यापारियों की आजीविका भी दांव पर लगी है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार को ऐसा नियम बनाना होगा जिसमें:

  • मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित हो,
  • नकली दवाओं पर रोक लगे,
  • ऑनलाइन बिक्री पारदर्शी हो,
  • और छोटे दुकानदारों के हित सुरक्षित रहें.

क्या आगे भी जारी रहेगा आंदोलन?

दवा व्यापारियों के संगठनों ने संकेत दिए हैं कि यदि उनकी मांगों पर जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो आने वाले समय में आंदोलन और तेज हो सकता है. संभव है कि देशभर में फिर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किए जाएं.

केमिस्ट संगठनों का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ व्यापार की नहीं बल्कि लोगों की सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की भी है.

निष्कर्ष

देशभर में 15 लाख मेडिकल स्टोरों की हड़ताल ने स्वास्थ्य सेवाओं और दवा वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. ऑनलाइन दवा बिक्री को लेकर बढ़ती चिंता, छोटे दुकानदारों का भविष्य और मरीजों की सुरक्षा — ये तीनों मुद्दे अब राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुके हैं.

सरकार के लिए अब जरूरी हो गया है कि वह डिजिटल सुविधा और पारंपरिक व्यापार के बीच संतुलित नीति तैयार करे, ताकि न तो मरीजों की सुरक्षा प्रभावित हो और न ही लाखों छोटे व्यापारियों की आजीविका संकट में पड़े.

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