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Toggleजल जीवन मिशन: जल जीवन मिशन में बड़ा खुलासा, हजारों करोड़ खर्च, फिर भी प्यासे हैं लाखों परिवार
“हर घर जल”… यह सिर्फ एक सरकारी नारा नहीं था, बल्कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों की उम्मीद थी. केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना का उद्देश्य था कि हर ग्रामीण घर तक स्वच्छ पेयजल नल के माध्यम से पहुंचे. लेकिन मध्य प्रदेश से सामने आई ताजा ऑडिट रिपोर्ट ने इस योजना की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
विधानसभा में पेश हुई ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में करीब 27 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन इसके बावजूद 34 लाख ग्रामीण परिवार आज भी नल से जल की सुविधा से वंचित हैं. रिपोर्ट में केवल लक्ष्य अधूरा रहने की बात ही नहीं कही गई, बल्कि ठेकेदारों और अधिकारियों की कथित सांठगांठ, परियोजनाओं में भारी देरी और करोड़ों रुपये के अनियमित भुगतान जैसे गंभीर आरोप भी सामने आए हैं.
यह मामला केवल सरकारी खर्च का नहीं, बल्कि उन लाखों ग्रामीण परिवारों का है, जो आज भी स्वच्छ पेयजल के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
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क्या था जल जीवन मिशन का उद्देश्य?
जल जीवन मिशन की शुरुआत ग्रामीण भारत के प्रत्येक घर तक सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के लक्ष्य के साथ की गई थी. मध्य प्रदेश में भी मार्च 2024 तक सभी ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन देने का लक्ष्य तय किया गया था.
सरकार का दावा था कि मिशन के माध्यम से गांवों में जल संकट समाप्त होगा, महिलाओं और बच्चों को पानी लाने की समस्या से राहत मिलेगी तथा स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी कम होंगे.
लेकिन ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि लक्ष्य और वास्तविक उपलब्धि के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है.
27 हजार करोड़ खर्च, फिर भी 34 लाख घरों तक नहीं पहुंचा पानी
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार—
- पिछले पांच वर्षों में लगभग 27 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए.
- इसके बावजूद 34 लाख ग्रामीण परिवारों तक नल से जल नहीं पहुंच पाया.
- दिसंबर 2024 तक प्रदेश के लगभग 1 करोड़ 11 लाख ग्रामीण परिवारों में से केवल 77 लाख परिवारों तक ही योजना का लाभ पहुंचा.
- यानी राज्य का कुल कवरेज करीब 60.90 प्रतिशत ही रहा.
इसका अर्थ यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी योजना अपने घोषित लक्ष्य से काफी पीछे रह गई.
राष्ट्रीय औसत से भी पीछे मध्य प्रदेश
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि मार्च 2025 तक देशभर में ग्रामीण जल कनेक्शन का औसत कवरेज लगभग 80 प्रतिशत तक पहुंच चुका था.
इसके मुकाबले मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा केवल 60.90 प्रतिशत रहा, जिससे स्पष्ट होता है कि राज्य राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है.
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब इतनी बड़ी राशि खर्च हुई, तो परिणाम अपेक्षित क्यों नहीं मिले?
ऑडिट रिपोर्ट में क्या-क्या अनियमितताएं सामने आईं?
रिपोर्ट में कई गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक गड़बड़ियों का उल्लेख किया गया है.
1. परियोजनाओं में भारी देरी
सितंबर 2024 तक जिन 147 परियोजनाओं की समीक्षा की गई, उनमें से केवल 39 परियोजनाएं ही पूरी हो सकीं.
बाकी कई परियोजनाएं निर्धारित समय से 136 दिन से लेकर 1262 दिन तक देरी से चलती रहीं.
इसके बावजूद संबंधित ठेकेदारों को भुगतान जारी रखा गया.
2. देरी के बावजूद ठेकेदारों को मिला लाभ
ऑडिट में आरोप लगाया गया कि परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं होने के बावजूद कई मामलों में ठेकेदारों को अनुचित आर्थिक लाभ दिया गया.
इससे सरकारी धन के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं.
3. करोड़ों रुपये के अनियमित भुगतान
रिपोर्ट में कुछ परियोजनाओं का विशेष उल्लेख किया गया है—
विदिशा परियोजना
बताया गया कि सहायक कार्यों के नाम पर लगभग 12.86 करोड़ रुपये का अनियमित भुगतान किया गया.
मंडीदीप परियोजना
वितरण नेटवर्क से जुड़े कार्यों में लगभग 11.73 करोड़ रुपये के भुगतान को लेकर सवाल उठाए गए हैं.
पयारी परियोजना
रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना के डिजाइन में बदलाव कर ठेकेदार को लगभग 15.93 करोड़ रुपये का अनुचित लाभ पहुंचाया गया.
सरकार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ
ऑडिट रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नियमों के उल्लंघन और वित्तीय अनियमितताओं के कारण सरकार पर 176.7 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा.
इसके अलावा जनभागीदारी से प्राप्त होने वाली राशि की वसूली भी अपेक्षित स्तर पर नहीं हो सकी.
इससे स्पष्ट होता है कि केवल परियोजनाओं के क्रियान्वयन में ही नहीं, बल्कि वित्तीय प्रबंधन में भी गंभीर कमियां रही हैं.
केंद्र और राज्य के आंकड़ों में बड़ा अंतर
रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया.
वर्ष 2023-24 के दौरान केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों में लगभग 8 लाख परिवारों का अंतर पाया गया.
ऐसे में यह सवाल उठता है कि वास्तविक लाभार्थियों की संख्या क्या है और आखिर दोनों स्तरों पर आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर क्यों है?
क्या वास्तव में हुआ था ‘हर घर जल’ का सर्वे?
ऑडिट रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कई स्थानों पर हर घर जल की वास्तविक स्थिति का समुचित सर्वेक्षण नहीं कराया गया.
यदि लाभार्थियों की सही पहचान ही नहीं होगी, तो योजना का सही मूल्यांकन और क्रियान्वयन कैसे संभव होगा?
ग्रामीण क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा असर
इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा असर ग्रामीण परिवारों पर पड़ा है.
आज भी अनेक गांवों में लोग—
- हैंडपंपों पर निर्भर हैं.
- गर्मियों में कई किलोमीटर दूर से पानी लाते हैं.
- टैंकरों का इंतजार करते हैं.
- दूषित पानी पीने को मजबूर हैं.
ऐसे में योजना का उद्देश्य अधूरा रह जाता है.
योजना पर उठे बड़े सवाल
इस पूरे मामले ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर दिए हैं—
- जब हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए तो लक्ष्य क्यों नहीं पूरा हुआ?
- परियोजनाओं की निगरानी में कमी क्यों रही?
- देरी के बावजूद भुगतान किस आधार पर किया गया?
- जिन अधिकारियों और ठेकेदारों पर सवाल उठे हैं, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी?
- क्या अब योजना की स्वतंत्र जांच होगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय में राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण रहेंगे.
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती
अब सरकार के सामने केवल अधूरी परियोजनाओं को पूरा करना ही चुनौती नहीं है, बल्कि जनता का विश्वास भी बहाल करना होगा.
यदि ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच होती है और दोषियों पर कार्रवाई होती है, तभी यह संदेश जाएगा कि सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को गंभीरता से लिया जा रहा है.
साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जिन लाखों परिवारों तक अब तक नल से जल नहीं पहुंचा है, उन्हें जल्द से जल्द योजना का वास्तविक लाभ मिले.
निष्कर्ष
जल जीवन मिशन का उद्देश्य ग्रामीण भारत को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना था, लेकिन मध्य प्रदेश की ऑडिट रिपोर्ट यह संकेत देती है कि योजना के क्रियान्वयन में कई स्तरों पर गंभीर कमियां और अनियमितताएं सामने आई हैं. लगभग 27 हजार करोड़ रुपये के खर्च के बावजूद 34 लाख परिवारों तक नल से जल नहीं पहुंचना प्रशासनिक दक्षता और वित्तीय जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़े करता है.
अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि ऑडिट रिपोर्ट में सामने आए निष्कर्षों पर संबंधित एजेंसियां और सरकार क्या कार्रवाई करती हैं. यदि जवाबदेही तय होती है और अधूरी परियोजनाएं समयबद्ध तरीके से पूरी की जाती हैं, तभी “हर घर जल” का सपना वास्तविकता में बदल सकेगा.
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