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Toggleमऊगंज: मऊगंज में विकास के दावे सूखे, पानी के लिए तड़पता आदिवासी गांव
एक तरफ सरकार करोड़ों रुपए की योजनाओं के जरिए हर घर तक पानी पहुंचाने का दावा कर रही है… दूसरी तरफ मऊगंज जिले का एक आदिवासी गांव आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहा है. यहां लोगों की जिंदगी आज भी तालाब और दूर के नल पर निर्भर है. हालात इतने खराब हैं कि महिलाएं, बुजुर्ग और छोटे-छोटे बच्चे भीषण गर्मी में लगभग एक किलोमीटर दूर जाकर पानी लाने को मजबूर हैं.
मऊगंज जिले के हनुमना जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत कला के सगहन नंबर-01 की तस्वीरें सरकारी दावों की हकीकत बयान कर रही हैं. यहां करीब 60 से 70 परिवार रहते हैं, लेकिन आज तक गांव में स्थायी जल व्यवस्था नहीं हो सकी। नल-जल योजना के तहत पाइप बिछाए गए, टंकियां लगाई गईं और घरों में टोटियां भी पहुंचीं, लेकिन कुछ दिनों की सप्लाई के बाद पूरी व्यवस्था ठप हो गई.
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नल-जल योजना बनी सिर्फ कागजी दावा
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में जल जीवन मिशन और नल-जल योजना के नाम पर काम जरूर हुआ, लेकिन उसका लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पाया. शुरुआत में कुछ दिनों तक घरों में पानी आया, जिससे ग्रामीणों को उम्मीद जगी थी कि अब उनकी वर्षों पुरानी समस्या खत्म हो जाएगी. लेकिन कुछ ही समय बाद पानी सप्लाई बंद हो गई और पूरा सिस्टम बेकार साबित हुआ.
आज हालत यह है कि गांव के लोग पीने के पानी के लिए दूर-दराज के नलों पर निर्भर हैं. महिलाओं को सिर पर बर्तन रखकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. भीषण गर्मी में यह संघर्ष और भी मुश्किल हो जाता है.
ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार सरपंच, सचिव और जिम्मेदार अधिकारियों से शिकायत की गई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला. जमीन पर कोई स्थायी समाधान आज तक नहीं दिखा.
तालाब बना गांव का सहारा
गांव में पानी की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं होने के कारण ग्रामीण दैनिक जरूरतों के लिए तालाब के गंदे पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं. नहाने, कपड़े धोने और मवेशियों के उपयोग तक के लिए यही तालाब एकमात्र सहारा बना हुआ है.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि छोटे-छोटे बच्चे भी इसी तालाब में उतरते हैं. जहां एक तरफ पानी में गंदगी और संक्रमण का खतरा बना रहता है, वहीं दूसरी तरफ किसी बड़े हादसे की आशंका भी लगातार बनी रहती है.
गर्मी बढ़ने के साथ तालाब का पानी और खराब होता जा रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि मजबूरी में उन्हें यही पानी इस्तेमाल करना पड़ रहा है क्योंकि दूसरा कोई विकल्प मौजूद नहीं है.
आदिवासी परिवारों की जिंदगी संघर्ष में
सगहन नंबर-01 में रहने वाले अधिकतर परिवार आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर हैं. गांव में सड़क, पानी और अन्य मूलभूत सुविधाओं की स्थिति बेहद खराब है. लोगों का कहना है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन बाद में गांव की कोई सुध नहीं ली जाती.
महिलाएं रोज सुबह पानी भरने के लिए निकलती हैं और कई बार घंटों लाइन में लगना पड़ता है. छोटे बच्चे भी परिवार के साथ पानी लाने में मदद करते हैं. गर्मी के मौसम में यह परेशानी और बढ़ जाती है.
ग्रामीणों के मुताबिक, पानी की समस्या के कारण बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है क्योंकि परिवार का अधिकतर समय पानी जुटाने में ही निकल जाता है.
बीमारी और हादसे का बढ़ता खतरा
गंदे तालाब के पानी के इस्तेमाल से गांव में बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के समय तालाब का पानी और ज्यादा दूषित हो जाता है. इसके बावजूद लोग मजबूरी में उसी पानी का उपयोग करते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार दूषित पानी के इस्तेमाल से डायरिया, टाइफाइड, त्वचा रोग और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बना रहता है. गांव में स्वास्थ्य सुविधाएं भी सीमित हैं, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है.
बच्चों के तालाब में उतरने से डूबने जैसी दुर्घटनाओं का खतरा भी बना हुआ है. ग्रामीण कई बार इस मुद्दे को प्रशासन के सामने उठा चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.
जिम्मेदारों पर उठ रहे सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर करोड़ों की योजनाओं के बावजूद गांव तक पानी क्यों नहीं पहुंच पा रहा? जब पाइपलाइन, टंकियां और नल लगाए गए तो फिर सप्लाई बंद क्यों हो गई? और आखिर प्रशासन इस समस्या को लेकर गंभीर क्यों नहीं दिखाई दे रहा?
सरकार आदिवासी विकास और हर घर जल योजना को अपनी बड़ी उपलब्धि बताती है, लेकिन मऊगंज के इस गांव की तस्वीरें उन दावों की पोल खोल रही हैं. यहां आज भी लोग पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
ग्रामीणों का कहना है कि अगर जल्द व्यवस्था ठीक नहीं हुई तो आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है.
क्या अब जागेगा प्रशासन?
विस्तार न्यूज़ की टीम जब गांव पहुंची तो वहां की तस्वीरें बेहद चिंताजनक थीं. भीषण गर्मी में महिलाएं सिर पर पानी के बर्तन लेकर लंबी दूरी तय कर रही थीं. बच्चे तालाब में नहा रहे थे और ग्रामीण गंदे पानी का इस्तेमाल करने को मजबूर दिखाई दिए.
अब देखना होगा कि इस खबर के सामने आने के बाद प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारी हरकत में आते हैं या नहीं. क्या गांव के लोगों को स्वच्छ पानी मिल पाएगा? क्या नल-जल योजना दोबारा शुरू होगी? या फिर आदिवासी परिवार इसी तरह हर दिन पानी के लिए संघर्ष करते रहेंगे?
मऊगंज जिले के सगहन कला गांव की यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि उन दावों पर बड़ा सवाल है जिनमें हर घर तक पानी पहुंचाने की बात कही जाती है. जब तक गांवों तक मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंचेंगी, तब तक विकास के दावे अधूरे ही रहेंगे.