Skip to main content

Vindhya First

रीवा: रीवा स्कूल में 91 साल पुरानी छत का संकट, 900 बच्चों की पढ़ाई पर सवाल

रीवा के मार्तंड स्कूल में 91 साल पुरानी छत के नीचे 900 बच्चों की पढ़ाई जारी है. बारिश में टपकती छत और 12 अतिरिक्त कमरों की जरूरत ने शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

रीवा: रीवा स्कूल में 91 साल पुरानी छत का संकट, 900 बच्चों की पढ़ाई पर सवाल

रीवा का पीएमश्री शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मार्तंड क्रमांक-3 शहर के पुराने और महत्वपूर्ण विद्यालयों में शामिल है. लेकिन इस स्कूल की मौजूदा तस्वीर सरकारी शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती सामने ला रही है. करीब 91 साल पुरानी इमारत में आज भी सैकड़ों बच्चे पढ़ रहे हैं. स्कूल में करीब 900 विद्यार्थी हैं, जबकि उनके लिए 12 कमरों में कक्षाएं संचालित हो रही हैं. विद्यालय को 12 अतिरिक्त कमरों की जरूरत है. बारिश में पुरानी छत से पानी टपकता है और गर्मी के दिनों में इन्हीं कमरों में बैठना बच्चों के लिए मुश्किल हो जाता है. सवाल यह है कि इतने पुराने भवन और बढ़ती विद्यार्थी संख्या के बावजूद स्कूल की जरूरतों का स्थायी समाधान अब तक क्यों नहीं हो सका?

यह भी पढ़ें: AI: IIM अहमदाबाद में एआई का बढ़ता दायरा, शिक्षा से स्टार्टअप तक नई तैयारी

1935 में बना स्कूल, आज भी उसी भवन पर बढ़ता दबाव

किसी स्कूल की उम्र 10, 20 या 30 साल होना सामान्य बात है. लेकिन जब किसी भवन को बने करीब एक सदी होने लगे और उसी परिसर में आज भी बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ रहे हों, तो उसके रखरखाव और सुरक्षा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है.

मार्तंड क्रमांक-3 विद्यालय की स्थापना वर्ष 1935 में हुई थी. यानी यह स्कूल करीब 91 साल पुराना हो चुका है. इतने लंबे समय में शहर बदला, आबादी बढ़ी, विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी और शिक्षा की जरूरतें भी बदल गईं. लेकिन स्कूल की इमारत पर बढ़ता दबाव अब साफ दिखाई दे रहा है.

स्कूल में करीब 900 विद्यार्थी पढ़ रहे हैं. इतनी बड़ी संख्या के लिए पर्याप्त कक्ष उपलब्ध होना जरूरी है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में करीब 12 कमरों में कक्षाएं संचालित हो रही हैं। विद्यालय को 12 और कमरों की आवश्यकता बताई गई है.

यह आंकड़ा अपने आप में पूरी कहानी कहता है. एक तरफ स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ रही है, दूसरी तरफ भवन और कमरों की क्षमता उसी अनुपात में नहीं बढ़ी.

सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ना निश्चित तौर पर अच्छी बात है. इसका मतलब है कि अभिभावक अपने बच्चों को शिक्षा के लिए स्कूल भेज रहे हैं और बच्चे नियमित रूप से पढ़ाई से जुड़ रहे हैं. लेकिन विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने के साथ बुनियादी सुविधाओं का विस्तार भी उतना ही जरूरी है.

अगर बच्चों की संख्या बढ़ती जाए और कक्षाएं, भवन तथा अन्य सुविधाएं उसी गति से विकसित न हों, तो इसका असर सीधे पढ़ाई पर पड़ता है.

बारिश में छत से पानी, गर्मी में कमरों का तापमान परेशानी

इस स्कूल की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ पुरानी इमारत नहीं है. समस्या यह है कि मौसम बदलते ही इस पुराने भवन की स्थिति विद्यार्थियों के लिए परेशानी बन जाती है.

बारिश के दिनों में छत से पानी टपकने की शिकायत है. ऐसे में कक्षा में पढ़ाई कर रहे बच्चों और शिक्षकों के सामने सबसे बड़ी चिंता पढ़ाई से ज्यादा अपने सामान और सुरक्षित बैठने की होती है.

कक्षा में रखी किताबें, कॉपियां और अन्य शिक्षण सामग्री पानी से खराब होने का खतरा रहता है. यदि पानी लगातार टपकता रहे तो बच्चों को दूसरी जगह बैठाना पड़ सकता है. इससे पूरी कक्षा की पढ़ाई प्रभावित होती है.

गर्मी में स्थिति दूसरी तरह की हो जाती है. पुराने भवन के कमरे तपने लगते हैं और लंबे समय तक वहां बैठकर पढ़ना विद्यार्थियों के लिए मुश्किल हो जाता है.

यह समस्या केवल आराम से जुड़ी हुई नहीं है. कक्षा का वातावरण सीधे बच्चों की एकाग्रता और सीखने की क्षमता को प्रभावित करता है. जिस समय विद्यार्थी को शिक्षक की बात समझने और पढ़ाई पर ध्यान देने की जरूरत होती है, उस समय अगर उसे तेज गर्मी या टपकती छत से जूझना पड़े, तो पढ़ाई का उद्देश्य ही प्रभावित होता है.

यही वजह है कि स्कूल भवन को केवल एक निर्माण कार्य मानकर नहीं देखा जा सकता. स्कूल की इमारत शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

900 विद्यार्थियों के लिए 12 और कमरों की जरूरत

स्कूल की दूसरी बड़ी समस्या कमरों की कमी है.

करीब 900 विद्यार्थियों के लिए वर्तमान में 12 कमरों में कक्षाएं संचालित होने की जानकारी सामने आई है. विद्यालय को 12 अतिरिक्त कमरों की जरूरत है.

इसका मतलब है कि स्कूल को तत्काल अतिरिक्त स्थान की आवश्यकता है. विद्यार्थियों की संख्या को देखते हुए अलग-अलग कक्षाओं के लिए पर्याप्त जगह होना जरूरी है.

किसी भी स्कूल में कमरे केवल बच्चों को बैठाने की जगह नहीं होते. इन्हीं कमरों में पढ़ाई होती है, शिक्षक विद्यार्थियों के साथ संवाद करते हैं और कई बार अलग-अलग गतिविधियां भी आयोजित की जाती हैं.

जब जगह कम पड़ती है तो सबसे पहले दबाव विद्यार्थियों पर आता है. कम जगह में अधिक बच्चों को बैठाना पड़ सकता है. इससे पढ़ाई का वातावरण प्रभावित होता है और शिक्षक के लिए प्रत्येक विद्यार्थी पर पर्याप्त ध्यान देना भी चुनौती बन सकता है.

यहां एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है। स्कूल में 48 नियमित शिक्षक होने की जानकारी भी खबर में दी गई है. यानी स्कूल में शिक्षकों की मौजूदगी है, लेकिन भवन और कमरों की कमी बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्या को सामने रखती है.

शिक्षक मौजूद हों, बच्चे स्कूल आ रहे हों, लेकिन उन्हें पढ़ने के लिए पर्याप्त और बेहतर कक्ष उपलब्ध न हों, तो शिक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अधूरा रह जाता है.

वर्षों से पत्राचार, फिर भी अतिरिक्त कमरे क्यों नहीं?

स्कूल की समस्याओं का सबसे अहम पहलू यह है कि अतिरिक्त कमरों की जरूरत नई नहीं बताई जा रही है. विद्यालय प्रबंधन की ओर से अतिरिक्त कमरों के लिए वर्षों से पत्राचार किए जाने की बात सामने आई है.

यहीं से प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल शुरू होता है.

अगर स्कूल प्रबंधन ने अपनी आवश्यकता संबंधित विभाग तक पहुंचाई है, तो फिर यह जानना जरूरी है कि प्रस्ताव किस स्तर पर अटका हुआ है. क्या बजट की कमी है? क्या तकनीकी स्वीकृति नहीं मिली? क्या निर्माण के लिए जमीन या दूसरी औपचारिकता बाकी है? या फिर मामला केवल सरकारी फाइलों में घूम रहा है?

इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग को देना चाहिए.

किसी भी सरकारी निर्माण कार्य में प्रक्रिया और औपचारिकताएं होती हैं. लेकिन बच्चों की जरूरत को देखते हुए यह भी जरूरी है कि इन प्रक्रियाओं की समयसीमा तय हो.

एक साल की देरी और कई साल तक समाधान न होने में बड़ा अंतर है. अगर किसी स्कूल में लगातार विद्यार्थी पढ़ रहे हैं और कमरों की जरूरत लगातार बनी हुई है, तो केवल पत्राचार करते रहना पर्याप्त नहीं है.

स्कूल को यह जानकारी भी सार्वजनिक करनी चाहिए कि अतिरिक्त कमरों के लिए अब तक क्या-क्या प्रयास किए गए और वर्तमान में प्रस्ताव किस स्थिति में है.

पुराना भवन है तो क्या सुरक्षा की जांच हुई?

91 साल पुराना भवन अपने आप में असुरक्षित है, ऐसा कहना सही नहीं होगा. किसी भवन की सुरक्षा उसकी उम्र से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक संरचनात्मक स्थिति से तय होती है.

लेकिन जब इतने पुराने भवन में छत से पानी टपकने की शिकायत सामने आए और मौसम बदलने के साथ विद्यार्थियों को परेशानी हो, तब तकनीकी जांच की जरूरत जरूर बढ़ जाती है. प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विद्यालय भवन का आखिरी बार तकनीकी निरीक्षण कब हुआ था. भवन की छत, दीवारों, खिड़कियों, बिजली व्यवस्था और अन्य हिस्सों की स्थिति क्या है? क्या किसी विशेषज्ञ टीम ने इसका निरीक्षण किया है?

अगर भवन सुरक्षित है और केवल मरम्मत की जरूरत है तो तत्काल मरम्मत कराई जानी चाहिए. अगर किसी हिस्से को बदलने की जरूरत है तो उसकी योजना बनाई जानी चाहिए. और अगर कहीं संरचनात्मक खतरा है तो विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए वैकल्पिक व्यवस्था जरूरी होगी.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी बड़ी दुर्घटना के बाद कार्रवाई का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए.

स्कूल की समस्या सिर्फ भवन की नहीं, व्यवस्था की भी है

इस खबर को केवल ‘पुरानी छत’ की कहानी मानना समस्या को छोटा करके देखना होगा.

यह मामला बताता है कि सरकारी स्कूलों में भवन निर्माण और रखरखाव की निगरानी कितनी जरूरी है. एक तरफ स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने और सरकारी शिक्षा को मजबूत करने की बात होती है, दूसरी तरफ अगर पुराने भवनों की समय पर मरम्मत नहीं होती और जरूरत के अनुसार अतिरिक्त कमरे नहीं बनाए जाते, तो दोनों के बीच अंतर साफ दिखाई देता है.

मार्तंड क्रमांक-3 जैसे पुराने विद्यालयों की अपनी एक पहचान होती है. ऐसे स्कूलों में कई पीढ़ियों ने शिक्षा हासिल की है। इसलिए इनके भवन और सुविधाओं को लेकर जिम्मेदारी भी अधिक हो जाती है.

पुरानी इमारत को संरक्षित रखना अच्छी बात है, लेकिन संरक्षण का अर्थ यह नहीं हो सकता कि बच्चों को असुविधा में पढ़ने के लिए छोड़ दिया जाए.

पुराने भवन को उसकी ऐतिहासिक पहचान के साथ सुरक्षित रखते हुए आधुनिक जरूरतों के अनुसार नए कमरे और सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं.

यही इस स्कूल के लिए भी सबसे व्यावहारिक रास्ता हो सकता है.

पानी की व्यवस्था है, लेकिन सफाई पर भी सवाल

खबर में स्कूल की पानी की व्यवस्था को लेकर भी स्थिति सामने आती है. पानी की सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद सफाई व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए गए हैं.

स्कूल में पीने के पानी की सुविधा होना जरूरी है, लेकिन केवल पानी की व्यवस्था कर देना पर्याप्त नहीं है. पानी की टंकी, नल और आसपास का क्षेत्र नियमित रूप से साफ होना भी उतना ही जरूरी है.

बच्चे दिन का बड़ा हिस्सा स्कूल में बिताते हैं. इसलिए स्कूल परिसर की साफ-सफाई, शौचालय, पेयजल और कक्षा की स्वच्छता सीधे उनके स्वास्थ्य और पढ़ाई के वातावरण से जुड़ी है.

इसी तरह पुराने भवन के आसपास भी नियमित रखरखाव होना जरूरी है.

यानी स्कूल की समस्या का समाधान केवल 12 नए कमरे बनाकर पूरा नहीं होगा. स्कूल को एक साथ भवन, पेयजल, सफाई और अन्य बुनियादी सुविधाओं के स्तर पर बेहतर करना होगा.

प्रशासन के सामने अब क्या चुनौती है?

मार्तंड क्रमांक-3 विद्यालय की स्थिति में सबसे जरूरी बात यह है कि जिम्मेदारी तय हो और समाधान समयबद्ध हो.

सबसे पहले पुराने भवन का तकनीकी निरीक्षण होना चाहिए. इसके बाद छत की समस्या का तत्काल समाधान किया जाना चाहिए, ताकि बारिश के दौरान बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो.

इसके साथ ही 12 अतिरिक्त कमरों की आवश्यकता को लेकर स्पष्ट स्थिति सामने आनी चाहिए. अगर निर्माण प्रस्ताव स्वीकृत हो चुका है तो उसकी समयसीमा बताई जाए। अगर प्रस्ताव लंबित है तो विभाग को उसकी वजह सार्वजनिक करनी चाहिए.

स्कूल प्रबंधन को भी यह बताना चाहिए कि मौजूदा कमरों में कक्षाओं का संचालन किस व्यवस्था के तहत हो रहा है और अतिरिक्त कमरों की जरूरत किन कक्षाओं के लिए सबसे अधिक है.

प्रशासन के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां बच्चों की संख्या कम नहीं है। करीब 900 विद्यार्थी इस स्कूल से जुड़े हैं. यानी किसी भी सुधार का असर सीधे सैकड़ों परिवारों पर पड़ेगा.

बच्चों की पढ़ाई को इंतजार में नहीं छोड़ा जा सकता

मार्तंड क्रमांक-3 की कहानी सिर्फ 91 साल पुरानी छत की कहानी नहीं है. यह उस अंतर की कहानी है जो पुराने बुनियादी ढांचे और आज की शिक्षा व्यवस्था की जरूरतों के बीच दिखाई दे रहा है.

स्कूल पुराना है, लेकिन यहां पढ़ने वाले बच्चे आज के हैं. उनकी जरूरतें आज की हैं. उन्हें सुरक्षित कक्षा चाहिए, पर्याप्त जगह चाहिए और ऐसा वातावरण चाहिए जिसमें वे बिना किसी परेशानी के पढ़ सकें.

अगर छत बारिश में टपकती है तो उसकी मरम्मत जरूरी है. अगर गर्मी में कमरे तपते हैं तो भवन में बेहतर वेंटिलेशन और आवश्यक सुविधाओं की जरूरत है. अगर 900 बच्चों के लिए 12 अतिरिक्त कमरे चाहिए तो उनका निर्माण भी प्राथमिकता में होना चाहिए.

सरकार और प्रशासन के लिए यह केवल एक स्कूल भवन का मामला नहीं है. यह उन 900 विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा सवाल है जो हर दिन स्कूल पहुंचते हैं और उम्मीद करते हैं कि उन्हें पढ़ने के लिए बेहतर माहौल मिलेगा.

अब जरूरत क्या है?

  • पुराने भवन का तकनीकी निरीक्षण.
  • छत की तत्काल मरम्मत.
  • 12 अतिरिक्त कमरों की स्वीकृति और निर्माण की स्पष्ट समयसीमा.
  • पेयजल और सफाई व्यवस्था की नियमित निगरानी.
  • गर्मी और बारिश के मौसम में विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित व्यवस्था.
  • स्कूल की भवन संबंधी समस्याओं पर नियमित प्रशासनिक निरीक्षण.

निष्कर्ष

रीवा के पीएमश्री शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मार्तंड क्रमांक-3 की तस्वीर एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ती है—जब किसी स्कूल में करीब 900 बच्चे पढ़ रहे हों और उसे 12 अतिरिक्त कमरों की जरूरत हो, तो समाधान के लिए और कितना इंतजार किया जाए?

91 साल पुरानी इमारत अपने आप में इतिहास है, लेकिन इतिहास को बचाने के साथ वर्तमान पीढ़ी की जरूरतों को पूरा करना भी जरूरी है. स्कूल की पुरानी इमारत को सुरक्षित और उपयोगी बनाए रखते हुए नए कमरों और आधुनिक सुविधाओं का विस्तार किया जा सकता है.

सबसे जरूरी यह है कि किसी दुर्घटना का इंतजार न किया जाए. छत से पानी टपकने के बाद बाल्टी रखने की व्यवस्था समाधान नहीं है; स्थायी मरम्मत ही समाधान है. इसी तरह वर्षों से अतिरिक्त कमरों की मांग का जवाब केवल एक और पत्र नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाला निर्माण होना चाहिए.

क्योंकि स्कूल की इमारत जितनी पुरानी हो सकती है, बच्चों का भविष्य उतना पुराना नहीं हो सकता. उनके लिए सुरक्षित छत, पर्याप्त कमरे और बेहतर पढ़ाई का माहौल आज ही चाहिए.

यह भी पढ़ें: मध्य प्रदेश: स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल, रीवा से MP तक क्या हाल?