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ToggleRewa: जान जोखिम में डाल लकड़ी के पुल से गुजरने को मजबूर ग्रामीण
Rewa: रीवा जिले के जवा तहसील अंतर्गत रौली गांव के मुसलहा टोला की तस्वीर विकास के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है. आजादी के दशकों बाद भी यहां के ग्रामीणों को नदी पार करने के लिए पक्का पुल नसीब नहीं हुआ. मजबूरी ऐसी बनी कि गांव वालों ने प्रशासन से कई बार गुहार लगाने के बाद खुद ही लकड़ियों और बांस के सहारे नदी पर अस्थायी पुल तैयार कर लिया.
आज यही पुल गांव की जीवनरेखा बना हुआ है. इसी रास्ते से बच्चे स्कूल जाते हैं, महिलाएं छोटे बच्चों को गोद में लेकर निकलती हैं और ग्रामीण रोजी-रोटी के लिए जान जोखिम में डालकर आवाजाही करते हैं. हालांकि पुल की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता है.
बरसाती समस्या अब पूरे साल की परेशानी बनी
रौली गांव बरदाहा घाटी के नीचे स्थित है. गांव के पास से गुजरने वाली नदी पहले केवल बरसात के दिनों में परेशानी का कारण बनती थी. लेकिन ग्रामीणों के अनुसार टोंस परियोजना का पानी इस नदी से छोड़े जाने के बाद अब सालभर पानी बना रहता है.
ऐसे में गांव के सामने दो ही विकल्प बचे. या तो जान जोखिम में डालकर नदी पार करें या फिर मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए 15 से 20 किलोमीटर का लंबा चक्कर लगाएं. दोनों ही स्थितियां ग्रामीणों के लिए कठिन थीं.
ग्रामीणों ने दिखाई अनोखी इंजीनियरिंग
जब प्रशासन से लगातार मांग के बावजूद पुल नहीं बना, तो गांव के लोगों ने खुद समाधान तलाश लिया.
ग्रामीणों ने अपने-अपने घरों से लकड़ियां, बांस और अन्य सामग्री जुटाई. सभी ने मिलकर नदी पर लकड़ी का पुल तैयार किया, ताकि गांव का संपर्क मुख्य मार्ग से बना रहे.
सुरक्षा के लिए पुल के किनारों पर लोहे की सरिया भी लगाई गई, लेकिन समय के साथ लकड़ियां कमजोर पड़ चुकी हैं. इसके बावजूद ग्रामीणों के पास इसी पुल का सहारा है.
हर दिन जान जोखिम में डालकर गुजरते हैं लोग
लकड़ी का यह पुल अब गांव के सैकड़ों लोगों की मजबूरी बन गया है. रोजाना स्कूली बच्चे इसी पुल से होकर स्कूल पहुंचते हैं. महिलाएं बच्चों को गोद में लेकर नदी पार करती हैं. किसान साइकिल और दोपहिया वाहन भी इसी पुल से निकालते हैं.
ग्रामीणों का कहना है कि पुल के बीच पहुंचते ही डर लगने लगता है. पुल हिलता है और ऐसा महसूस होता है कि कहीं वह टूट न जाए.
उनका कहना है कि कई बार लोग पुल से फिसल चुके हैं. कई घटनाओं में लोगों के पैर लकड़ियों के बीच फंस गए. हालांकि अब तक कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ, लेकिन खतरा लगातार बना हुआ है.
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20 किलोमीटर बचाने के लिए बनाया गया पुल
ग्रामीणों के अनुसार यदि यह पुल नहीं हो, तो उन्हें मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए 15 से 20 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है.
इसी वजह से गांव के लोगों ने वर्षों पहले यह अस्थायी पुल बनाया था. बरसात में जब पुल बह जाता है, तो ग्रामीण फिर से मिलकर इसे तैयार कर लेते हैं.
उनका कहना है कि यह कोई स्थायी समाधान नहीं है, लेकिन मजबूरी में यही एकमात्र रास्ता है.
कई बार लगाई गुहार, नहीं बना स्थायी पुल
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने वर्षों से प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने पुल निर्माण की मांग रखी है. कई बार आवेदन दिए गए, लेकिन अब तक स्थायी पुल का निर्माण नहीं हो सका.
उनका कहना है कि यदि समय रहते पुल बन जाता, तो आज उन्हें अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार नहीं करनी पड़ती.
कलेक्टर ने लिया मामले का संज्ञान
जब यह तस्वीर रीवा कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी के सामने पहुंची, तो उन्होंने तत्काल मामले का संज्ञान लिया.
कलेक्टर ने संबंधित एसडीएम को मौके पर जाकर स्थिति का निरीक्षण करने के निर्देश दिए हैं. उन्होंने कहा कि यदि ग्रामीण इस प्रकार की गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं, तो उसका शीघ्र समाधान किया जाएगा.
कलेक्टर ने यह भी आश्वासन दिया कि संबंधित स्थान पर स्थायी पुल निर्माण की दिशा में आवश्यक कार्रवाई की जाएगी, ताकि ग्रामीणों को सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिल सके.
अब स्थायी समाधान का इंतजार
रौली गांव के मुसलहा टोला के लोगों के लिए लकड़ी का पुल केवल नदी पार करने का साधन नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. लेकिन हर दिन इस पुल से गुजरना एक जोखिम भी है.
अब ग्रामीणों की उम्मीद प्रशासन से है कि वर्षों पुरानी इस समस्या का स्थायी समाधान किया जाएगा और जल्द ही यहां पक्का पुल बनाकर लोगों को सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिलेगी.
रिपोर्ट: हीरो गुप्ता
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