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Gen Z: कैंपस राजनीति में लौटेगी Gen Z की आवाज?

छात्र संघ चुनाव, युवाओं की आवाज और बदलती राजनीति के बीच बड़ा सवाल—क्या Gen Z कैंपस पॉलिटिक्स को नया चेहरा देगी?

Gen Z: कैंपस राजनीति में लौटेगी Gen Z की आवाज?

एक समय था जब विश्वविद्यालय सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं होते थे. कैंपस में होने वाली बहसें देश की राजनीति की दिशा तय करती थीं. छात्र संघ चुनाव सिर्फ अध्यक्ष या महासचिव चुनने का माध्यम नहीं थे, बल्कि यही मंच युवाओं को लोकतंत्र, नेतृत्व, आंदोलन और सार्वजनिक जीवन की पहली पाठशाला देता था.

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर बदलती दिखाई दी है. कई विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव लंबे समय तक नहीं हुए, कहीं चुनाव टलते रहे तो कहीं प्रशासनिक या दूसरे कारणों से छात्र राजनीति सीमित होती चली गई.

अब सवाल यह है कि क्या नई पीढ़ी, यानी Gen Z, भारतीय कैंपस राजनीति में फिर से जान फूंक सकती है?

हाल में Times Special में प्रकाशित एक रिपोर्ट ने इसी सवाल को केंद्र में रखा है. रिपोर्ट का शीर्षक भी यही सवाल उठाता है—क्या Gen Z कैंपस राजनीति को नई जिंदगी दे सकती है?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज का युवा पिछली पीढ़ियों से अलग तरीके से राजनीति को देखता है. उसके हाथ में स्मार्टफोन है, सूचना के स्रोत पहले से कहीं ज्यादा हैं और राजनीतिक बहस सिर्फ कैंपस तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया पर कुछ ही मिनटों में कोई मुद्दा हजारों-लाखों युवाओं तक पहुंच सकता है.

लेकिन क्या ऑनलाइन सक्रियता वास्तविक छात्र राजनीति का विकल्प बन सकती है?

यही इस पूरी बहस का सबसे बड़ा सवाल है.

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छात्र राजनीति का पुराना दौर

भारत में छात्र राजनीति का इतिहास काफी पुराना है. विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से निकले कई छात्र नेता आगे चलकर राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं.

छात्र संघों ने फीस, हॉस्टल, छात्रवृत्ति, परीक्षा, रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता और कैंपस सुविधाओं जैसे मुद्दों को उठाया. कई बार कैंपस के मुद्दे राष्ट्रीय बहस का हिस्सा भी बने.

छात्र राजनीति की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि यह युवाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का प्रत्यक्ष अनुभव देती थी.

चुनाव लड़ना, प्रचार करना, विरोध करना, प्रशासन से बातचीत करना, अपनी बात रखना और दूसरे विचारों को सुनना—ये सभी लोकतंत्र की व्यावहारिक ट्रेनिंग का हिस्सा थे.

लेकिन धीरे-धीरे कई विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों की प्रक्रिया कमजोर पड़ी.

चुनाव नहीं होंगे तो नेतृत्व कहां से आएगा?

छात्र संघ चुनाव सिर्फ वोटिंग का कार्यक्रम नहीं होते. वे नेतृत्व तैयार करने की प्रक्रिया भी हैं.

अगर किसी विश्वविद्यालय में वर्षों तक छात्र संघ चुनाव नहीं होते, तो छात्रों के पास अपने प्रतिनिधि चुनने का लोकतांत्रिक मंच नहीं रहता.

रिपोर्ट में लखनऊ विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और दूसरे विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति और चुनावों की स्थिति का उल्लेख किया गया है.

कुछ जगह छात्र संघ चुनाव लंबे समय तक नहीं हुए, जबकि कुछ विश्वविद्यालयों में चुनावों को लेकर लगातार अनिश्चितता बनी रही.

यह स्थिति एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है—अगर विश्वविद्यालय लोकतांत्रिक नेतृत्व की पहली प्रयोगशाला हैं, तो वहां लोकतांत्रिक चुनावों का कमजोर होना भविष्य की राजनीति के लिए क्या मायने रखता है?

Gen Z की राजनीति पिछली पीढ़ियों से अलग क्यों है?

Gen Z को अक्सर ऐसी पीढ़ी के रूप में देखा जाता है जो इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में बड़ी हुई है.

इस पीढ़ी के लिए राजनीतिक जानकारी का माध्यम सिर्फ अखबार, टीवी या राजनीतिक सभाएं नहीं हैं. इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स, व्हाट्सऐप और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म भी राजनीतिक संवाद का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं.

आज कोई छात्र किसी राजनीतिक मुद्दे पर जानकारी लेने के लिए लाइब्रेरी में घंटों बैठने के बजाय कुछ मिनटों में अलग-अलग स्रोत देख सकता है.

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है.

सोशल मीडिया ने राजनीतिक भागीदारी को आसान तो बनाया है, लेकिन ऑनलाइन सक्रियता हमेशा जमीनी संगठन में नहीं बदलती.

किसी मुद्दे पर पोस्ट करना आसान है, लेकिन उसी मुद्दे को लेकर महीनों तक संगठन बनाना, छात्रों के बीच जाना और प्रशासन के सामने मांग रखना कहीं ज्यादा कठिन काम है.

यही वह जगह है जहां Gen Z की राजनीतिक क्षमता की असली परीक्षा होगी.

क्या छात्र राजनीति फिर लौट रही है?

हाल के वर्षों में कई छात्र आंदोलनों ने यह संकेत दिया है कि कैंपस राजनीति पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.

NEET, पेपर लीक, फीस, रोजगार, आरक्षण, छात्रवृत्ति और विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े मुद्दों पर युवाओं की आवाज कई बार कैंपस से निकलकर सड़कों तक पहुंची है.

इन आंदोलनों में एक बात खास दिखाई देती है—युवा सिर्फ पारंपरिक राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहना चाहते.

उनके सवाल सीधे उनकी जिंदगी से जुड़े हैं.

नौकरी मिलेगी या नहीं?

परीक्षा समय पर होगी या नहीं?

पेपर लीक हुआ तो जिम्मेदारी किसकी होगी?

फीस बढ़ेगी तो गरीब छात्र पढ़ेगा कैसे?

विश्वविद्यालय में छात्र की आवाज सुनी जाएगी या नहीं?

यानी नई छात्र राजनीति का केंद्र शायद विचारधारा से ज्यादा मुद्दे और जवाबदेही बनते जा रहे हैं.

Gen Z क्या चाहती है?

आज का छात्र सिर्फ यह नहीं पूछता कि कौन-सी पार्टी सत्ता में है.

वह यह भी पूछता है कि सरकार ने उसके लिए क्या किया.

रोजगार के आंकड़े क्या हैं? शिक्षा की गुणवत्ता कैसी है? परीक्षा व्यवस्था कितनी पारदर्शी है? कैंपस में सुविधाएं कैसी हैं? फीस क्यों बढ़ रही है?

युवा राजनीति में यह बदलाव महत्वपूर्ण है.

नई पीढ़ी राजनीतिक पहचान से ज्यादा अपने भविष्य को लेकर चिंतित दिखाई देती है.

इसका मतलब यह नहीं कि Gen Z विचारधारा से पूरी तरह दूर हो गई है. बल्कि यह कहा जा सकता है कि विचारधारा के साथ-साथ व्यावहारिक मुद्दों और परिणाम की मांग भी बढ़ी है.

छात्र संगठन बनाम नई डिजिटल राजनीति

भारत के विश्वविद्यालयों में लंबे समय से अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े छात्र संगठन सक्रिय रहे हैं.

इन संगठनों ने छात्रों को संगठन, नेतृत्व और आंदोलन की ट्रेनिंग दी है. लेकिन डिजिटल युग ने राजनीतिक भागीदारी का एक नया रास्ता भी खोल दिया है.

अब कोई छात्र बिना किसी बड़े संगठन का हिस्सा बने भी किसी मुद्दे पर अभियान शुरू कर सकता है.

एक पोस्ट वायरल हो सकती है.

एक वीडियो हजारों छात्रों तक पहुंच सकता है.

ऑनलाइन याचिका तैयार हो सकती है.

लेकिन यहां भी सवाल वही है—क्या वायरल पोस्ट वास्तविक बदलाव ला सकती है?

अक्सर जवाब तभी “हां” होता है जब ऑनलाइन अभियान जमीन पर संगठन और लगातार दबाव में बदलता है.

यानी भविष्य की छात्र राजनीति शायद ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों के मेल से बनेगी.

कैंपस राजनीति कमजोर होने का असर क्या है?

अगर छात्र राजनीति सिर्फ चुनावों तक सीमित कर दी जाए तो उसका महत्व कम हो सकता है.

कैंपस राजनीति का असली उद्देश्य छात्रों को सवाल पूछने और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का अवसर देना होना चाहिए.

एक निर्वाचित छात्र प्रतिनिधि विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के बीच संवाद का माध्यम बन सकता है.

वह फीस, हॉस्टल, लाइब्रेरी, परीक्षा, परिवहन, छात्रवृत्ति और दूसरी समस्याओं को संस्थागत तरीके से उठा सकता है.

लेकिन जब प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया कमजोर होती है, तो छात्रों की शिकायतें व्यक्तिगत स्तर पर रह सकती हैं.

इसलिए छात्र संघ चुनाव सिर्फ राजनीतिक महत्व का विषय नहीं है. यह कैंपस प्रशासन और छात्र प्रतिनिधित्व का भी सवाल है.

क्या छात्र राजनीति का मतलब सिर्फ विरोध है?

नहीं.

यह एक बड़ी गलतफहमी है कि छात्र राजनीति का मतलब केवल धरना, प्रदर्शन और नारेबाजी है.

वास्तव में स्वस्थ छात्र राजनीति का मतलब है—बहस, संवाद, चुनाव, नीति पर चर्चा, प्रशासन से सवाल और छात्रों की समस्याओं के समाधान के लिए संस्थागत प्रयास.

अगर छात्र संगठन सिर्फ राजनीतिक दलों की शाखा बन जाएं, तो उनकी स्वतंत्रता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

लेकिन अगर छात्र राजनीति पूरी तरह खत्म हो जाए, तो छात्रों के पास सामूहिक प्रतिनिधित्व का मंच भी कमजोर पड़ सकता है.

इसलिए जरूरत किसी एक पक्ष को खत्म करने की नहीं, बल्कि जवाबदेह और लोकतांत्रिक छात्र राजनीति को मजबूत करने की है.

क्या Gen Z नई तरह की छात्र राजनीति बनाएगी?

संभव है.

Gen Z की सबसे बड़ी ताकत उसकी तकनीकी समझ और सूचना तक पहुंच है.

लेकिन उसकी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि डिजिटल सक्रियता को वास्तविक सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी में कैसे बदला जाए.

एक छात्र अगर सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे को ट्रेंड करा सकता है, तो उसे विश्वविद्यालय के प्रशासनिक स्तर पर भी वही मुद्दा उठाने की क्षमता विकसित करनी होगी.

उसे सिर्फ पोस्ट नहीं, बल्कि संगठन भी बनाना होगा.

सिर्फ नाराजगी नहीं, बल्कि समाधान भी देना होगा.

सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि वैकल्पिक नीति पर भी बात करनी होगी.

अगर ऐसा होता है तो Gen Z की छात्र राजनीति पारंपरिक छात्र राजनीति से अलग और शायद ज्यादा प्रभावी मॉडल तैयार कर सकती है.

कैंपस लोकतंत्र की जरूरत क्यों है?

विश्वविद्यालय सिर्फ डिग्री देने वाली संस्थाएं नहीं हैं.

यही वह जगह है जहां देश के भावी शिक्षक, पत्रकार, वैज्ञानिक, वकील, प्रशासक, उद्यमी और राजनीतिक नेता तैयार होते हैं.

अगर यहां छात्रों को सवाल पूछने, असहमति व्यक्त करने और लोकतांत्रिक तरीके से प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलता है, तो इसका असर आगे चलकर पूरे समाज पर पड़ता है.

इसलिए छात्र संघ चुनावों को केवल कैंपस की छोटी राजनीति समझना सही नहीं होगा.

यह लोकतंत्र की जड़ों से जुड़ा मुद्दा है.

असली सवाल: Gen Z क्या बदलेगी?

Gen Z के सामने आज अवसर भी है और चुनौती भी.

अवसर इसलिए क्योंकि उसके पास पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सूचना, तकनीक और संवाद के साधन हैं.

चुनौती इसलिए क्योंकि सूचना की अधिकता के बीच सही और गलत में फर्क करना मुश्किल हो सकता है. सोशल मीडिया की तेज राजनीति कई बार गहरी बहस की जगह तत्काल प्रतिक्रिया को बढ़ावा देती है.

इसलिए Gen Z अगर कैंपस राजनीति को नई दिशा देना चाहती है, तो उसे तीन चीजों पर जोर देना होगा—

पहला—मुद्दे.
राजनीति छात्रों की वास्तविक समस्याओं से जुड़ी हो.

दूसरा—जवाबदेही.
चाहे छात्र संगठन हो या विश्वविद्यालय प्रशासन, सवाल सभी से पूछे जाएं.

तीसरा—लोकतंत्र.
असहमति को दुश्मनी न माना जाए और चुनाव को सिर्फ शक्ति हासिल करने का माध्यम न बनाया जाए.

निष्कर्ष:

कैंपस राजनीति खत्म नहीं हुई है. बल्कि वह एक बदलाव के दौर से गुजर रही है.

पुरानी राजनीति के पास संगठन और जमीनी नेटवर्क की ताकत थी. नई पीढ़ी के पास तकनीक, तेज संचार और नए मुद्दों की समझ है.

अगर ये दोनों ताकतें सकारात्मक तरीके से मिलती हैं, तो भारतीय विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर सकती है.

लेकिन इसके लिए छात्र संघ चुनाव नियमित और पारदर्शी होने चाहिए. विश्वविद्यालयों में छात्रों की आवाज के लिए लोकतांत्रिक मंच होना चाहिए. छात्र संगठनों को भी अपनी स्वतंत्रता, जवाबदेही और मुद्दा आधारित राजनीति पर ध्यान देना होगा.

आखिरकार सवाल सिर्फ यह नहीं है कि Gen Z कैंपस राजनीति को नई जिंदगी दे सकती है या नहीं.

बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारे विश्वविद्यालय Gen Z को अपनी राजनीति और लोकतंत्र को नए तरीके से गढ़ने का मौका देंगे?

क्योंकि आज का कैंपस सिर्फ कल के ग्रेजुएट नहीं तैयार कर रहा.
यही कैंपस तय करेगा कि कल का नागरिक कितना सवाल पूछेगा, कितना असहमत होगा और लोकतंत्र में अपनी भूमिका कितनी मजबूती से निभाएगा.

और शायद यही वजह है कि कैंपस की राजनीति को समझना, भारत की आने वाली राजनीति को समझने जैसा है.

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