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रीवा: रीवा में हर चौथी गर्भवती एनीमिया की शिकार, इलाज की रफ्तार ने बढ़ाई चिंता

रीवा जिले की ताज़ा रिपोर्ट चौंकाने वाली है. जिले की हर चौथी गर्भवती महिला एनीमिया से जूझ रही है, लेकिन उससे भी बड़ी चिंता यह है कि जिन महिलाओं में बीमारी की पुष्टि हो चुकी है, उनमें से अधिकांश को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा

रीवा: रीवा में हर चौथी गर्भवती एनीमिया की शिकार, इलाज की रफ्तार ने बढ़ाई चिंता

रीवा जिले में मातृ स्वास्थ्य को लेकर सामने आई ताजा रिपोर्ट ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आंकड़े बताते हैं कि जिले की हर चौथी गर्भवती महिला एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित है. इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि जिन महिलाओं में एनीमिया की पुष्टि हो चुकी है, उनमें से अधिकांश को समय पर उपचार नहीं मिल पा रहा है.

स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार एनीमिया केवल एक सामान्य स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि यह गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के जीवन के लिए गंभीर खतरा बन सकता है. यदि समय रहते इसका इलाज न हो तो समयपूर्व प्रसव, कम वजन वाले बच्चे का जन्म, अत्यधिक रक्तस्राव और मातृ मृत्यु जैसी जटिलताओं का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है.

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रिपोर्ट ने खोली स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) की हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी रिपोर्ट के अनुसार रीवा जिले में पंजीकृत 8717 गर्भवती महिलाओं में से 2072 महिलाएं मध्यम एनीमिया से पीड़ित पाई गईं. यानी जिले की लगभग 24 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य से काफी कम है.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार मध्यम एनीमिया की श्रेणी में उन महिलाओं को रखा जाता है जिनका हीमोग्लोबिन स्तर 7 से 9.9 ग्राम प्रति डेसीलीटर के बीच होता है.

इसका अर्थ है कि जिले की लगभग हर चौथी गर्भवती महिला सुरक्षित मातृत्व की स्थिति में नहीं है.

इलाज में भी बड़ी लापरवाही

रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू इलाज की स्थिति है.

एनीमिया से पीड़ित 2072 महिलाओं में से केवल 357 महिलाओं को ही निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार उपचार मिल पाया. यानी 1715 महिलाएं अब भी समुचित इलाज से वंचित हैं.

दूसरे शब्दों में कहें तो जिन महिलाओं की बीमारी की पहचान हो चुकी है, उनमें से अधिकांश तक इलाज अभी तक नहीं पहुंच पाया है.

यह स्थिति स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था और उपचार प्रणाली दोनों पर सवाल खड़े करती है.

जवा विकासखंड की स्थिति सबसे खराब

विकासखंडवार आंकड़े देखें तो कई क्षेत्रों की स्थिति बेहद चिंताजनक है.

सबसे खराब हालात जवा विकासखंड में सामने आए हैं.

  • कुल पंजीकृत गर्भवती महिलाएं – 1221
  • एनीमिया से पीड़ित महिलाएं – 442
  • उपचार प्राप्त करने वाली महिलाएं – केवल 14

यानी यहां इलाज का प्रतिशत महज 3 प्रतिशत रहा.

इसका मतलब साफ है कि एनीमिया की पहचान तो हुई, लेकिन उपचार व्यवस्था लगभग ठप नजर आई.

रीवा विकासखंड में भी संतोषजनक नहीं हालात

रीवा विकासखंड में भी तस्वीर बहुत बेहतर नहीं है.

  • पंजीकृत गर्भवती महिलाएं – 2496
  • एनीमिया से पीड़ित – 442
  • उपचार प्राप्त – 86

यहां उपचार दर लगभग 19 प्रतिशत रही, जो स्वास्थ्य मानकों के हिसाब से बेहद कम मानी जा रही है.

गंगेव ने किया सबसे बेहतर प्रदर्शन

रिपोर्ट में एक सकारात्मक पक्ष भी सामने आया.

गंगेव विकासखंड ने उपचार के मामले में जिले में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया.

  • पंजीकृत गर्भवती महिलाएं – 1186
  • एनीमिया पीड़ित – 284
  • उपचार प्राप्त – 127

यहां उपचार दर करीब 45 प्रतिशत दर्ज की गई, जो जिले के अन्य विकासखंडों की तुलना में सबसे बेहतर रही.

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रतिशत भी आदर्श स्थिति से काफी दूर है.

अन्य विकासखंडों की स्थिति

रिपोर्ट के अनुसार अन्य क्षेत्रों में भी उपचार की गति बेहद धीमी रही.

  • त्योथर – 365 में से केवल 35 महिलाओं का उपचार.
  • सिरमौर – 238 में से केवल 31 महिलाओं का उपचार.
  • रायपुर कर्चुलियान – 301 में से केवल 64 महिलाओं को इलाज.
  • कई अन्य क्षेत्रों में भी उपचार की रफ्तार अपेक्षाकृत कमजोर रही.

ये आंकड़े बताते हैं कि समस्या किसी एक विकासखंड तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे जिले में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत करने की आवश्यकता है.

एनीमिया आखिर क्यों है खतरनाक?

गर्भावस्था के दौरान शरीर को सामान्य दिनों की तुलना में अधिक आयरन, फोलिक एसिड और पोषण की जरूरत होती है.

यदि शरीर में खून की कमी हो जाए तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं—

  • समयपूर्व प्रसव का खतरा
  • कम वजन वाले बच्चे का जन्म
  • प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव
  • संक्रमण का बढ़ता जोखिम
  • शिशु के विकास पर असर
  • गंभीर मामलों में मातृ मृत्यु तक की आशंका

इसी वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार दोनों गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच और आयरन सप्लीमेंट को बेहद जरूरी मानते हैं.

स्वास्थ्य विभाग क्या कह रहा है?

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि गंभीर और मध्यम एनीमिया वाली गर्भवती महिलाओं की पहचान कर उन्हें आयरन थेरेपी, पोषण परामर्श और नियमित जांच से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है.

अधिकारियों का दावा है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पताल तक हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की निगरानी की जा रही है. हालांकि जमीनी आंकड़े इस दावे से मेल खाते नजर नहीं आते. रिपोर्ट बताती है कि अधिकांश महिलाओं तक उपचार अभी भी समय पर नहीं पहुंच रहा है.

क्यों जरूरी है समय पर उपचार?

विशेषज्ञों का मानना है कि एनीमिया की पहचान जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक जरूरी उसका समय पर इलाज है.

यदि जांच के बाद भी गर्भवती महिला को आवश्यक दवाएं, पोषण संबंधी सलाह और नियमित फॉलोअप नहीं मिलता, तो पूरी स्क्रीनिंग प्रक्रिया का उद्देश्य अधूरा रह जाता है.

इसलिए स्वास्थ्य विभाग के लिए केवल सर्वे करना पर्याप्त नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि हर जरूरतमंद महिला तक उपचार पहुंचे.

ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे बड़ी चुनौती

रीवा जिले के कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी महिलाओं को संतुलित भोजन, आयरन युक्त आहार और नियमित स्वास्थ्य जांच उपलब्ध नहीं हो पाती.

कई मामलों में—

  • गर्भावस्था की देर से पहचान,
  • स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच की समस्या,
  • पोषण की कमी,
  • जागरूकता का अभाव,
  • और नियमित फॉलोअप न होना,

एनीमिया को और गंभीर बना देता है.

समाधान क्या हो सकता है?

मातृ स्वास्थ्य में सुधार के लिए कुछ अहम कदम जरूरी हैं—

  • सभी गर्भवती महिलाओं की समय पर हीमोग्लोबिन जांच.
  • आयरन और फोलिक एसिड की नियमित उपलब्धता.
  • आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से घर-घर फॉलोअप.
  • हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की डिजिटल मॉनिटरिंग.
  • पोषण अभियान को अधिक प्रभावी बनाना.
  • ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाना.

निष्कर्ष

रीवा जिले के ताजा आंकड़े केवल एनीमिया की समस्या नहीं बताते, बल्कि मातृ स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर चुनौतियों को भी उजागर करते हैं. यदि जिले की हर चौथी गर्भवती महिला खून की कमी से जूझ रही है और उनमें से अधिकांश को समय पर उपचार नहीं मिल रहा, तो यह केवल स्वास्थ्य विभाग का नहीं बल्कि पूरे सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र का विषय बन जाता है.

मातृ मृत्यु दर और नवजात स्वास्थ्य में सुधार के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं होगा. जरूरत इस बात की है कि हर गर्भवती महिला तक समय पर जांच, पोषण और इलाज पहुंचे। क्योंकि सुरक्षित मातृत्व केवल स्वास्थ्य सेवा नहीं, बल्कि हर महिला का अधिकार है.

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