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Toggleमऊगंज: मऊगंज नलजल योजना में 3.85 करोड़ पर EOW की FIR
मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले में जल जीवन मिशन के तहत संचालित नल-जल योजना अब करोड़ों रुपये के भुगतान और अधूरे निर्माण को लेकर जांच के घेरे में है. नईगढ़ी विकासखंड के कई गांवों में वर्ष 2021-22 के दौरान शुरू हुए इन कार्यों के लिए करीब 3 करोड़ 85 लाख 900 रुपये का कार्यादेश और भुगतान हुआ। शिकायतों के बाद आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ यानी ईओडब्ल्यू की जांच में रिकॉर्ड और मौके पर मिले काम के बीच कथित अंतर सामने आने की बात कही गई है. खटखरी गांव में पानी की टंकी पहली बार पानी भरने के दौरान ढह गई, जबकि अन्य गांवों में भी पाइपलाइन, नल कनेक्शन, पंप और टैंक से जुड़े काम अधूरे मिलने का दावा किया गया. इसी आधार पर ईओडब्ल्यू ने तत्कालीन पीएचई अधिकारियों और ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज कर विवेचना शुरू की है.
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3.85 करोड़ का काम और जांच के घेरे में भुगतान
जल जीवन मिशन का मूल उद्देश्य ग्रामीण परिवारों तक पाइप के जरिए सुरक्षित पेयजल पहुंचाना है. इसी उद्देश्य के तहत मऊगंज जिले के नईगढ़ी क्षेत्र के विभिन्न गांवों में पानी की टंकियों, संपवेल, पंपिंग व्यवस्था, पाइपलाइन और घरेलू नल कनेक्शन से जुड़े कार्य स्वीकृत किए गए थे.
उपलब्ध जांच विवरण के अनुसार इन कार्यों के लिए मेसर्स शिवेंद्र कुमार तिवारी को करीब 3 करोड़ 85 लाख 900 रुपये का कार्यादेश दिया गया. जांच में यह आरोप सामने आया कि काम पूरी तरह उपयोगी स्थिति में आने से पहले ही भुगतान कर दिया गया. बाद में मौके के निरीक्षण में कई कार्य अधूरे पाए जाने की बात सामने आई.
यहां सबसे बड़ा सवाल सिर्फ रकम का नहीं है. सवाल यह है कि जिस योजना का अंतिम लक्ष्य ग्रामीण परिवारों के घर तक पानी पहुंचाना था, अगर उसके निर्माण कार्य अधूरे थे तो उन्हें पूरा मानने की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ी? किस स्तर पर निरीक्षण हुआ? किस आधार पर माप पुस्तिका और भुगतान संबंधी दस्तावेज तैयार हुए? और यदि जमीन पर काम अधूरा था, तो भुगतान की स्वीकृति किस प्रक्रिया के तहत हुई?
ईओडब्ल्यू की जांच और एफआईआर के बाद अब इन्हीं सवालों के जवाब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे. अभी एफआईआर दर्ज होना आरोपों की जांच की शुरुआत है, अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं.
योजना से जुड़े प्रमुख तथ्य
- योजना के कार्य वर्ष 2021-22 के दौरान स्वीकृत बताए गए हैं.
- क्षेत्र: नईगढ़ी विकासखंड, मऊगंज.
- प्रमुख गांव: खटखरी, करह उर्फ खैरागढ़, शिवराजपुर और जुड़मनिया-रघुनाथ.
- कार्यों में ओवरहेड टैंक, संपवेल, पाइपलाइन, पंप और घरेलू नल कनेक्शन शामिल थे.
- करीब 3 करोड़ 85 लाख 900 रुपये के भुगतान को लेकर जांच हुई.
- ईओडब्ल्यू ने तीन तत्कालीन पीएचई अधिकारियों और ठेकेदार को नामजद किया है.
खटखरी में पानी भरते ही ढह गई टंकी
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा सवाल खटखरी गांव की पानी की टंकी को लेकर उठे. मार्च 2026 में करीब 30 फीट ऊंची नवनिर्मित टंकी में पहली बार पानी भरकर उसकी टेस्टिंग की जा रही थी. रिपोर्टों के अनुसार पानी भरने के दौरान टंकी ढह गई.
टंकी के ढहने की घटना ने निर्माण की गुणवत्ता पर तत्काल सवाल खड़े कर दिए. स्थानीय स्तर पर निर्माण सामग्री और तकनीकी मानकों को लेकर भी सवाल उठाए गए। हालांकि, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और तकनीकी प्रक्रिया से ही होगी.
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार टंकी की क्षमता करीब 75 हजार लीटर बताई गई है. एक रिपोर्ट में इसकी निर्माण लागत करीब 75 लाख रुपये बताई गई है. टंकी रिहायशी इलाके से अलग होने के कारण बड़ा जनहानि वाला हादसा टल गया.
लेकिन इस घटना को सिर्फ एक निर्माण दुर्घटना मानकर आगे बढ़ जाना भी पर्याप्त नहीं होगा. क्योंकि इसी परियोजना से जुड़े दूसरे कार्यों की स्थिति की जांच के दौरान भी कथित कमियां सामने आने की बात कही गई है.
यही वजह है कि अब सवाल एक टंकी के गिरने से आगे बढ़कर पूरी परियोजना की निगरानी और भुगतान व्यवस्था तक पहुंच गया है.
गांवों में जमीन पर क्या मिला?
ईओडब्ल्यू और तकनीकी जांच से जुड़े विवरणों के अनुसार अलग-अलग गांवों में योजना के तहत प्रस्तावित कार्यों और मौके की स्थिति में अंतर मिलने का दावा किया गया है.
खटखरी में पाइपलाइन और घरेलू नल कनेक्शन से संबंधित कार्यों पर सवाल सामने आए. कुछ रिपोर्टों में करीब 4,400 मीटर पाइपलाइन और 315 घरेलू नल कनेक्शन का प्रावधान बताया गया है. जांच में पाइपलाइन का काम अधूरा और घरों में नल फिटिंग नहीं होने की बात कही गई है.
करह उर्फ खैरागढ़ में भी योजना के तहत पंपिंग व्यवस्था और घरेलू कनेक्शन को लेकर सवाल सामने आए. जांच रिपोर्टों के अनुसार पांच मोटर पंप के प्रावधान के मुकाबले मौके पर एक सबमर्सिबल मोटर मिलने की बात कही गई है. इसी तरह 740 घरेलू कनेक्शन के दावे के बावजूद घरों में नल फिटिंग नहीं मिलने की बात रिपोर्टों में सामने आई है.
शिवराजपुर में ओवरहेड टैंक और संपवेल के अधूरे होने की बात जांच से जुड़ी रिपोर्टों में कही गई है. वहीं जुड़मनिया-रघुनाथ क्षेत्र में मुख्य पाइपलाइन भी पूरी तरह नहीं बिछने का दावा किया गया.
समस्या और जमीन पर असर
| जांच में सामने आया मुद्दा | संभावित सीधा असर |
|---|---|
| टंकी का ढहना | जल भंडारण व्यवस्था प्रभावित |
| अधूरी पाइपलाइन | घरों तक पानी पहुंचाने में बाधा |
| घरेलू नल फिटिंग नहीं होना | कागजी कनेक्शन और वास्तविक सुविधा में अंतर |
| पंपिंग व्यवस्था में कमी | नियमित जलापूर्ति प्रभावित |
| अधूरे निर्माण के बावजूद भुगतान का आरोप | सरकारी धन के उपयोग पर सवाल |
इन सभी बिंदुओं का सबसे बड़ा असर ग्रामीण परिवारों पर पड़ता है. नल-जल योजना का उद्देश्य केवल पाइप और टंकी बनाना नहीं, बल्कि घर तक नियमित पेयजल पहुंचाना है. अगर निर्माण हो जाए लेकिन पानी न पहुंचे, तो योजना का वास्तविक लाभ ग्रामीणों तक नहीं पहुंचता.
पांच साल में भी पूरा नहीं हुआ काम?
जल जीवन मिशन के तहत इन परियोजनाओं को निर्धारित अवधि में पूरा किया जाना था. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार निर्माण कार्य के लिए करीब नौ महीने की समयसीमा बताई गई थी. लेकिन वर्ष 2021-22 में शुरू हुई परियोजनाओं से जुड़े कई कामों को लेकर वर्ष 2026 तक भी अधूरे होने के सवाल सामने आए हैं.
यानी यहां मामला केवल देरी का नहीं है। यदि रिकॉर्ड में कार्य पूरा दिखाया गया और मौके पर अधूरा काम मिला, तो दोनों के बीच अंतर की जिम्मेदारी तय करना जरूरी होगा.
घटनाक्रम पर एक नजर
- 2021-22: नईगढ़ी क्षेत्र के गांवों में जल जीवन मिशन के तहत कार्य स्वीकृत.
- कार्यादेश: मेसर्स शिवेंद्र कुमार तिवारी को करीब 3.85 करोड़ रुपये का कार्यादेश.
- निर्धारित अवधि: परियोजना को करीब नौ महीने में पूरा किया जाना था.
- मार्च 2026: खटखरी में पानी की टंकी टेस्टिंग के दौरान ढही.
- इसके बाद: निर्माण की गुणवत्ता और योजना के अन्य कार्यों को लेकर शिकायत और जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी.
- सितंबर 2026: ईओडब्ल्यू ने तीन तत्कालीन पीएचई अधिकारियों और ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की.
EOW की FIR में कौन-कौन नामजद?
ईओडब्ल्यू ने इस मामले में तत्कालीन कार्यपालन यंत्री जे.पी. यानी जनार्दन प्रसाद द्विवेदी, तत्कालीन सहायक यंत्री संजय पाण्डेय, तत्कालीन उपयंत्री ए.पी. तिवारी और ठेकेदार शिवेन्द्र कुमार तिवारी के खिलाफ मामला दर्ज किया है.
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 316(5), 318(4), 61(2) तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है.
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि एफआईआर किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध नहीं करती. यह कानूनन जांच की शुरुआत है। आरोपों की पुष्टि या खंडन आगे की विवेचना, दस्तावेजों, तकनीकी जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा.
अब ईओडब्ल्यू के सामने कई अहम बिंदुओं की जांच की जिम्मेदारी है.
पैसा खर्च हुआ, पानी पहुंचा या नहीं?
मऊगंज का यह मामला सरकारी योजनाओं में एक बुनियादी अंतर को सामने रखता है—कागज पर पूरा हुआ काम और जमीन पर मिली सुविधा एक ही चीज नहीं होती.
सरकारी योजना का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितनी राशि स्वीकृत हुई, कितनी राशि खर्च हुई या कितनी संरचनाएं बनाई गईं. अंतिम कसौटी यह है कि जिस ग्रामीण परिवार के लिए योजना बनाई गई थी, क्या उसके घर तक नियमित और सुरक्षित पेयजल पहुंचा?
यदि किसी गांव में टंकी खड़ी है लेकिन उसमें पानी नहीं पहुंचता, पाइपलाइन बिछी है लेकिन घर तक कनेक्शन नहीं है, या रिकॉर्ड में कनेक्शन दर्ज है लेकिन नल से पानी नहीं आता, तो योजना के वास्तविक उद्देश्य पर सवाल खड़ा होता है.
यही वजह है कि इस मामले में आगे की जांच का दायरा केवल एफआईआर में नामजद लोगों तक सीमित रहने के बजाय पूरी प्रक्रिया को समझने वाला होना चाहिए. कार्यादेश से लेकर निर्माण, माप, गुणवत्ता परीक्षण, निरीक्षण, भुगतान और जलापूर्ति शुरू होने तक हर चरण की जांच से ही तस्वीर स्पष्ट होगी.
आगे क्या होना चाहिए?
अब सबसे महत्वपूर्ण है कि ईओडब्ल्यू की विवेचना तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर आगे बढ़े. निर्माण से संबंधित तकनीकी रिकॉर्ड, भुगतान दस्तावेज, माप पुस्तिकाएं, गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट, स्थल निरीक्षण रिपोर्ट और योजना के पूर्णता प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज जांच के महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं.
साथ ही जिन गांवों में काम अधूरा बताया गया है, वहां स्वतंत्र तकनीकी सत्यापन से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि स्वीकृत कार्यों में से वास्तव में कितना काम हुआ और कितना बाकी है.
ग्रामीणों के लिए इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जांच के दौरान उनकी पेयजल सुविधा प्रभावित न हो। यदि योजना अधूरी है तो उसे निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुसार पूरा करना और वास्तविक जलापूर्ति सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए.
मऊगंज की यह कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सवाल केवल एक ढही हुई पानी की टंकी का नहीं है. सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें करोड़ों रुपये की योजना ग्रामीणों के घर तक पानी पहुंचाने के लिए बनाई गई, लेकिन जांच के दौरान कई स्तरों पर काम अधूरा मिलने का दावा सामने आया.
अब ईओडब्ल्यू की एफआईआर ने मामले को कानूनी जांच के अगले चरण में पहुंचा दिया है। आगे की विवेचना यह तय करेगी कि भुगतान किस प्रक्रिया से हुआ, निर्माण में किसकी क्या भूमिका थी और सरकारी धन के इस्तेमाल में नियमों का पालन हुआ या नहीं. अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा.
रिपोर्ट: लवकेश सिंह
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