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रीवा फर्जी डिग्री मामला: कई यूनिवर्सिटी से एक साथ डिग्री के आरोप

रीवा फर्जी डिग्री मामला: कई यूनिवर्सिटी से एक साथ डिग्री के आरोप

रीवा फर्जी डिग्री मामला: कई यूनिवर्सिटी से एक साथ डिग्री के आरोप

रीवा फर्जी डिग्री मामला: मध्यप्रदेश के रीवा जिले से उच्च शिक्षा व्यवस्था को झकझोर देने वाला एक बड़ा मामला सामने आया है. इस कथित “फर्जी डिग्री कांड” ने न केवल शैक्षणिक संस्थानों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि नियमों के पालन और निगरानी तंत्र पर भी गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं.

मामले के केंद्र में मेनिका पाण्डेय नाम की एक छात्रा हैं, जिन पर आरोप है कि उन्होंने एक ही समयावधि में अलग-अलग विश्वविद्यालयों से कई डिग्रियां हासिल कीं. शिकायतकर्ताओं का दावा है कि यह कार्य नियमों का उल्लंघन करते हुए और संस्थानों को गुमराह करके किया गया.

रीवा फर्जी डिग्री मामला: कई यूनिवर्सिटी से एक साथ डिग्री के आरोप
रीवा फर्जी डिग्री मामला: कई यूनिवर्सिटी से एक साथ डिग्री के आरोप

 क्या है पूरा मामला?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मेनिका पाण्डेय वर्ष 2012 से 2015 तक विधि महाविद्यालय रीवा में एलएलबी की नियमित छात्रा थीं. उनका नामांकन अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय से माइग्रेशन के आधार पर हुआ था.

लेकिन इसी अवधि में, वर्ष 2013-14 के दौरान उन्होंने महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, कटनी से पीजीडीसीए (PGDCA) की डिग्री भी प्राप्त की. यह तथ्य सामने आने के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया.

रीवा फर्जी डिग्री मामला: कई यूनिवर्सिटी से एक साथ डिग्री के आरोप
रीवा फर्जी डिग्री मामला: कई यूनिवर्सिटी से एक साथ डिग्री के आरोप

इतना ही नहीं, आरोप यह भी है कि इसी समय के दौरान उन्होंने डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से एम.कॉम. की डिग्री भी हासिल की. यानी एक ही समय में तीन अलग-अलग पाठ्यक्रमों में संलिप्तता का दावा किया जा रहा है.

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एम.फिल डिग्री पर भी उठे सवाल

मामला यहीं तक सीमित नहीं है. जानकारी के मुताबिक, सितंबर 2015 में मेनिका पाण्डेय ने ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय रीवा से एम.फिल की डिग्री भी प्राप्त की.

जून 2014 से सितंबर 2015 के बीच इतनी अधिक डिग्रियां हासिल करने के दावे ने पूरे मामले को और संदिग्ध बना दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि इतने कम समय में इतने पाठ्यक्रमों को पूरा करना व्यवहारिक रूप से बेहद कठिन है.

क्या कहते हैं नियम?

शैक्षणिक नियमों के अनुसार, कोई भी छात्र एक ही समय में अलग-अलग विश्वविद्यालयों में नियमित रूप से नामांकित नहीं हो सकता, जब तक कि वह उचित माइग्रेशन प्रक्रिया का पालन न करे.

हालांकि, डिस्टेंस एजुकेशन के कुछ मामलों में समानांतर पाठ्यक्रम संभव हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश और पारदर्शिता जरूरी होती है.

इस मामले में आरोप है कि संबंधित छात्रा ने नियमों का उल्लंघन करते हुए जानबूझकर संस्थानों को भ्रमित किया.

नौकरी और आगे की पढ़ाई पर भी सवाल

बताया जा रहा है कि इन डिग्रियों के आधार पर मेनिका पाण्डेय ने उच्च शिक्षा विभाग में अतिथि विद्वान के रूप में पंजीयन कराया. वर्ष 2016 से वे ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय रीवा के वाणिज्य संकाय में बी.;न जांच की मांग की है. उनका कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि एक गंभीर आपराधिक मामला भी बन सकता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में केवल संबंधित व्यक्ति ही नहीं, बल्कि संबंधित संस्थानों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए.

निष्कर्ष

रीवा का यह कथित फर्जी डिग्री मामला अब एक गंभीर मुद्दा बन चुका है. जांच के बाद ही सच्चाई सामने आएगी, लेकिन फिलहाल यह मामला शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को उजागर करता है.

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