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मानसून संकट: बारिश की कमी से खतरे में खरीफ खेती

मानसून की बेरुखी बनी किसानों के लिए बड़ी चुनौती! बारिश की कमी से खरीफ फसलों पर संकट गहराता जा रहा है. क्या समय पर बारिश होगी या किसानों की मेहनत पर फिर जाएगा पानी?

मानसून संकट: बारिश की कमी से खतरे में खरीफ खेती

हर साल जून और जुलाई का महीना किसानों के लिए उम्मीद लेकर आता है. खेतों में हल चलने लगते हैं, बीज तैयार हो जाते हैं और आसमान की ओर टकटकी लगाए किसान पहली अच्छी बारिश का इंतजार करते हैं. लेकिन इस बार मानसून की धीमी रफ्तार और कम बारिश ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है.

जिले में खरीफ सीजन की खेती पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. बारिश की कमी के कारण बड़ी संख्या में किसान अब भी बुवाई शुरू नहीं कर पाए हैं. सबसे बड़ी चिंता यह है कि जिले की लगभग 37 प्रतिशत खेती आज भी पूरी तरह बारिश पर निर्भर है. यदि अगले कुछ दिनों में अच्छी वर्षा नहीं होती, तो खरीफ उत्पादन पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है.

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जिले की 37 प्रतिशत खेती अब भी बारिश के भरोसे

कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में कुल लगभग 2.82 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि उपलब्ध है. इनमें से लगभग 1.78 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित है, जबकि करीब 1.03 लाख हेक्टेयर भूमि असिंचित है.

यानी जिले का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है, जहां किसान केवल प्राकृतिक वर्षा पर निर्भर हैं. सिंचाई के पर्याप्त साधन नहीं होने के कारण मानसून की थोड़ी सी भी देरी किसानों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जुलाई के दूसरे पखवाड़े तक सामान्य बारिश नहीं हुई तो धान सहित कई खरीफ फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है.

सामान्य से कम बारिश ने बढ़ाई मुश्किलें

मौसम विभाग के अनुसार 1 जून से 15 जुलाई के बीच जिले में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई है. अनुमान है कि इस अवधि में लगभग 1.77 मिलीमीटर कम बारिश रिकॉर्ड की गई.

हालांकि यह आंकड़ा देखने में छोटा लग सकता है, लेकिन खेती के शुरुआती चरण में बारिश की हर बूंद बेहद महत्वपूर्ण होती है. समय पर बारिश न मिलने से खेतों में नमी कम हो जाती है, जिससे बुवाई प्रभावित होती है और बीज अंकुरित होने में कठिनाई आती है.

अब तक केवल 30 प्रतिशत बुवाई

कृषि विभाग ने इस वर्ष खरीफ सीजन के लिए लगभग 2.32 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती का लक्ष्य निर्धारित किया था.

लेकिन अब तक केवल 30 प्रतिशत क्षेत्र में ही बुवाई हो सकी है.

यह स्थिति इसलिए चिंताजनक है क्योंकि खरीफ की अधिकांश फसलें समय पर बोई जाने पर ही अच्छा उत्पादन देती हैं. बुवाई में लगातार देरी होने से पैदावार घटने की आशंका बढ़ जाती है.

धान की खेती पर सबसे बड़ा खतरा

जिले में खरीफ फसलों के अंतर्गत सबसे अधिक क्षेत्र में धान की खेती होती है.

करीब 2.10 लाख हेक्टेयर में धान लगाने का लक्ष्य रखा गया है. लेकिन धान ऐसी फसल है, जिसे शुरुआती चरण में पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है.

यदि समय पर बारिश नहीं होती तो—

  • धान की नर्सरी प्रभावित होगी.
  • रोपाई में देरी होगी.
  • उत्पादन लागत बढ़ जाएगी.
  • किसानों को दोबारा बुवाई करनी पड़ सकती है.
  • उपज में भारी गिरावट आने की संभावना रहेगी.

नहरों से पानी मिलने की उम्मीद

बारिश की कमी के बीच किसानों की उम्मीद अब सिंचाई परियोजनाओं पर टिकी हुई है.

जानकारी के अनुसार बाणसागर परियोजना की पुरवा नहर में 20 जुलाई से पानी छोड़े जाने की तैयारी है.

इससे सतना और आसपास के लगभग 45 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को राहत मिलने की उम्मीद है. कृषि विभाग का कहना है कि यदि समय पर नहरों में पानी पहुंचता है तो धान की रोपाई और सिंचाई कार्य में काफी मदद मिलेगी.

हालांकि जिन क्षेत्रों तक नहरों का नेटवर्क नहीं पहुंचता, वहां के किसान अभी भी बारिश का इंतजार करने को मजबूर हैं.

किसानों के सामने आर्थिक संकट

मानसून की देरी केवल खेती को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति पर भी सीधा असर डालती है.

किसान पहले ही—

  • बीज खरीद चुके हैं.
  • खाद और उर्वरक का इंतजाम कर चुके हैं.
  • खेतों की जुताई पर खर्च कर चुके हैं.

यदि बारिश नहीं होती तो यह पूरा निवेश जोखिम में पड़ सकता है.

कई किसानों को दोबारा खेत तैयार करने और अतिरिक्त सिंचाई पर भी खर्च करना पड़ सकता है.

विशेषज्ञों की राय

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अगले एक सप्ताह के भीतर अच्छी बारिश होती है तो स्थिति काफी हद तक संभाली जा सकती है.

लेकिन यदि मानसून की कमजोरी जारी रही तो—

  • धान का रकबा घट सकता है.
  • किसान वैकल्पिक फसलों की ओर रुख कर सकते हैं.
  • उत्पादन में कमी से बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं.
  • किसानों की आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

सरकार के सामने बड़ी चुनौती

मानसून की अनिश्चितता सरकार के लिए भी चुनौती बनती जा रही है.

विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को—

  • सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना चाहिए.
  • सूखा प्रभावित क्षेत्रों की लगातार निगरानी करनी चाहिए.
  • किसानों को समय पर तकनीकी सलाह उपलब्ध करानी चाहिए.
  • वैकल्पिक फसलें अपनाने के लिए जागरूकता अभियान चलाना चाहिए.
  • जरूरत पड़ने पर राहत पैकेज और फसल बीमा दावों की प्रक्रिया तेज करनी चाहिए.

जलवायु परिवर्तन भी बना कारण

पिछले कुछ वर्षों में मानसून का पैटर्न तेजी से बदल रहा है.

कभी कम बारिश तो कभी अत्यधिक वर्षा किसानों के लिए नई चुनौती बन चुकी है. मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून की अनिश्चितता लगातार बढ़ रही है.

ऐसे में भविष्य की कृषि को केवल बारिश के भरोसे छोड़ना जोखिम भरा साबित हो सकता है.

किसानों को क्या करना चाहिए?

कृषि विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे—

  • मौसम विभाग की नियमित जानकारी पर नजर रखें.
  • उपलब्ध सिंचाई साधनों का अधिकतम उपयोग करें.
  • कृषि विभाग की सलाह के अनुसार कम अवधि वाली फसलें अपनाने पर विचार करें.
  • खेतों में नमी संरक्षण के उपाय करें.
  • आवश्यकता पड़ने पर वैकल्पिक फसल प्रणाली अपनाएं.

निष्कर्ष

मानसून की बेरुखी ने जिले की खरीफ खेती के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है. जिले की करीब 37 प्रतिशत खेती अब भी बारिश पर निर्भर है और अब तक केवल 30 प्रतिशत बुवाई होना चिंता का विषय है. यदि आने वाले दिनों में अच्छी वर्षा होती है तो स्थिति में सुधार संभव है, लेकिन यदि बारिश का इंतजार लंबा खिंचता है तो किसानों की मेहनत, उत्पादन और आय—तीनों पर गहरा असर पड़ सकता है.

ऐसे समय में सरकार, कृषि विभाग और किसानों के बीच बेहतर समन्वय, आधुनिक सिंचाई व्यवस्था का विस्तार तथा मौसम आधारित खेती ही इस संकट से निकलने का सबसे प्रभावी रास्ता साबित हो सकती है.

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