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मध्य प्रदेश: स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल, रीवा से MP तक क्या हाल?

मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बेहतर और सुरक्षित इलाज कब मिलेगा? क्या सिर्फ जांच और कार्रवाई से समस्या खत्म होगी, या स्वास्थ्य व्यवस्था में बुनियादी बदलाव की जरूरत है? देखिए पूरी पड़ताल और जानिए रीवा से लेकर पूरे मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी सच्चाई

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मध्य प्रदेश: स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल, रीवा से MP तक क्या हाल?

मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है. रीवा के संजय गांधी अस्पताल में एक बुजुर्ग मरीज को कथित तौर पर मृत घोषित किए जाने के बाद शव वाहन तक बुक हो गया, लेकिन अस्पताल से बाहर ले जाने के दौरान परिजनों को उसके सांस लेने का पता चला. मरीज को दोबारा उपचार के लिए भर्ती किया गया. इस घटना ने अस्पताल की कार्यप्रणाली और मरीजों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

लेकिन मामला सिर्फ एक अस्पताल तक सीमित नहीं है. रीवा में एक्सपायर्ड दवा दिए जाने के आरोप, सतना की सड़क दुर्घटना पीड़िता की मौत के बाद देखभाल पर उठे सवाल, बालाघाट में आदिवासी अंचल के 19 बच्चों की मौत, छिंदवाड़ा में दूषित कफ सिरप से बच्चों की मौत और इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों की जांच—ये सभी घटनाएं अलग-अलग हैं, लेकिन इनके बीच एक सवाल समान है.

क्या मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में इलाज के साथ-साथ निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत है?

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रीवा के संजय गांधी अस्पताल से उठे सबसे गंभीर सवाल

रीवा का संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय विंध्य क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण सरकारी अस्पतालों में से एक है. रीवा के अलावा सीधी, सतना, मऊगंज, सिंगरौली और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में मरीज यहां पहुंचते हैं.

ऐसे में यहां होने वाली हर घटना का असर हजारों परिवारों पर पड़ता है.

सितंबर 2026 में सामने आया मामला इसी वजह से बेहद गंभीर है.

रिपोर्टों के अनुसार, सीधी निवासी बुजुर्ग मरीज गिरिजा प्रसाद को अस्पताल में इलाज के दौरान मृत घोषित कर दिया गया. मृत्यु की कागजी प्रक्रिया पूरी होने के बाद परिजन अंतिम संस्कार की तैयारी में जुट गए और शव वाहन भी बुक कर लिया गया.

लेकिन जब मरीज को अस्पताल से ले जाया जा रहा था, तब परिजनों को शरीर में हलचल और सांस लेने का एहसास हुआ. इसके बाद उन्हें वापस अस्पताल लाया गया और दोबारा उपचार शुरू किया गया. अलग-अलग रिपोर्टों में मरीज की उम्र 66 से 70 वर्ष के बीच बताई गई है, इसलिए उम्र के आंकड़े को लेकर रिपोर्टिंग में अंतर है.

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसी मरीज को मृत घोषित करने से पहले अपनाई जाने वाली चिकित्सकीय प्रक्रिया कितनी सख्ती से लागू की गई?

अस्पताल के विभागीय स्तर से चिकित्सकीय चूक की बात सामने आने की रिपोर्ट भी है और मामले की जांच की बात कही गई है.

मामला यहीं खत्म नहीं होता

जून 2026 में इसी अस्पताल में आईसीयू में भर्ती मरीज को कथित तौर पर एक्सपायर्ड दवा या इंजेक्शन दिए जाने की शिकायत सामने आई थी.

अस्पताल प्रशासन ने शिकायत को गंभीर बताते हुए दवा के स्टॉक और वितरण व्यवस्था की जांच शुरू करने की बात कही थी. महत्वपूर्ण बात यह है कि यहां भी आरोप और जांच को अलग-अलग समझना जरूरी है. जब तक जांच पूरी न हो, इसे स्थापित तथ्य के रूप में नहीं बल्कि आरोप और जांच का विषय माना जाना चाहिए.

इसी बीच सतना की एक सड़क दुर्घटना पीड़िता अर्चना गुप्ता की मौत के बाद भी संजय गांधी अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल उठे. परिजनों ने आरोप लगाया कि भर्ती रहने के दौरान मरीज की पर्याप्त देखभाल नहीं हुई और बाद में उसके शरीर पर कीड़े दिखाई दिए.

इस मामले में भी अस्पताल पक्ष और परिजनों के दावों को जांच के बाद ही अंतिम रूप से स्थापित किया जा सकता है. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अस्पताल ने आरोपों से इनकार किया है.

यानी रीवा में तीन अलग-अलग घटनाएं हैं—

  • मरीज को मृत घोषित किए जाने का मामला.
  • एक्सपायर्ड दवा दिए जाने का आरोप.
  • दुर्घटना पीड़िता की देखभाल को लेकर परिजनों के आरोप.

इन तीनों को एक ही घटना या एक ही कारण से जोड़ना सही नहीं होगा, लेकिन इनसे अस्पताल की निगरानी, मरीज सुरक्षा और जवाबदेही पर सवाल जरूर उठते हैं.

डॉक्टरों की कमी: बीमारी की जड़ या व्यवस्था की कमजोरी?

अब सवाल है कि आखिर सरकारी अस्पतालों में ऐसी समस्याएं बार-बार क्यों सामने आती हैं?

इसका एक बड़ा कारण स्वास्थ्यकर्मियों की कमी माना जाता रहा है.

मध्य प्रदेश में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी लंबे समय से चिंता का विषय है. एक पूर्व अध्ययन में सीएचसी स्तर पर विशेषज्ञ डॉक्टरों के करीब 97 प्रतिशत पद खाली बताए गए थे. हालांकि यह आंकड़ा पुराना है, इसलिए इसे वर्तमान स्थिति का ताजा सरकारी आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा.

ताजा उपलब्ध स्वास्थ्य विभाग संबंधी आंकड़ों पर आधारित एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में 5,543 स्वीकृत विशेषज्ञ चिकित्सक पदों में से 3,698 पद रिक्त बताए गए हैं. चिकित्सा अधिकारियों के स्वीकृत पदों में भी बड़ी संख्या में पद खाली हैं.

इसका सीधा असर ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है.

एक ग्रामीण मरीज के सामने स्थिति कई बार ऐसी होती है—

गांव → प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र → सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र → जिला अस्पताल → मेडिकल कॉलेज.

हर स्तर पर रेफरल बढ़ता जाए तो इलाज का समय भी बढ़ता है और परिवार का खर्च भी.

सरकारी व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां

  • विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी
  • नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी
  • ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ सेवाओं की सीमित उपलब्धता
  • दवाओं और उपकरणों की निगरानी
  • अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण
  • मरीजों की निगरानी व्यवस्था
  • रेफरल सिस्टम की कमजोरी
  • शिकायतों के निपटारे में देरी

यानी सिर्फ डॉक्टर की संख्या बढ़ा देना पर्याप्त नहीं है.

अस्पताल में डॉक्टर के साथ नर्स, तकनीशियन, दवा प्रबंधन, सफाई, संक्रमण नियंत्रण और आपातकालीन व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए.

18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों का पीपीपी मॉडल: समाधान या नई बहस?

स्वास्थ्य व्यवस्था की इन्हीं चुनौतियों के बीच मध्य प्रदेश सरकार ने रीवा, देवास और गुना जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को सार्वजनिक-निजी भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल पर संचालित करने की मंजूरी दी है.

सरकार का तर्क है कि इसका उद्देश्य डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी को दूर करना तथा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना है. यह एक पायलट परियोजना के रूप में शुरू की जा रही है.

रिपोर्टों के अनुसार, इन 18 केंद्रों में पांच ऐसे केंद्र भी हैं जहां एक भी डॉक्टर तैनात नहीं होने की बात सामने आई थी.

मॉडल में अस्पताल की इमारत और सरकारी संपत्ति सरकार के पास रहेगी, जबकि डॉक्टरों और अन्य स्टाफ की नियुक्ति तथा प्रशिक्षण निजी संस्था की जिम्मेदारी होगी. दवाओं की व्यवस्था सरकार की ओर से किए जाने की बात भी सामने आई है.

सरकार का तर्क

सरकार मानती है कि यदि सरकारी तंत्र पर्याप्त डॉक्टर उपलब्ध नहीं करा पा रहा है, तो निजी भागीदारी के जरिए खाली पदों और विशेषज्ञ सेवाओं की कमी को तेजी से पूरा किया जा सकता है.

विरोध करने वालों की चिंता

स्वास्थ्य संगठनों और कुछ चिकित्सक संगठनों ने इस मॉडल पर सवाल उठाए हैं.

उनका तर्क है कि स्वास्थ्य सेवा सरकार की मूल जिम्मेदारी है और डॉक्टरों की कमी का समाधान सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करके किया जाना चाहिए. कुछ संगठनों ने निजी संचालन से भविष्य में जवाबदेही और पहुंच से जुड़े सवाल उठने की आशंका जताई है.

यहीं सबसे बड़ा सवाल सामने आता है—

अगर सरकारी अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं, तो क्या अस्पताल का संचालन बदलना समाधान है या डॉक्टरों की नियुक्ति की व्यवस्था बदलना समाधान है?

इसका जवाब प्रयोग के परिणामों से मिलेगा. लेकिन इसके लिए सरकार को पहले से स्पष्ट मानक तय करने होंगे.

मसलन—

सवाल जनता के लिए जरूरी जवाब
डॉक्टर कितने होंगे? स्वीकृत और वास्तविक संख्या सार्वजनिक हो
विशेषज्ञ उपलब्ध होंगे? विभागवार जानकारी जारी हो
दवाएं मिलेंगी? स्टॉक की नियमित निगरानी हो
शिकायत कौन सुनेगा? स्पष्ट जवाबदेही तय हो
मरीज की मौत पर जांच कौन करेगा? स्वतंत्र और समयबद्ध जांच हो

बालाघाट से छिंदवाड़ा और इंदौर तक: जब सिस्टम की कमजोरी जानलेवा बनी

मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल सिर्फ रीवा तक सीमित नहीं हैं.

बालाघाट: 19 बच्चों की मौत

बालाघाट के बैगा बहुल इलाकों में 19 बच्चों की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया.

लेकिन इस मामले में भी तथ्यों को सावधानी से समझना जरूरी है.

जांच में मौतों के लिए सिर्फ एक बीमारी को जिम्मेदार नहीं माना गया. मलेरिया, खसरा, कुपोषण, एनीमिया, निर्जलीकरण, श्वसन संबंधी परेशानी और अन्य संक्रमण जैसी कई चिकित्सकीय स्थितियां सामने आने की बात रिपोर्टों में कही गई है. इसलिए इसे केवल “पोषण आहार बंद होने से 19 मौतें” कहना तथ्य को अत्यधिक सरल बना देगा.

लेकिन इससे व्यवस्था पर सवाल खत्म नहीं होते.

अगर बच्चे नियमित टीकाकरण से छूट रहे हैं, कुपोषण की समस्या है और बीमारी फैलने के बाद समय पर स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंच पा रहीं, तो सवाल स्वास्थ्य निगरानी तंत्र पर उठेगा.

रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि खसरे से प्रभावित कुछ बच्चे नियमित टीकाकरण से छूटे हुए थे.

छिंदवाड़ा: दूषित कफ सिरप का मामला

2025 में छिंदवाड़ा में दूषित कफ सिरप से बच्चों की मौत का मामला सामने आया था.

रिपोर्टों के अनुसार इस मामले में मौतों का आंकड़ा 24 तक पहुंचा था और संबंधित सिरप में जहरीले रसायन की मौजूदगी की जांच में पुष्टि हुई थी.

यह घटना केवल डॉक्टर या अस्पताल की नहीं थी.

इसने दवा निर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण, आपूर्ति श्रृंखला, प्रिस्क्रिप्शन और नियामक निगरानी—पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए.

इंदौर: भागीरथपुरा का दूषित पानी

इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों की न्यायिक जांच ने भी गंभीर सवाल खड़े किए.

सितंबर 2026 में सामने आई रिपोर्ट के अनुसार जांच आयोग ने 36 मौतों में से 24 को सीवर का पानी मिलने से संबंधित माना और 8 से 10 अधिकारियों की जवाबदेही की बात सामने आई.

यह आंकड़ा आपके मूल मसौदे में दिए गए “36 मौतें सीवेज के पानी से” वाले दावे से अलग है.

यही वजह है कि पत्रकारिता में किसी भी आंकड़े को प्रकाशित करने से पहले उसकी नवीनतम जांच रिपोर्ट देखना जरूरी है.

समस्या सिर्फ अस्पताल की नहीं, जवाबदेही की भी है

अब पूरे मामले को एक साथ रखिए.

रीवा में मरीज की मृत्यु घोषित करने की प्रक्रिया पर सवाल.

एक अन्य मामले में एक्सपायर्ड दवा का आरोप.

सतना की मरीज के मामले में देखभाल पर सवाल.

बालाघाट में टीकाकरण और पोषण तक पहुंच की चुनौती.

छिंदवाड़ा में दवा की गुणवत्ता से जुड़ा गंभीर संकट.

इंदौर में पानी और पाइपलाइन की निगरानी की विफलता.

इनमें से हर घटना की वजह अलग हो सकती है.

लेकिन एक बात समान है—

सिस्टम में गलती होने के बाद जवाबदेही कितनी तेजी और कितनी पारदर्शिता से तय होती है?

किसी कर्मचारी को निलंबित कर देना जांच का अंत नहीं होना चाहिए.

जांच को यह भी देखना चाहिए कि—

  • गलती कहां हुई?
  • निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी?
  • शिकायत पहले क्यों नहीं पकड़ी गई?
  • रिकॉर्ड में क्या दर्ज किया गया?
  • जिम्मेदार अधिकारी कौन था?
  • भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए क्या बदलाव किए गए?

क्योंकि अगर हर घटना के बाद सिर्फ एक व्यक्ति को जिम्मेदार बताकर मामला खत्म कर दिया जाए, तो व्यवस्था की मूल समस्या बनी रह सकती है.

आम नागरिक क्या करे?

स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नागरिकों की जागरूकता भी महत्वपूर्ण है.

अगर किसी अस्पताल में गंभीर लापरवाही का संदेह हो तो सबसे पहले सबूत सुरक्षित रखना चाहिए.

जरूरी कदम

  • अस्पताल की पर्ची और डिस्चार्ज दस्तावेज सुरक्षित रखें.
  • दवाओं के बिल और पैकेट संभालकर रखें.
  • दवा का नाम, बैच नंबर और समाप्ति तिथि नोट करें.
  • जांच रिपोर्ट और चिकित्सकीय दस्तावेजों की प्रतियां रखें.
  • गंभीर मामले में लिखित शिकायत करें.
  • शिकायत की प्राप्ति या क्रमांक जरूर लें.
  • जरूरत पड़ने पर संबंधित स्वास्थ्य अधिकारी के सामने मामला रखें.
  • सरकारी सेवाओं से जुड़ी शिकायतों के लिए मध्य प्रदेश की आधिकारिक शिकायत व्यवस्था का इस्तेमाल करें.
  • गंभीर मामलों में कानूनी सलाह लेकर उचित मंच पर शिकायत की जा सकती है.

सोशल मीडिया पर शिकायत करना अंतिम समाधान नहीं है. सोशल मीडिया जनदबाव बना सकता है, लेकिन उसके साथ दस्तावेज और आधिकारिक शिकायत ज्यादा प्रभावी होती है.

स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की राह क्या है?

सबसे पहला कदम है—रिक्त पदों को भरना.

सरकार को सिर्फ डॉक्टरों की नियुक्ति नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञों को बनाए रखने की नीति बनानी होगी.

दूसरा कदम है—अस्पतालों में मरीज सुरक्षा की स्वतंत्र निगरानी.

तीसरा कदम है—दवाओं की खरीद से लेकर मरीज तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया की डिजिटल निगरानी.

चौथा कदम है—हर गंभीर चिकित्सकीय घटना की समयबद्ध जांच.

पांचवां कदम है—जिला स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक करना.

और छठा सबसे जरूरी कदम है—जनता को सिर्फ मरीज नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था का हितधारक मानना.

सरकार चाहे पीपीपी मॉडल अपनाए या पूरी तरह सरकारी व्यवस्था चलाए, जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा—

इलाज समय पर मिला या नहीं?

डॉक्टर उपलब्ध था या नहीं?

दवा सुरक्षित थी या नहीं?

और गलती होने पर जिम्मेदार कौन था?

निष्कर्ष: अस्पताल की दीवारों से आगे की लड़ाई

मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीर को केवल एक वायरल वीडियो या एक सनसनीखेज घटना से नहीं समझा जा सकता. रीवा का मामला गंभीर है, लेकिन इसे पूरे सरकारी स्वास्थ्य तंत्र का अंतिम प्रमाण भी नहीं कहा जा सकता. उसी तरह बालाघाट, छिंदवाड़ा और इंदौर की घटनाओं के कारण और परिस्थितियां अलग-अलग हैं.

लेकिन इन घटनाओं को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता.

क्योंकि सरकारी अस्पताल गरीब और मध्यम वर्ग के करोड़ों लोगों के लिए आखिरी भरोसा हैं.

इसलिए जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें डॉक्टर पर्याप्त हों, दवाएं सुरक्षित हों, मरीज की निगरानी हो, अस्पताल साफ और सुरक्षित हों और गलती होने पर जिम्मेदारी तय हो.

रीवा से लेकर बालाघाट और इंदौर तक संदेश साफ है—

स्वास्थ्य सेवा सिर्फ अस्पताल की इमारत नहीं है.

यह डॉक्टर, नर्स, दवा, उपकरण, सफाई, निगरानी, प्रशासन और जवाबदेही—इन सभी का संयुक्त सिस्टम है.

जब तक इन सभी कड़ियों को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक किसी एक योजना या किसी एक अधिकारी के भरोसे स्वास्थ्य व्यवस्था को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता.

और सबसे महत्वपूर्ण बात—

मरीज की जान के मामले में गलती की गुंजाइश सबसे कम होनी चाहिए.

यही किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की पहली कसौटी है.

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