Skip to main content

Vindhya First

महंगाई: चीनी महंगी क्यों हुई? एथेनॉल से आयात तक पूरी कहानी

चीनी के दाम में तेज उछाल ने आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। आखिर इसके पीछे एथेनॉल, कम स्टॉक, बढ़ती मांग या सट्टेबाजी—असल वजह क्या है? सरकार को 10 लाख टन चीनी आयात करने की जरूरत क्यों पड़ी? जानिए पूरी कहानी

महंगाई: चीनी महंगी क्यों हुई? एथेनॉल से आयात तक पूरी कहानी

भारत में रसोई का बजट एक बार फिर दबाव में है. चीनी खरीदने जा रहे हैं तो एक बार कीमत जरूर पूछ लीजिए, क्योंकि पिछले कुछ हफ्तों में इसके दाम में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 20 जुलाई को चीनी की औसत खुदरा कीमत करीब 48.18 रुपये प्रति किलो थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर 55.70 रुपये प्रति किलो हो गई. वहीं कुछ शहरों और बाजारों में खुदरा कीमत 60 से 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की खबरें सामने आई हैं.

लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि चीनी महंगी क्यों हो रही है. बड़ा सवाल यह है कि जब देश में गन्ने का उत्पादन अच्छा रहने का अनुमान है, तब चीनी की कीमतों में इतनी तेजी क्यों आई?

क्या इसके पीछे उत्पादन और स्टॉक का अंतर है? त्योहारों से पहले बढ़ी मांग है? बाजार में जमाखोरी या पैनिक बाइंग है? या फिर एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने और अनाज के इस्तेमाल ने खाद्य बाजार पर दबाव बढ़ाया है?

और सबसे अहम सवाल—सरकार को 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति देने की जरूरत क्यों पड़ी?

यह भी पढ़ें: मध्य प्रदेश: ग्रीन एक्सप्रेसवे से बदलेगी MP की कनेक्टिविटी

चीनी के साथ बढ़ी दूसरी खाद्य वस्तुओं की कीमतें

चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी को अगर अकेले देखा जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी. बाजार में कई दूसरी खाद्य और कृषि आधारित वस्तुओं की कीमतों में भी तेजी देखी जा रही है.

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, गुड़ के दाम में करीब 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. चावल कनकी लगभग 16 प्रतिशत, मक्के का आटा करीब 11 प्रतिशत और इडली रवा या राइस फ्लोर की कीमतों में भी वृद्धि हुई है.

पशु आहार और पोल्ट्री फीड की कीमतों पर भी इसका असर दिखाई दे रहा है.

इसका मतलब यह है कि महंगाई का असर सिर्फ चाय के कप में पड़ने वाली चीनी तक सीमित नहीं है. अगर मक्का और चावल जैसे कच्चे माल की लागत बढ़ती है, तो इसका असर पशुपालन और पोल्ट्री उद्योग की लागत पर भी पड़ सकता है. आगे चलकर इसका असर दूध, अंडे और दूसरे खाद्य उत्पादों की कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है.

जब उत्पादन ज्यादा है तो चीनी महंगी क्यों?

यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है.

इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन यानी ISMA के अनुमान के मुताबिक, इस साल देश में गन्ने का उत्पादन करीब 46.3 करोड़ टन रह सकता है और चीनी उत्पादन लगभग 3.36 करोड़ टन रहने का अनुमान है.

यानी उत्पादन पिछले साल के मुकाबले ज्यादा रहने की उम्मीद है.

फिर समस्या कहां है?

समस्या केवल उत्पादन की नहीं, बल्कि चीनी के उपलब्ध स्टॉक और उसके इस्तेमाल की भी है.

पिछले वर्षों में एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों का एक हिस्सा चीनी बनाने के बजाय एथेनॉल उत्पादन की तरफ मोड़ा गया.

यहीं से खाद्य बनाम ईंधन की बहस शुरू होती है.

एथेनॉल नीति का कितना असर?

भारत ने पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने की नीति को तेजी से आगे बढ़ाया है. इसका उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना, विदेशी मुद्रा की बचत करना और वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देना है.

लेकिन एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल खाद्य अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है.

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष देश में करीब 720 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन हुआ. इसके लिए अनाज के साथ-साथ चीनी बनाने योग्य गन्ने और शीरे का भी इस्तेमाल किया गया.

इसका सीधा मतलब है कि गन्ने की एक मात्रा चीनी के बजाय एथेनॉल उत्पादन की ओर चली गई.

जब किसी खाद्य वस्तु के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल दूसरे उपयोग में जाता है, तो बाजार में उपलब्धता और स्टॉक का संतुलन महत्वपूर्ण हो जाता है.

यही वजह है कि चीनी की कीमतों को समझने के लिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि इस साल गन्ना कितना पैदा हुआ. यह भी देखना जरूरी है कि उसमें से कितना गन्ना चीनी बनाने में गया और कितना एथेनॉल उत्पादन की ओर.

ओपनिंग स्टॉक बना बड़ी चिंता

चीनी उद्योग में सीजन की शुरुआत में मौजूद पुराना स्टॉक बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. यही स्टॉक नई फसल बाजार में आने तक घरेलू मांग को संभालने में मदद करता है.

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 के पेराई सीजन से पहले चीनी मिलों के पास करीब 47 लाख टन का स्टॉक था. अगले सीजन के लिए यह आंकड़ा घटकर लगभग 32 लाख टन रहने का अनुमान बताया गया है.

यानी शुरुआती स्टॉक में बड़ी कमी आई है.

यदि घरेलू खपत के लिहाज से पर्याप्त सुरक्षा स्टॉक उपलब्ध न हो और साथ ही मांग बढ़ जाए, तो बाजार में कीमतों पर दबाव आना स्वाभाविक है.

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—चीनी की कीमतों में तेजी को केवल एथेनॉल नीति के कारण बताना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी.

क्या पैनिक बाइंग और सट्टेबाजी भी जिम्मेदार है?

चीनी उद्योग से जुड़े कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि देश में वास्तविक कमी उतनी बड़ी नहीं है, जितनी बाजार में कीमतों से दिखाई दे रही है.

ISMA के महानिदेशक दीपक बलानी ने इस तेजी को सट्टेबाजी और पैनिक बाइंग से भी जोड़कर देखा है.

यानी अगर बाजार में यह धारणा बन जाए कि आने वाले दिनों में चीनी की कमी हो सकती है, तो व्यापारी और थोक खरीदार पहले से ज्यादा माल खरीदना शुरू कर सकते हैं.

इससे मांग अचानक बढ़ती है और कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है.

यही वजह है कि सरकार ने बड़े थोक उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक लिमिट लागू करने का फैसला भी किया.

सरकार ने क्यों लिया 10 लाख टन आयात का फैसला?

बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण पाने के लिए सरकार ने टैरिफ रेट कोटा यानी TRQ के तहत 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन रॉ शुगर के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है.

इस फैसले का उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों पर दबाव कम करना है.

इसके अलावा, हर महीने 10 टन से अधिक चीनी की खपत करने वाले बड़े थोक उपभोक्ताओं पर स्टॉक लिमिट लगाई गई है. इसके तहत उन्हें सीमित मात्रा में ही स्टॉक रखने की अनुमति होगी.

सरकार की कोशिश साफ है—बाजार में कृत्रिम कमी या अत्यधिक स्टॉक जमा होने की संभावना को कम किया जाए और उपलब्ध चीनी को ज्यादा व्यापक रूप से बाजार में लाया जाए.

क्या आयात से तुरंत सस्ती होगी चीनी?

यह सवाल अभी सबसे अहम है.

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स यानी CAIT के राष्ट्रीय मंत्री शंकर ठक्कर के मुताबिक, वैश्विक बाजार में पर्याप्त और सस्ती चीनी की उपलब्धता भी एक चुनौती है. ऐसे में आयात का फैसला होने के बावजूद उसका असर तुरंत खुदरा कीमतों पर दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है.

आयात में समय लगता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमत, शिपिंग, उपलब्धता और घरेलू बाजार की स्थिति—इन सभी का असर अंतिम कीमत पर पड़ता है.

इसलिए सरकार का आयात फैसला बाजार में मनोवैज्ञानिक दबाव जरूर कम कर सकता है, लेकिन खुदरा कीमतों में वास्तविक गिरावट कितनी होगी, यह आने वाले दिनों की आपूर्ति और मांग पर निर्भर करेगा.

भारत निर्यातक से आयातक क्यों बना?

चीनी बाजार की मौजूदा स्थिति भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ साल पहले तक भारत दुनिया के प्रमुख चीनी निर्यातकों में शामिल था.

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2022-23 में भारत ने करीब 1.33 करोड़ टन चीनी का निर्यात किया था. इसके बाद निर्यात में तेज गिरावट आई और 2023-24 में यह करीब 51.35 लाख टन रह गया.

अब स्थिति यह है कि घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने के लिए भारत को आयात की ओर देखना पड़ रहा है.

यह बदलाव सिर्फ चीनी बाजार की कहानी नहीं है. यह खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा नीति और कृषि अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन की चुनौती को भी सामने रखता है.

असली चुनौती: खाद्य सुरक्षा बनाम ऊर्जा सुरक्षा

एथेनॉल को बढ़ावा देने की अपनी आर्थिक और रणनीतिक वजहें हैं.

भारत पेट्रोलियम आयात पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है. एथेनॉल ब्लेंडिंग से विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों के लिए वैकल्पिक बाजार जैसे फायदे भी जुड़े हैं.

लेकिन दूसरी तरफ सवाल यह है कि अगर खाद्य उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाला गन्ना या अनाज बड़ी मात्रा में ईंधन बनाने में चला जाए, तो क्या इससे खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है?

यही वह संतुलन है जिसे नीति निर्माताओं को साधना होगा.

क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा जरूरी है, लेकिन खाद्य सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

अगर ईंधन नीति के कारण खाद्य वस्तुओं की लागत बढ़ती है, तो इसका अंतिम बोझ उपभोक्ता की जेब पर पड़ता है.

आगे क्या होगा?

फिलहाल सरकार के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं.

पहली—चीनी की कीमतों को नियंत्रित करना.

दूसरी—घरेलू बाजार में पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना.

और तीसरी—एथेनॉल उत्पादन तथा खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन कायम करना.

अगर आयात से बाजार में पर्याप्त आपूर्ति आती है और पैनिक बाइंग पर नियंत्रण होता है, तो आने वाले समय में चीनी की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है.

लेकिन अगर वैश्विक बाजार में उपलब्धता सीमित रही और घरेलू मांग लगातार बढ़ती रही, तो कीमतों को नीचे लाना आसान नहीं होगा.

निष्कर्ष: चीनी की कीमत सिर्फ बाजार की कहानी नहीं

चीनी की बढ़ती कीमत को केवल ‘चीनी कम पैदा हुई इसलिए महंगी हो गई’ कहकर समझना आसान जरूर है, लेकिन पूरी तस्वीर इससे कहीं ज्यादा जटिल है.

इसके पीछे स्टॉक, एथेनॉल उत्पादन, घरेलू मांग, बाजार की धारणा, सट्टेबाजी, आयात और सरकारी नीतियों का मिला-जुला असर है.

सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा के बीच कितना संतुलन बनाना चाहिए.

एथेनॉल देश की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन अगर इसके विस्तार का असर रोजमर्रा की खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है, तो नीति की समीक्षा और बेहतर संतुलन की जरूरत महसूस होती है.

फिलहाल सरकार ने आयात और स्टॉक लिमिट के जरिए बाजार को नियंत्रित करने की कोशिश शुरू कर दी है. अब देखना यह है कि इन फैसलों का असर आम उपभोक्ता की रसोई तक कब पहुंचता है.

चीनी की कीमतों में यह तेजी सिर्फ एक खाद्य वस्तु की महंगाई नहीं, बल्कि भारत की कृषि, ऊर्जा और खाद्य नीति के बीच संतुलन की बड़ी परीक्षा भी है.

यह भी पढ़ें: PM CARES Fund: ₹8,452 करोड़ का फंड, पारदर्शिता पर फिर क्यों उठे सवाल?