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नेत्रहीन बच्चे ब्रेल प्रणाली से लेते हैं शिक्षा, इनकी ज़िंदगी में भी रात का अंधेरा ढलते ही होता है सुबह का उजाला

नेत्रहीन विद्यालय यमुना प्रसाद शास्त्री

मध्यप्रदेश का पहला नेत्रहीन विद्यालय यमुना प्रसाद शास्त्री नेत्रहीन एवं विकलांग विद्यालय रीवा में स्थित है. 5 वर्ष पहले तक यह प्रदेश भर में इकलौता नेत्रहीन विद्यालय था. यहां कुदरती बच्चे अपनी जिंदगी के दिन गुज़ार रहे हैं, एक मंज़िल तलाशने की कोशिश में लगे हुए हैं. वो बच्चे जो इस रंगीन दुनिया की चकाचौंध को नहीं देख सकते हैं रात ढलते ही सुबह उठते हैं, अपनी दिनचर्या पूरी करते हैं, बिना किसी सहारे के.

रीवा संभाग के अलग अलग हिस्से से आई ये लड़कियां बचपन से यहीं रह रही हैं, अपनी पढ़ाई पूरी कर रही हैं. कोई कक्षा 2 में है तो कोई 8 में तो कोई कक्षा 12 में है. इनसे मिलने आने वाले लोगों का नाम ये साइन लैंग्वेज में रखती हैं और पुकारती हैं. कुदरत ने कुछ बच्चों को बोलने के लिए आवाज़ नहीं दी, सुनने की शक्ति नहीं दी, पर इनका विश्वास बुलंद है. ऐसे बच्चों को समाज मूक – बधिर कहता है.

नेत्रहीन बच्चों के पास अक्षरों को पढ़ने के लिए आंखें नहीं हैं फिर भी वो पढ़ाई करते हैं. ब्रेल पद्धति द्वारा. ब्रेल, उभरे हुए बिंदुओं की एक प्रणाली है जिसे अंधे या कम दृष्टि वाले लोग उंगलियों से पढ़ सकते हैं. ब्रेल कोई भाषा नहीं है. बल्कि, यह एक कोड है जिसके द्वारा कई भाषाएँ – जैसे स्पेनिश, अंग्रेजी, अरबी, चीनी और दर्जनों अन्य भाषाएं लिखी और पढ़ी जा सकती हैं. ब्रेल का उपयोग दुनिया भर में हजारों लोगों द्वारा अपनी मूल भाषाओं में किया जाता है, और यह सभी के लिए साक्षरता का रास्ता बनता है.

कुदरत से ज़्यादा समाज की उपेक्षा का शिकार

इस अंधेरी दुनिया में ज्ञान का उजाला भरने की कोशिश शुरू की तो जिम्मेदारों की उपेक्षा का शिकार बन गए. इन बच्चों को कुदरत की अनदेखी से अधिक विद्यालय में शिक्षकों की उपेक्षा ख़ल रही है. 127 नेत्रहीन छात्रों की देख रेख के लिए 2 शिक्षक, और छात्राओं के लिए 1 शिक्षिका हैं. बताया गया कि, पहले 22 शिक्षक थे, अब भर्तियां रुकी हुई हैं. विद्यालय के प्रभारी प्राचार्य शिक्षकों की इस संख्या को अपर्याप्त मान रहे हैं. विद्यालय के कक्षा संचालन से लेकर कार्यालय तक के काम बिना शिक्षकों की मदद के संभव नहीं है. इसी वजह से बच्चों को पढ़ाई में नुकसान भी उठाना पड़ रहा है. जानकारी के मुताबिक नेत्रहीन विद्यालय में आवासीय सुविधा के मद्देनजर सामाजिक न्याय विभाग की ओर से एक छात्र को हर महीने नौ सौ रुपए दिया जाता है, इसी नौ सौ रुपए में छात्रों के भोजन, कपड़े, किताबें यहां तक की बिजली का बिल भी भरा जाता है.