Skip to main content

Vindhya First

अनूपपुर: जर्जर छत के नीचे भविष्य गढ़ रहे बच्चे, अर्जुनघाट स्कूल की तस्वीर चिंताजनक

अनूपपुर के अर्जुनघाट स्थित शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय में बारिश के दौरान छत से पानी टपकता है। बिजली की व्यवस्था नहीं होने से बादल छाते ही कक्षाओं में अंधेरा पसर जाता है। वहीं जर्जर भवन बच्चों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े कर रहा है

अनूपपुर: जर्जर छत के नीचे भविष्य गढ़ रहे बच्चे, अर्जुनघाट स्कूल की तस्वीर चिंताजनक

जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें और आंखों में बेहतर भविष्य के सपने होने चाहिए, उस उम्र में अनूपपुर के अर्जुनघाट के बच्चे टपकती छत, अंधेरी कक्षाओं और जर्जर भवन के बीच पढ़ाई करने को मजबूर हैं. बारिश शुरू होते ही स्कूल की छत से पानी टपकने लगता है. बादल छाते हैं तो बिजली की व्यवस्था नहीं होने के कारण कक्षाओं में अंधेरा पसर जाता है.

सबसे गंभीर चिंता बच्चों की सुरक्षा को लेकर है. जर्जर छत और भवन की स्थिति को देखकर हर समय किसी अप्रिय घटना की आशंका बनी रहती है. ऐसे में सवाल सिर्फ स्कूल की बदहाल व्यवस्था का नहीं, बल्कि उन बच्चों के सुरक्षित भविष्य का है, जो इसी विद्यालय के भरोसे अपनी शिक्षा आगे बढ़ा रहे हैं.

यह भी पढ़ें: CJP: CJP का नया प्रयोग, क्या बिना चुनाव लड़े बदलेगी भारतीय राजनीति?

बारिश में टपकती है स्कूल की छत

अनूपपुर जिले के बिजुरी क्षेत्र स्थित अर्जुनघाट के शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय में बारिश के मौसम में हालात और मुश्किल हो जाते हैं. बारिश होते ही विद्यालय की छत से कई जगह पानी टपकने लगता है.

पानी कक्षाओं के अंदर तक पहुंच जाता है. ऐसे में बच्चों को उसी वातावरण में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है। कई बार उन्हें पानी से बचने के लिए अपनी जगह बदलनी पड़ती है.

स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए बारिश का मौसम पढ़ाई के बजाय परेशानी लेकर आता है. किताबें और कॉपियां भीगने का डर अलग रहता है, जबकि लगातार गीले वातावरण में बैठने से बच्चों के स्वास्थ्य पर भी चिंता बनी रहती है.

लेकिन इससे भी बड़ा सवाल भवन की सुरक्षा का है। यदि किसी स्कूल की छत लंबे समय से खराब है और बारिश के दौरान लगातार पानी टपक रहा है, तो उसकी मजबूती और सुरक्षा की जांच होना जरूरी है.

बिजली नहीं, बादल छाते ही अंधेरा

विद्यालय की दूसरी बड़ी समस्या बिजली की व्यवस्था से जुड़ी है.

बारिश के दिनों में जब आसमान में घने बादल छा जाते हैं, तब प्राकृतिक रोशनी भी कम हो जाती है. ऐसे समय कक्षाओं के अंदर अंधेरा छा जाता है। बच्चों और शिक्षकों को उपलब्ध प्राकृतिक रोशनी के सहारे ही काम चलाना पड़ता है.

खिड़कियों से आने वाली रोशनी पर निर्भरता इसलिए भी मुश्किल है, क्योंकि बरसात के मौसम में इन्हीं रास्तों से कीड़े-मकौड़े कक्षाओं के भीतर आने की आशंका रहती है.

यानी बच्चों के सामने पढ़ाई से पहले ही कई सवाल खड़े हो जाते हैं—छत से पानी तो नहीं टपक रहा? कमरे में पर्याप्त रोशनी है या नहीं? और बारिश के कारण कोई कीड़ा-मकौड़ा कक्षा में तो नहीं आ गया?

यह स्थिति किसी भी सरकारी स्कूल के लिए सामान्य नहीं मानी जा सकती.

किताबों से पहले सुरक्षा की चिंता

स्कूल किसी भी बच्चे के लिए सीखने और अपने भविष्य को आकार देने की जगह होती है. लेकिन अर्जुनघाट के बच्चों के सामने स्थिति ऐसी है कि पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता भी करनी पड़ती है.

जर्जर भवन और खराब छत के बीच पढ़ने वाले बच्चों के लिए यह सवाल बेहद अहम है कि विद्यालय भवन कितना सुरक्षित है और उसकी नियमित जांच कब होती है.

यदि किसी स्कूल में बच्चों की सुरक्षा को लेकर आशंका बनी हुई है, तो संबंधित विभाग की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है. मरम्मत, भवन की जांच और आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.

आदिवासी क्षेत्र के बच्चों के लिए स्कूल है उम्मीद

अर्जुनघाट आदिवासी बहुल क्षेत्र है. ऐसे इलाकों में सरकारी स्कूलों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है.

कई बच्चों के लिए सरकारी विद्यालय ही शिक्षा हासिल करने का प्रमुख माध्यम है. स्कूल सिर्फ चार दीवारों का भवन नहीं, बल्कि उनके बेहतर भविष्य की पहली सीढ़ी है.

यही वजह है कि जब किसी आदिवासी क्षेत्र के सरकारी स्कूल में बुनियादी सुविधाओं का अभाव सामने आता है, तो इसका असर केवल वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर नहीं पड़ता, बल्कि बच्चों के भविष्य पर भी पड़ता है.

एक सुरक्षित कक्षा, पर्याप्त रोशनी, मजबूत भवन और बारिश से बचाव जैसी सुविधाएं किसी विशेष सुविधा की श्रेणी में नहीं आतीं. ये स्कूल की बुनियादी जरूरतें हैं.

ग्रामीणों ने उठाए सवाल

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार विद्यालय की समस्याओं को लेकर संबंधित अधिकारियों का ध्यान कई बार आकर्षित कराया गया है. इसके बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं होने से नाराजगी बनी हुई है.

ग्रामीणों और अभिभावकों की मांग है कि विद्यालय भवन की स्थिति का तत्काल निरीक्षण कराया जाए और आवश्यक मरम्मत कराई जाए.

उनकी प्रमुख मांगों में जर्जर छत की मरम्मत, भवन को सुरक्षित बनाना और विद्यालय में बिजली की व्यवस्था करना शामिल है.

अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे ऐसे वातावरण में पढ़ें जहां उन्हें बारिश, अंधेरे या जर्जर भवन की चिंता न करनी पड़े.

शिक्षा व्यवस्था के दावों के बीच बड़ा सवाल

मध्य प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने और सरकारी स्कूलों में सुविधाएं उपलब्ध कराने को लेकर लगातार योजनाएं और दावे किए जाते हैं. लेकिन जब जमीनी स्तर पर किसी स्कूल में छत, बिजली और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव सामने आता है, तो इन दावों की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

शिक्षा की गुणवत्ता केवल किताबें और शिक्षक उपलब्ध कराने से सुनिश्चित नहीं होती. इसके लिए बच्चों को सुरक्षित और अनुकूल वातावरण देना भी उतना ही जरूरी है.

अगर बारिश में कक्षा की छत टपकती हो और अंधेरा होने पर बच्चों के पास पर्याप्त रोशनी न हो, तो ऐसे वातावरण में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कल्पना करना मुश्किल हो जाता है.

प्रशासन से क्या है उम्मीद?

अर्जुनघाट के इस विद्यालय की स्थिति को देखते हुए सबसे पहले भवन की तकनीकी जांच कराना जरूरी है. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भवन बच्चों के लिए सुरक्षित है या नहीं.

इसके साथ ही बारिश से पहले छत और भवन की मरम्मत, कक्षाओं में पर्याप्त रोशनी तथा बिजली की व्यवस्था जैसे जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए.

यदि किसी बड़े निर्माण कार्य की आवश्यकता है, तो उसकी प्रक्रिया भी जल्द शुरू की जानी चाहिए, ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो.

अभिभावकों और ग्रामीणों को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समस्या के समाधान की स्पष्ट समयसीमा भी मिलनी चाहिए.

बच्चों को चाहिए सुरक्षित स्कूल, कोई विशेष सुविधा नहीं

अर्जुनघाट के बच्चों की मांग बहुत बड़ी नहीं है. उन्हें किसी महंगे स्मार्ट क्लास या विशेष सुविधा की मांग नहीं है.

उन्हें सिर्फ एक ऐसा स्कूल चाहिए जहां बारिश में छत न टपके, कक्षा में पर्याप्त रोशनी हो और भवन उनकी सुरक्षा के लिए खतरा न बने.

हर बच्चे का अधिकार है कि उसे सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण में शिक्षा मिले. ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों के बच्चों को भी वही सुविधाएं मिलनी चाहिए जो किसी शहर के बच्चे को मिलती हैं.

टपकती छत से बड़ा है भविष्य का सवाल

अर्जुनघाट के सरकारी स्कूल की तस्वीर सिर्फ एक जर्जर भवन की कहानी नहीं है, यह उस व्यवस्था के सामने खड़ा सवाल है, जो बच्चों के बेहतर भविष्य का दावा करती है.

बारिश की बूंदें जब स्कूल की छत से कक्षा में गिरती हैं, तो उनके साथ बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है. अंधेरे कमरे सिर्फ रोशनी की कमी नहीं दिखाते, बल्कि उस बुनियादी व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं जो बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की जिम्मेदारी निभाती है.

जिस छत को बच्चों को सुरक्षा देनी चाहिए, अगर वही चिंता का कारण बन जाए और जिस कक्षा में भविष्य की नींव तैयार होनी चाहिए, वहां अंधेरा छा जाए, तो कार्रवाई जरूरी है.

अब जरूरत केवल आश्वासन की नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने की है.

क्योंकि अर्जुनघाट के बच्चों का भविष्य किसी जर्जर छत, अंधेरे कमरे या सरकारी फाइलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.

बच्चों को सुरक्षित स्कूल चाहिए.
और सुरक्षित स्कूल उनका अधिकार है.

रिपोर्ट: सुनील गुप्ता

यह भी पढ़ें: सीधी:सीधी के स्कूल में शिक्षक पर नशे के आरोप, बच्चों ने बताई चौंकाने वाली बात