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Toggleमऊगंज: बेटे को बचाने के लिए मां बनी ढाल, 90 मिनट की देरी ने छीन ली जान
मऊगंज: मध्यप्रदेश के मऊगंज जिले से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया हैण् जमुहरा गांव के पास हुए इस हादसे में एक मां ने अपने दो साल के बेटे को बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी. लेकिन हादसे के बाद जिस तरह प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली सामने आई, उसने लोगों के गुस्से को और बढ़ा दिया.
ग्रामीणों का आरोप है कि अगर पुलिस और एंबुलेंस समय पर पहुंच जाती, तो शायद महिला की जान बचाई जा सकती थी. यही वजह है कि घटना के बाद इलाके में भारी तनाव और आक्रोश का माहौल बन गया.
ओवरलोड हाइवा बना मौत का कारण
जानकारी के मुताबिक, जमुहरा गांव निवासी किरण कोल अपने दो साल के बेटे के साथ सड़क किनारे मौजूद थीं. इसी दौरान डस्ट से ओवरलोड एक तेज रफ्तार हाइवा वहां से गुजरा और महिला उसकी चपेट में आ गई.
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हादसे के ठीक पहले किरण ने अपने बेटे को बचाने के लिए उसे दूर फेंक दिया. बच्चा तो सुरक्षित बच गया, लेकिन मां खुद हाइवा के नीचे आ गई.
हादसा इतना भयावह था कि हाइवा महिला को करीब 100 मीटर तक घसीटता रहा. लोग लगातार चिल्लाते रहे, लेकिन ड्राइवर ने वाहन नहीं रोका.
ग्रामीणों ने पत्थर मारकर रुकवाया ट्रक
मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि ड्राइवर को रोकने के लिए ग्रामीणों ने सड़क पर दौड़ लगाई, लेकिन जब वाहन नहीं रुका तो लोगों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी. हाइवा का कांच टूटने के बाद कहीं जाकर वाहन रुका.
घटना के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई. सड़क पर चीख-पुकार और गुस्से का माहौल बन गया. लोग घायल महिला को बचाने की कोशिश करते रहे, लेकिन मदद समय पर नहीं पहुंच सकी.
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90 मिनट तक सड़क पर तड़पती रही महिला
ग्रामीणों और परिजनों का सबसे बड़ा आरोप पुलिस की देरी को लेकर है. उनका कहना है कि मऊगंज थाना घटनास्थल से ज्यादा दूर नहीं था, इसके बावजूद पुलिस को पहुंचने में करीब डेढ़ घंटा लग गया.
चश्मदीदों के मुताबिक, किरण कोल हादसे के बाद काफी देर तक जिंदा थीं और मदद की आस में सड़क पर तड़पती रहीं. लेकिन न तो समय पर एंबुलेंस पहुंची और न ही पुलिस.
परिजनों का आरोप है कि अगर समय पर इलाज मिलता, तो किरण की जान बच सकती थी. यही वजह है कि लोगों का गुस्सा पुलिस प्रशासन के खिलाफ फूट पड़ा.
सड़क पर शव रखकर ग्रामीणों का प्रदर्शन
घटना के बाद आक्रोशित ग्रामीणों ने सड़क पर शव रखकर प्रदर्शन शुरू कर दिया. करीब तीन घंटे तक सड़क जाम रही और लोगों ने प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की.
ग्रामीणों का कहना था कि इलाके में लंबे समय से ओवरलोड वाहनों का आतंक बना हुआ है. डस्ट और खनिज से भरे भारी वाहन तेज रफ्तार में गांवों से गुजरते हैं, जिससे लगातार हादसे हो रहे हैं. इसके बावजूद प्रशासन कार्रवाई नहीं करता.
स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि पुलिस और ग्रामीणों के बीच बहस और धक्का-मुक्की जैसी स्थिति भी बन गई.
सदमे में मासूम बच्चा
हादसे में बचा दो साल का बच्चा गहरे सदमे में है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, बच्चा डरा हुआ है और ठीक से कुछ बोल नहीं पा रहा.
प्राथमिक उपचार के बाद बच्चे को रीवा के संजय गांधी अस्पताल रेफर किया गया है. गांव में हर कोई उस मां की बहादुरी और ममता की चर्चा कर रहा है जिसने आखिरी सांस तक अपने बेटे की जिंदगी बचाने की कोशिश की.
ओवरलोड वाहनों पर फिर उठे सवाल
इस घटना के बाद एक बार फिर मऊगंज जिले में चल रहे ओवरलोड वाहनों पर सवाल उठने लगे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायतों के बावजूद ऐसे वाहनों पर कार्रवाई नहीं होती.
लोगों का आरोप है कि प्रशासन और जिम्मेदार विभाग रसूखदार ट्रांसपोर्टरों के सामने चुप्पी साध लेते हैं, जिसका खामियाजा आम लोगों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ता है.
सिस्टम पर बड़ा सवाल
मऊगंज का यह हादसा सिर्फ एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता की एक बड़ी तस्वीर बनकर सामने आया है. एक मां ने अपने बेटे को बचाने के लिए अपनी जान दे दी, लेकिन सवाल अब भी वही है — अगर मदद समय पर पहुंचती, तो क्या किरण कोल आज जिंदा होती?
फिलहाल पुलिस मामले की जांच की बात कह रही है, लेकिन गांव के लोगों को अब सिर्फ जांच नहीं, बल्कि जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई और ओवरलोड वाहनों के खिलाफ स्थायी समाधान चाहिए.
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