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Toggleमध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश में गहराता कुपोषण संकट, आंकड़ों में चौंकाने वाला उछाल और ज़मीनी हकीकत
मध्य प्रदेश, जिसे अक्सर भारत का हृदय कहा जाता है, वर्तमान में एक गंभीर स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा है. ताज़ा पोषण ट्रैकर रिपोर्ट (Nutrition Tracker Report) के आंकड़े राज्य में बच्चों के स्वास्थ्य की एक डरावनी तस्वीर पेश कर रहे हैं. विशेष रूप से ‘वेस्टिंग’ (Wasting) यानी कद के अनुपात में कम वजन के मामलों में आई भारी वृद्धि ने प्रशासन और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है.
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1. आंकड़ों की जुबानी: 9% से 17% का खतरनाक सफर
रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के कई जिलों में कुपोषण के स्तर में भारी उछाल देखा गया है. 2025 में जहाँ वेस्टिंग का स्तर 9% से 10% के आसपास था, वहीं अब यह बढ़कर 17% तक पहुँच गया है. यह आंकड़ा सीधे तौर पर बच्चों में ‘एक्यूट मालन्यूट्रिशन’ (तीव्र कुपोषण) की ओर इशारा करता है, जो जीवन के लिए बेहद जोखिम भरा है.
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स्टंटिंग (Stunting): राज्य में बच्चों का कद उनकी उम्र के अनुसार न बढ़ने की समस्या (Stunting) अभी भी 26% से 50% के बीच बनी हुई है.
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ठहराव: जनवरी से मार्च 2026 के बीच कई जिलों में इन आंकड़ों में कोई सुधार नहीं देखा गया, जो व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है.
2. जिलों की स्थिति: कहाँ कितनी गंभीर है समस्या?
मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में कुपोषण की स्थिति को नीचे दी गई तालिका से समझा जा सकता है:
| जिला | स्टंटिंग (कम कद) | अंडरवेट (कम वजन) | वेस्टिंग (अत्यधिक दुबलापन) |
| श्योपुर | 50-51% | 23-25% | 3-4% |
| शिवपुरी | 47-49% | 23-26% | 5-7% |
| खंडवा | 47% | 29% | 6% |
| सागर/जबलपुर | 45-46% | 23-25% | 7-8% |
| धार/बड़वानी | 42-44% | 33-34% | 10-12% |
| बालाघाट | 34% | 26-30% | 12-17% (गंभीर) |
इंदौर (33%) और भोपाल (28-29%) जैसे विकसित जिले भी स्टंटिंग के चिंताजनक स्तर से मुक्त नहीं हैं.
3. ज़मीनी हकीकत: मासूमों की जान पर बन आई
आंकड़े केवल कागजों तक सीमित नहीं हैं; वे उन मासूम जिंदगियों की कहानी कह रहे हैं जो भूख और बीमारी से लड़ रहे हैं.
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सतना की त्रासदी: मझगवां में 22 अप्रैल को चार महीने की मासूम सुप्रांशी की कुपोषण के कारण मृत्यु हो गई. इस घटना के बाद हुई जांच में उसी क्षेत्र में 10 और कुपोषित बच्चे पाए गए.
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पन्ना का संघर्ष: सुनहेरा गाँव की तीन महीने की पल्लवी का वजन उसकी उम्र के सामान्य वजन से आधा है. उसके माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं और उचित पोषण सुनिश्चित करने में असमर्थ हैं.
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जागरूकता का अभाव: पन्ना जिले की ही 14 महीने की रिंकी गंभीर कुपोषण का शिकार है, लेकिन उसका परिवार उसे पोषण पुनर्वास केंद्र (NRC) में भर्ती कराने को तैयार नहीं है, क्योंकि उन्हें वहां के इलाज पर भरोसा नहीं है.
“कुपोषण केवल भोजन की कमी नहीं है, बल्कि यह गरीबी, अशिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच न होने का एक जटिल मिश्रण है.”
4. चुनौतियां और सरकारी प्रयास
हालाँकि सरकार पोषण अभियान और आंगनबाड़ियों के माध्यम से प्रयास कर रही है, लेकिन परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं हैं. मुख्य चुनौतियां निम्नलिखित हैं:
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पलायन और गरीबी: दिहाड़ी मजदूरी करने वाले परिवारों के पास बच्चों की देखभाल के लिए पर्याप्त संसाधन और समय की कमी.
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भ्रांतियां: ग्रामीण क्षेत्रों में NRC और अस्पताल के इलाज को लेकर आज भी डर और झिझक का माहौल है.
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निगरानी में कमी: जिला स्तर पर पोषण संकेतकों की नियमित ट्रैकिंग और तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है.
5. निष्कर्ष: अब जागने का समय है
मध्य प्रदेश में कुपोषण के बढ़ते मामले एक अलार्म बेल हैं. यदि वेस्टिंग का स्तर इसी तरह बढ़ता रहा, तो यह आने वाली पीढ़ी की कार्यक्षमता और मानसिक विकास को स्थायी रूप से प्रभावित करेगा. प्रशासन को न केवल भोजन वितरण, बल्कि स्वास्थ्य शिक्षा और सामुदायिक भागीदारी पर भी ज़ोर देना होगा.
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