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PM CARES Fund: ₹8,452 करोड़ का फंड, पारदर्शिता पर फिर क्यों उठे सवाल?

PM CARES Fund में ₹8,452 करोड़ से ज्यादा की रकम… आखिर जनता के दिए इस पैसे का इस्तेमाल कितना हुआ और इसकी पारदर्शिता पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? जानिए पूरी कहानी

PM CARES Fund: ₹8,452 करोड़ का फंड, पारदर्शिता पर फिर क्यों उठे सवाल?

मार्च 2020 का वो दौर शायद ही कोई भारतीय भूल पाएगा. कोरोना महामारी के कारण पूरा देश डर और अनिश्चितता के बीच था. सड़कें वीरान थीं, बाजार बंद थे और लाखों परिवारों के सामने रोजी-रोटी से लेकर स्वास्थ्य तक का संकट खड़ा था.

इसी मुश्किल दौर में देश के नागरिकों से आपदा से लड़ने के लिए आर्थिक मदद की अपील की गई. लोगों ने अपनी क्षमता के मुताबिक योगदान दिया. किसी ने पेंशन से पैसा दिया, किसी ने गुल्लक तोड़ी और किसी ने अपनी कमाई का हिस्सा दान कर दिया.

इसी उद्देश्य से PM CARES Fund की स्थापना मार्च 2020 में हुई.

छह साल बाद एक बार फिर यह फंड चर्चा में है. वजह है इसका बड़ा हुआ कॉर्पस, हाल में सार्वजनिक हुई ऑडिट जानकारी और फंड की पारदर्शिता को लेकर लंबे समय से चल रही बहस.

ताजा उपलब्ध ऑडिट आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 के अंत में PM CARES Fund का बैलेंस करीब ₹8,452.95 करोड़ था.

लेकिन सवाल सिर्फ रकम का नहीं है.

सवाल है—इतना बड़ा फंड किस तरह संचालित होता है? इसमें पैसा कहां से आता है? इसका इस्तेमाल किन परिस्थितियों में किया जाता है? और जनता इस फंड से जुड़ी जानकारी कितनी आसानी से हासिल कर सकती है?

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PM CARES Fund की शुरुआत कैसे हुई?

PM CARES यानी Prime Minister’s Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations Fund को 27 मार्च 2020 को एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट के रूप में स्थापित किया गया था.

इसकी ट्रस्ट संरचना में प्रधानमंत्री पदेन चेयरमैन हैं, जबकि केंद्रीय गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री ट्रस्टी के रूप में शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में PM CARES को एक public charitable trust के रूप में वर्णित किया था और कहा था कि इसमें स्वैच्छिक योगदान आता है तथा इसे बजटीय सहायता नहीं मिलती.

यानी सरकार का आधिकारिक पक्ष यह है कि PM CARES सरकारी बजट का हिस्सा नहीं है, बल्कि अलग ट्रस्ट के रूप में काम करता है.

यहीं से इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—जब इसकी कमान देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के पास है, तो इसकी कानूनी और प्रशासनिक स्थिति क्या है?

₹8,452 करोड़ का आंकड़ा क्यों चर्चा में है?

वित्त वर्ष 2024-25 के अंत में PM CARES Fund का बैलेंस ₹8,452.95 करोड़ बताया गया है. यह आंकड़ा हाल ही में सार्वजनिक हुए ऑडिट स्टेटमेंट्स के बाद चर्चा में आया.

सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस में इस रकम को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं. खास तौर पर ₹87 लाख के खर्च का आंकड़ा वायरल हुआ है.

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है.

₹87.85 लाख को पूरे PM CARES Fund के उस साल के कुल खर्च के रूप में पेश करना सही तस्वीर नहीं देता. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक यह राशि PM CARES for Children से जुड़ी है. दूसरी तरफ, पिछले वर्षों में PM CARES से कोविड राहत, ऑक्सीजन प्लांट, वेंटिलेटर और अन्य आपातकालीन जरूरतों पर बड़ी रकम खर्च की गई है.

इसलिए बहस का सही सवाल यह होना चाहिए कि वर्तमान में उपलब्ध बड़ी राशि का कितना हिस्सा किस उद्देश्य से सुरक्षित रखा गया है और उसके निवेश एवं उपयोग की पूरी जानकारी जनता के सामने किस स्तर तक उपलब्ध है?

क्या PM CARES का पैसा खर्च नहीं हुआ?

ऐसा कहना भी सही नहीं होगा.

PM CARES की स्थापना के बाद कोरोना महामारी के दौरान स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए फंड से राशि खर्च की गई. इसके अलावा अलग-अलग आपातकालीन परिस्थितियों में भी फंड का उपयोग किया गया.

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दिए गए विवरण में भी PM CARES को आपातकाल और संकट की परिस्थितियों में राहत के उद्देश्य वाला ट्रस्ट बताया गया था.

इसलिए केवल मौजूदा बैलेंस देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि फंड का पैसा कभी खर्च ही नहीं हुआ, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा.

हालांकि, एक बड़ा सवाल फिर भी कायम है—एक आपदा राहत फंड में इतनी बड़ी राशि किस नीति के तहत सुरक्षित रखी जाती है और उसके उपयोग की प्राथमिकताएं क्या हैं?

यही वह बिंदु है जहां पारदर्शिता की मांग महत्वपूर्ण हो जाती है.

PM CARES और RTI का विवाद क्या है?

PM CARES को लेकर सबसे लंबे समय से चल रहा विवाद Right to Information यानी RTI कानून से जुड़ा है.

PMO की ओर से कई RTI मामलों में यह जवाब दिया गया है कि PM CARES Fund RTI Act की धारा 2(h) के तहत “Public Authority” नहीं है.

PMO का पक्ष यह रहा है कि PM CARES एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट है, जिसे सरकारी बजट से पैसा नहीं मिलता और इसका संचालन ट्रस्टियों द्वारा किया जाता है.

दूसरी तरफ याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री जैसे पदेन ट्रस्टी, PMO से जुड़ा पता, सरकारी डोमेन और सरकारी प्रतीक जैसी चीजें इस संस्था के सार्वजनिक चरित्र को लेकर सवाल खड़े करती हैं.

यानी विवाद का केंद्र यही है—

क्या PM CARES एक निजी ट्रस्ट है या ऐसा सार्वजनिक महत्व का संस्थान है जिस पर RTI लागू होना चाहिए?

इस सवाल पर कानूनी बहस लंबे समय से जारी है.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

2020 में सुप्रीम कोर्ट ने PM CARES से संबंधित मामले में कहा था कि यह एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट है और इसे सरकारी बजट से सहायता नहीं मिलती.

कोर्ट के सामने उपलब्ध रिकॉर्ड में यह भी कहा गया था कि फंड में व्यक्तियों और संस्थाओं के स्वैच्छिक योगदान आते हैं.

यानी अदालत ने उस समय PM CARES को सरकारी खजाने से अलग एक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में देखा था.

लेकिन इससे RTI को लेकर उठे सभी सवाल अपने आप समाप्त नहीं हो जाते. यही कारण है कि इस मुद्दे पर अलग-अलग कानूनी कार्यवाहियां और बहस जारी रही हैं.

विदेशी चंदे को लेकर क्या है विवाद?

PM CARES की आधिकारिक वेबसाइट के FAQ के मुताबिक फंड को Foreign Contribution Regulation Act यानी FCRA के प्रावधानों से छूट दी गई है और विदेशों से व्यक्तियों तथा संगठनों के जरिए विदेशी योगदान स्वीकार किया जा सकता है.

यही प्रावधान समय-समय पर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का विषय रहा है.

विदेशी कंपनियों और संगठनों से मिलने वाले योगदान को लेकर विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में अलग-अलग कंपनियों के नाम और रकम सामने आती रही हैं. लेकिन ऐसे दावों को प्रस्तुत करते समय मूल दस्तावेज या आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्टि करना जरूरी है.

इसलिए किसी खास विदेशी कंपनी द्वारा किसी निश्चित राशि के दान का दावा केवल सोशल मीडिया पोस्ट या अपुष्ट रिपोर्ट के आधार पर तथ्य के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए.

CSR को लेकर भी उठे थे सवाल

PM CARES Fund को लेकर एक और बड़ा मुद्दा Corporate Social Responsibility यानी CSR से जुड़ा रहा है.

सरकार ने मार्च 2020 में स्पष्ट किया था कि PM CARES में कंपनियों द्वारा किया गया योगदान CSR गतिविधि के रूप में माना जा सकता है.

इसका मतलब था कि पात्र कंपनियां अपने CSR दायित्व के तहत PM CARES में योगदान कर सकती थीं.

यह फैसला महामारी के शुरुआती दौर में तेजी से संसाधन जुटाने की सरकार की रणनीति का हिस्सा था.

हालांकि आलोचकों ने सवाल उठाया कि अगर किसी कंपनी को अपना CSR बजट PM CARES में देने की अनुमति है, तो इससे अन्य सामाजिक क्षेत्रों के लिए उपलब्ध CSR संसाधनों पर क्या असर पड़ता है?

यह सवाल आज भी नीति और पारदर्शिता की बहस में महत्वपूर्ण है.

सरकारी या निजी—आखिर PM CARES है क्या?

शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है.

सरकार और PMO का पक्ष है कि PM CARES सरकारी फंड नहीं बल्कि एक स्वतंत्र सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट है.

दिल्ली हाई कोर्ट में सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि PM CARES को RTI Act के तहत Public Authority नहीं माना जा सकता और इसका पैसा Consolidated Fund of India का हिस्सा नहीं है.

दूसरी तरफ, आलोचक पूछते हैं कि अगर यह पूरी तरह निजी ट्रस्ट है तो इसकी पहचान प्रधानमंत्री के पद और सरकारी संस्थानों से इतनी मजबूती से क्यों जुड़ी हुई है?

PM CARES की आधिकारिक वेबसाइट आज भी PMO से जुड़े पते और संपर्क व्यवस्था की जानकारी देती है.

यही विरोधाभास जनता के बीच सवाल पैदा करता है.

पारदर्शिता क्यों जरूरी है?

यहां बहस को राजनीति से थोड़ा आगे ले जाने की जरूरत है.

PM CARES में पैसा देने वालों में आम नागरिक भी शामिल रहे हैं. ऐसे में जनता का यह जानना स्वाभाविक है कि उनके योगदान का इस्तेमाल किस तरह किया गया.

फंड की ऑडिटिंग होती है और PM CARES की वेबसाइट भी कई जानकारियां उपलब्ध कराती है. आधिकारिक FAQ में नियमित ऑडिट का उल्लेख है.

लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल ऑडिट होना ही पर्याप्त नहीं माना जाता. ऑडिट के निष्कर्ष कितनी विस्तार से सार्वजनिक होते हैं, दान की जानकारी किस स्तर तक उपलब्ध होती है और खर्च का पूरा विवरण जनता कितनी आसानी से देख सकती है—ये भी उतने ही महत्वपूर्ण सवाल हैं.

क्या ₹8,452 करोड़ सरकारी स्कूलों और अस्पतालों पर खर्च होने चाहिए?

यह एक राजनीतिक और नीतिगत सवाल है, जिसका जवाब केवल “हां” या “नहीं” में देना आसान नहीं है.

PM CARES का मूल उद्देश्य आपातकालीन परिस्थितियों में राहत उपलब्ध कराना है. इसलिए इसकी पूरी राशि को सामान्य बजट की तरह स्कूलों, अस्पतालों या दूसरी योजनाओं में खर्च करना फंड के मूल उद्देश्य से अलग हो सकता है.

लेकिन दूसरी तरफ यह भी तर्क दिया जा सकता है कि देश में स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन की स्थायी क्षमता बढ़ाने के लिए बड़ी रकम का इस्तेमाल किया जा सकता है.

मसलन—

  • जिला अस्पतालों की आपातकालीन क्षमता बढ़ाई जा सकती है.
  • ऑक्सीजन और ICU इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया जा सकता है.
  • महामारी से निपटने के लिए मेडिकल रिसर्च को बढ़ावा दिया जा सकता है.
  • ग्रामीण क्षेत्रों में आपदा प्रतिक्रिया व्यवस्था बेहतर की जा सकती है.
  • बच्चों और कमजोर वर्गों के लिए स्वास्थ्य एवं शिक्षा संबंधी सहायता बढ़ाई जा सकती है.

लेकिन इन फैसलों के लिए स्पष्ट नीति और सार्वजनिक जवाबदेही जरूरी होगी.

असली सवाल रकम से ज्यादा भरोसे का है

PM CARES Fund की कहानी सिर्फ ₹8,452 करोड़ की कहानी नहीं है.

यह उस भरोसे की कहानी है जो 2020 में देश के करोड़ों लोगों ने दिखाया था.

जब देश संकट में था, तब लोगों ने अपनी क्षमता के मुताबिक योगदान दिया. किसी ने छोटी रकम दी, किसी ने बड़ी। लेकिन हर योगदान के पीछे एक भावना थी—देश इस मुश्किल समय से बाहर निकले.

आज जब फंड का कॉर्पस हजारों करोड़ रुपये में है, तो जनता के सवालों को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए.

फंड सरकारी है या निजी?

RTI क्यों लागू नहीं है?

कितना पैसा किस मद में खर्च हुआ?

कितना पैसा फिक्स्ड डिपॉजिट में है?

विदेशी योगदान कहां से आया?

और भविष्य की आपदाओं के लिए इस रकम के इस्तेमाल की क्या योजना है?

इन सवालों के जवाब जितने स्पष्ट होंगे, भरोसा उतना ही मजबूत होगा.

निष्कर्ष

लोकतंत्र में सवाल पूछना किसी संस्था या सरकार के खिलाफ होना नहीं है. बल्कि सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जरूरत है.

PM CARES Fund को लेकर भी बहस आरोपों से आगे बढ़कर दस्तावेज, ऑडिट और पारदर्शिता पर केंद्रित होनी चाहिए.

सरकार और PM CARES प्रबंधन यदि फंड की आय, निवेश, खर्च और भविष्य की योजनाओं की अधिक विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करते हैं, तो इससे न केवल आलोचनाओं का जवाब मिलेगा बल्कि उस भरोसे को भी मजबूती मिलेगी जिसके आधार पर देशवासियों ने महामारी के दौरान इस फंड में योगदान दिया था.

क्योंकि आखिरकार सवाल सिर्फ ₹8,452 करोड़ का नहीं है.

सवाल है—जनता के भरोसे का.

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