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जल जीवन मिशन : जल जीवन मिशन में गड़बड़ी? करोड़ों खर्च फिर भी नहीं पहुंचा पानी

“हर घर जल” का सपना आखिर अधूरा क्यों? विंध्य के कई गांवों में आज भी लोग बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान हैं। कहीं सूखे हैंडपंप, कहीं गंदा पानी, तो कहीं करोड़ों खर्च होने के बाद भी अधूरी योजनाएं

जल जीवन मिशन : जल जीवन मिशन में गड़बड़ी? करोड़ों खर्च फिर भी नहीं पहुंचा पानी

देश के हर घर तक नल से साफ पानी पहुंचाने का सपना लेकर शुरू हुई केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना — जल जीवन मिशन — आज कई सवालों के घेरे में है.

सरकार दावा करती है कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों तक नल कनेक्शन पहुंचाए गए हैं.
लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और कहानी बयां करती है.

मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में आज भी कई गांव ऐसे हैं, जहां लोग बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

कहीं हैंडपंप सूख चुके हैं…
कहीं पाइपलाइन बिछी, लेकिन पानी नहीं पहुंचा…
कहीं नलों से गंदा और बदबूदार पानी निकल रहा है…
तो कहीं करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद योजना सिर्फ कागजों में सफल दिखाई दे रही है.

अब सवाल सिर्फ पानी का नहीं है.
सवाल यह भी है कि आखिर इतनी बड़ी योजना में गड़बड़ी कहां हुई?

क्या टेंडर प्रक्रिया में भ्रष्टाचार हुआ?
क्या परियोजनाओं की लागत जानबूझकर बढ़ाई गई?
और क्या सरकारी सिस्टम की लापरवाही ने लोगों का हक छीन लिया?

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क्या है जल जीवन मिशन?

जल जीवन मिशन केंद्र सरकार की एक बड़ी ग्रामीण पेयजल योजना है.
इसकी शुरुआत देश के हर ग्रामीण घर तक पाइपलाइन के जरिए साफ पानी पहुंचाने के उद्देश्य से की गई थी.

इस योजना का लक्ष्य था कि गांवों में रहने वाले लोगों को रोजाना पर्याप्त और स्वच्छ पानी मिल सके.

सरकार का कहना था कि इससे:

  • महिलाओं को दूर से पानी लाने की परेशानी कम होगी
  • बच्चों को दूषित पानी से होने वाली बीमारियों से राहत मिलेगी
  • ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन स्तर बेहतर होगा

इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए देशभर में पाइपलाइन, पानी टंकियां और सप्लाई नेटवर्क तैयार किए गए.

लेकिन जैसे-जैसे योजना आगे बढ़ी, वैसे-वैसे कई राज्यों से शिकायतें भी सामने आने लगीं.

विंध्य में क्यों गहराया पानी का संकट?

रीवा, मऊगंज, सीधी, सतना और विंध्य के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी लोग पानी की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं.

गर्मी आते ही हालात और खराब हो जाते हैं.

कई गांवों में:

  • हैंडपंप जवाब दे चुके हैं
  • पाइपलाइन में पानी नहीं आता
  • टंकियां बनीं लेकिन सप्लाई शुरू नहीं हुई
  • गंदा और सीवर मिला पानी पहुंचने की शिकायतें हैं

ग्रामीणों का आरोप है कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद स्थिति नहीं बदली.

कुछ इलाकों में लोग आज भी टैंकरों के भरोसे हैं.
महिलाएं कई किलोमीटर दूर से पानी भरकर लाने को मजबूर हैं.

ऐसे में “हर घर जल” का सपना अधूरा नजर आता है.

कागजों में पूरी हुई योजनाएं?

जल जीवन मिशन को लेकर सबसे गंभीर आरोप यही हैं कि कई योजनाएं सिर्फ रिकॉर्ड में पूरी दिखाई गईं.

कई गांवों में पाइपलाइन बिछाने का दावा किया गया, लेकिन पानी की सप्लाई शुरू ही नहीं हुई.

कुछ जगहों पर पानी टंकियां तो बना दी गईं, लेकिन उनमें पानी भरने की व्यवस्था तक नहीं की गई.

ग्रामीणों का कहना है कि अधिकारियों ने बिना जमीनी जांच के ही काम पूरा दिखा दिया.

अगर करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी लोगों को पानी न मिले, तो सवाल उठना स्वाभाविक है.

टेंडर सिस्टम पर क्यों उठे सवाल?

जल जीवन मिशन में सबसे ज्यादा विवाद टेंडर प्रक्रिया को लेकर सामने आया.

जांच एजेंसियों और ऑडिट रिपोर्ट्स में सामने आया कि कई परियोजनाओं की लागत जरूरत से ज्यादा बढ़ाई गई.

आरोप हैं कि कुछ मामलों में अधिकारियों और ठेकेदारों ने मिलकर ऐसे टेंडर पास किए, जिनसे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ा.

इसी विवाद के बीच “टेंडर प्रीमियम” शब्द चर्चा में आया.

क्या होता है टेंडर प्रीमियम?

सरकार किसी भी परियोजना के लिए एक अनुमानित लागत तय करती है.
इसे बेस प्राइस कहा जाता है.

लेकिन जब ठेकेदार उससे ज्यादा कीमत पर काम करने की बोली लगाते हैं, तो अतिरिक्त राशि को “टेंडर प्रीमियम” कहा जाता है.

उदाहरण के तौर पर:

अगर किसी परियोजना की अनुमानित लागत 100 करोड़ रुपए है और ठेकेदार 140 करोड़ में काम लेने की बोली लगाता है, तो अतिरिक्त 40 करोड़ रुपए टेंडर प्रीमियम कहलाएंगे.

जांच एजेंसियों के मुताबिक कई मामलों में यह प्रीमियम 30 से 40 प्रतिशत तक पहुंच गया.

आरोप यह भी हैं कि कुछ जगहों पर सिंडिकेट बनाकर ऊंची बोलियां लगाई गईं.

नतीजा — सरकारी खजाने पर हजारों करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ.

क्या है ओवरसाइज DPR का मामला?

जल जीवन मिशन विवाद में “ओवरसाइज DPR” भी बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया है.

DPR यानी Detailed Project Report।

यह किसी भी परियोजना का पूरा तकनीकी खाका होता है, जिसमें लागत, पाइपलाइन, मशीनरी और पानी सप्लाई की पूरी जानकारी होती है.

आरोप हैं कि कई परियोजनाओं में जरूरत से ज्यादा बड़ी DPR तैयार की गईं.

यानी जितना खर्च वास्तव में जरूरी था, उससे कहीं ज्यादा बजट दिखाया गया.

केंद्र सरकार का कहना है कि अब ऐसी बढ़ी हुई परियोजनाओं पर रोक लगाई जा रही है.

सरकार के मुताबिक करीब 67 हजार करोड़ रुपए की ओवरसाइज DPR को रोका गया है.

सरकार ने क्या बड़ा कदम उठाया?

केंद्र सरकार ने अब जल जीवन मिशन में “Non-Permissible Expenses” यानी अस्वीकृत खर्चों की सूची बढ़ा दी है.

पहले इस सूची में 7 तरह के खर्च शामिल थे.
अब इन्हें बढ़ाकर 10 कर दिया गया है.

सरकार का दावा है कि इससे:

  • फिजूल खर्च कम होगा
  • भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी
  • टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी बनेगी
  • परियोजनाओं की लागत नियंत्रित होगी

किन खर्चों पर लगी रोक?

सरकार ने जिन खर्चों पर सख्ती बढ़ाई है, उनमें शामिल हैं:

  • टेंडर प्रीमियम
  • ऑपरेशन और मेंटेनेंस खर्च
  • तय सीमा से ज्यादा पानी सप्लाई
  • अतिरिक्त शहरी मांग से जुड़े खर्च
  • जरूरत से ज्यादा बड़ी परियोजनाएं

सरकार का कहना है कि इन नियमों से हजारों करोड़ रुपए की बचत होगी.

राजस्थान का मामला क्यों बना बड़ा उदाहरण?

जल जीवन मिशन विवाद में राजस्थान का मामला सबसे ज्यादा चर्चा में रहा.

करीब 960 करोड़ रुपए से जुड़ी कथित अनियमितताओं ने पूरे देश में सवाल खड़े कर दिए.

आरोप लगे कि परियोजनाओं की लागत बढ़ाई गई और टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ियां हुईं.

हालांकि जांच अभी जारी है, लेकिन इस मामले ने जल जीवन मिशन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं.

क्या विंध्य में भी हुआ भ्रष्टाचार?

विंध्य क्षेत्र में लगातार सामने आ रही शिकायतों के बाद अब स्थानीय स्तर पर भी सवाल उठने लगे हैं.

लोग पूछ रहे हैं:

  • अगर करोड़ों रुपए खर्च हुए तो पानी कहां है?
  • पाइपलाइन होने के बावजूद सप्लाई क्यों नहीं?
  • गंदा पानी क्यों पहुंच रहा है?
  • क्या गुणवत्ता जांच सही तरीके से हुई?
  • क्या योजनाएं सिर्फ कागजों में पूरी दिखाई गईं?

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही होगी, लेकिन जमीनी हालात लोगों के सवालों को मजबूत जरूर करते हैं.

सबसे ज्यादा परेशानी गांवों में

जल संकट का सबसे बड़ा असर ग्रामीण परिवारों पर पड़ रहा है.

कई गांवों में महिलाएं आज भी सुबह-सुबह पानी भरने के लिए लंबी दूरी तय करती हैं.

कुछ इलाकों में लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं.

विशेषज्ञों के मुताबिक गंदा पानी कई गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है.

गर्मी के मौसम में स्थिति और खराब हो जाती है.

क्या सिर्फ नियम बदलने से बदलेगी तस्वीर?

केंद्र सरकार ने भले ही सख्ती बढ़ा दी हो, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ नियम बदलने से हालात बदल जाएंगे?

विशेषज्ञ मानते हैं कि जरूरत है:

  • जमीनी निगरानी की
  • गुणवत्ता जांच की
  • समय पर परियोजनाएं पूरी करने की
  • दोषियों पर कार्रवाई की
  • और ग्रामीणों की शिकायतों को गंभीरता से सुनने की

जब तक गांवों तक वास्तव में साफ पानी नहीं पहुंचेगा, तब तक “हर घर जल” का सपना अधूरा रहेगा.

विंध्य के लोगों का सबसे बड़ा सवाल

विंध्य क्षेत्र के लोग आज भी यही पूछ रहे हैं:

अगर सरकार ने करोड़ों रुपए खर्च किए हैं, तो फिर पानी कहां है?

क्यों गांवों में आज भी लोग बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं?

और अगर शहरों तक में साफ पानी नहीं पहुंच पा रहा, तो फिर इतनी बड़ी योजनाओं का फायदा आखिर किसे मिल रहा है?

निष्कर्ष

जल जीवन मिशन देश की सबसे बड़ी योजनाओं में से एक है.
अगर यह योजना सही तरीके से लागू हो, तो करोड़ों लोगों की जिंदगी बदल सकती है.

लेकिन जब इसी योजना में भ्रष्टाचार, टेंडर गड़बड़ी और लापरवाही के आरोप लगने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है.

विंध्य क्षेत्र की स्थिति यह बताती है कि सिर्फ कागजों में योजनाएं पूरी दिखा देने से लोगों की समस्या खत्म नहीं होती.

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