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Toggleमऊगंज: आदिवासियों पर खनन का कहर, घर बचाने की गुहार लेकर कलेक्ट्रेट पहुंची 80 वर्षीय बुजुर्ग महिला
मऊगंज: आंखों में आंसू, चेहरे पर बेबसी और दिल में अपने आशियाने को बचाने की आखिरी उम्मीद. यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले का है, जहां एक 80 वर्षीय आदिवासी महिला अपने गांव के दो दर्जन से अधिक लोगों के साथ कलेक्ट्रेट कार्यालय पहुंची. उसके कांपते हाथ जुड़े हुए थे और उसकी जुबान पर सिर्फ एक ही गुहार थी— “साहब, हमारा घर बचा लो.”
यह केवल एक बुजुर्ग महिला की अपील नहीं थी, बल्कि उन सैकड़ों आदिवासी परिवारों की आवाज थी, जो आज अपने ही घरों में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. जिन पहाड़ियों, जंगलों और जमीनों पर उनके पूर्वजों ने पीढ़ियों तक जीवन बिताया, आज वही क्षेत्र खनन गतिविधियों और ब्लास्टिंग के कारण उनके लिए भय का कारण बन गए हैं.
मऊगंज जिले के आदिवासी अंचल से सामने आई यह कहानी कई गंभीर सवाल खड़े करती है. सवाल विकास के मॉडल पर भी है और उन लोगों के भविष्य पर भी, जिनकी जिंदगी सीधे तौर पर प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी हुई है.
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जब खाना खाते समय थाली में गिरने लगते हैं पत्थर
कलेक्ट्रेट पहुंची बुजुर्ग महिला ने अधिकारियों के सामने जो दर्द बयां किया, वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर सकता है.
महिला का कहना है कि उनके गांव के आसपास लगातार ब्लास्टिंग की जा रही है. विस्फोट इतने तेज होते हैं कि पत्थर उड़कर सीधे उनके घरों तक पहुंच जाते हैं. कई बार तो परिवार जब खाना खाने बैठता है, तब पत्थर उनकी थाली तक में आ गिरते हैं.
सोचिए, एक ऐसा परिवार जो दिनभर मेहनत कर अपने लिए दो वक्त की रोटी जुटाता है, उसे यह भी डर सताता है कि खाना खाते समय कहीं कोई पत्थर उसके बच्चे या बुजुर्ग को घायल न कर दे.
ग्रामीणों का कहना है कि विस्फोटों के दौरान घरों की दीवारों में दरारें पड़ रही हैं. कई मकान कमजोर हो चुके हैं और लोगों को डर है कि किसी दिन बड़ा हादसा हो सकता है.
ब्लास्टिंग के समय घर छोड़ने को मजबूर होते हैं लोग
ग्रामीणों के अनुसार, ब्लास्टिंग के समय गांव के लोगों को जबरन घरों से बाहर निकलने के लिए कहा जाता है.
महिलाओं का आरोप है कि कई बार छोटे बच्चों और बुजुर्गों को भी घरों से बाहर निकाल दिया जाता है. गांव के लोग अपनी जान बचाने के लिए दूर खेतों और पेड़ों के नीचे जाकर घंटों इंतजार करते हैं.
सबसे ज्यादा परेशानी बच्चों को होती है. कई मासूम बच्चे दिनभर धूप में बैठने को मजबूर हो जाते हैं। पढ़ाई प्रभावित होती है और उनके मन में लगातार डर बना रहता है.
ग्रामीणों का कहना है कि यह स्थिति वर्षों से बनी हुई है, लेकिन उनकी शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
कथित धमकी का वीडियो बना चर्चा का विषय
मामले को और गंभीर बनाने वाला एक वीडियो भी सामने आया है, जिसकी चर्चा पूरे इलाके में हो रही है.
ग्रामीणों का आरोप है कि खनन से जुड़े कुछ लोग हथियारों के साथ गांव में पहुंचते हैं. जब ग्रामीणों ने उनसे सवाल किया कि वे हथियार लेकर क्यों आए हैं, तो कथित रूप से जवाब मिला—
“राइफल मेरी सुरक्षा के लिए है, तेरे लिए 500 रुपये की गोली थोड़ी खर्च करूंगा.”
यह कथित बयान अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है.
ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह की बातें उनके मन में भय पैदा करती हैं. वे महसूस करते हैं कि उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है.
हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन वीडियो सामने आने के बाद मामले ने नया मोड़ ले लिया है.
जल, जंगल और जमीन के बाद अब घर भी खतरे में
आदिवासी समाज का जीवन जल, जंगल और जमीन से जुड़ा होता है. यही उनकी पहचान है और यही उनकी आजीविका का आधार भी.
लेकिन मऊगंज के कई ग्रामीणों का आरोप है कि धीरे-धीरे उनकी दुनिया उनसे छिनती जा रही है.
पहले जंगल कम हुए, फिर खेती योग्य जमीन प्रभावित हुई और अब उनके घरों पर संकट मंडरा रहा है.
ग्रामीणों का कहना है कि जिन पहाड़ियों को वे प्रकृति की देन मानते थे, आज उन्हीं पहाड़ियों के पत्थर उनके जीवन के लिए खतरा बन गए हैं.
खनन गतिविधियों को लेकर क्या हैं आरोप?
ग्रामीणों का आरोप है कि सीधी जिले के हरदी क्षेत्र में संचालित सिद्धिविनायक स्टोन क्रशर के लिए पत्थर मऊगंज जिले के सरदमन गांव स्थित बालाजी माइंस से लिया जाता है.
स्थानीय लोगों का दावा है कि खनन गतिविधियां स्वीकृत क्षेत्र की सीमा से आगे तक पहुंच रही हैं.
उनका कहना है कि जिन क्षेत्रों में वर्षों से आदिवासी परिवार निवास कर रहे हैं, वहां भी खनन का दबाव बढ़ता जा रहा है.
ग्रामीणों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यह देखा जाए कि खनन गतिविधियां नियमों के अनुसार हो रही हैं या नहीं.
हथियार लेकर गांव में आने का आरोप
ग्रामीणों ने कुछ लोगों पर गांव में हथियार लेकर आने के भी आरोप लगाए हैं.
आदिवासी परिवारों का कहना है कि गांव में बाहरी लोग आते हैं और दबाव बनाने की कोशिश करते हैं.
ग्रामीणों के अनुसार, ऐसे माहौल में महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा डरे हुए हैं.
उनका कहना है कि वे केवल सुरक्षित वातावरण में अपने घरों में रहना चाहते हैं और किसी प्रकार के विवाद में नहीं पड़ना चाहते.
आधे गांव का पलायन, बाकी भी तैयारी में
ग्रामीणों का दावा है कि लगातार बढ़ते प्रदूषण, विस्फोट और असुरक्षा के कारण बड़ी संख्या में लोग गांव छोड़ चुके हैं.
स्थानीय लोगों के अनुसार, कई परिवार रोज़गार और सुरक्षित जीवन की तलाश में दूसरे क्षेत्रों में बस गए हैं.
जो लोग अभी भी गांव में हैं, वे मजबूरी में टिके हुए हैं क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं है.
ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में पूरा गांव खाली हो सकता है.
हवा में घुल रहा पत्थरों का धुआं
खनन और क्रशर गतिविधियों का एक बड़ा असर पर्यावरण पर भी पड़ रहा है.
ग्रामीणों का कहना है कि दिनभर उड़ने वाली धूल के कारण सांस लेना मुश्किल हो गया है.
सुबह घरों की छतों, आंगनों और बर्तनों पर धूल की मोटी परत जमा हो जाती है.
कई लोगों को लगातार खांसी, सांस लेने में परेशानी और आंखों में जलन जैसी समस्याएं हो रही हैं.
हालांकि इन दावों की चिकित्सकीय जांच होना जरूरी है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि उनके स्वास्थ्य पर असर साफ दिखाई दे रहा है.
बच्चों का भविष्य भी संकट में
गांव के बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं.
जहां एक ओर उन्हें सुरक्षित वातावरण नहीं मिल रहा, वहीं दूसरी ओर पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है.
ब्लास्टिंग और शोर के कारण कई बच्चे पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं.
अभिभावकों का कहना है कि वे अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देना चाहते हैं, लेकिन मौजूदा हालात में यह सपना अधूरा नजर आ रहा है.
बुजुर्ग महिला की पीड़ा बनी पूरे क्षेत्र की आवाज
कलेक्ट्रेट पहुंची 80 वर्षीय महिला की तस्वीर और उसकी गुहार अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गई है.
वह बार-बार अधिकारियों से कह रही थी कि उन्हें अपने घर से बेघर न किया जाए.
उसकी आंखों में केवल डर नहीं था, बल्कि अपने घर और गांव से जुड़े अनगिनत वर्षों की यादें भी थीं.
जिस घर में उसने जिंदगी बिताई, जिस आंगन में बच्चों को बड़ा होते देखा, आज वही घर उसे छिनता हुआ नजर आ रहा है.
प्रशासन से क्या है मांग?
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से कई मांगें रखी हैं.
उनकी प्रमुख मांगें हैं—
- खनन गतिविधियों की निष्पक्ष जांच.
- ब्लास्टिंग के नियमों का पालन सुनिश्चित करना.
- प्रभावित परिवारों की सुरक्षा.
- अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई.
- पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन.
- ग्रामीणों की शिकायतों का त्वरित समाधान.
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर कार्रवाई चाहिए.
क्या बोले खनन विभाग के अधिकारी?
मामले को लेकर जब खनन विभाग की अधिकारी दीपमाला तिवारी से बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच की जाएगी.
उन्होंने आश्वासन दिया कि यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी.
हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि वे अब जांच के परिणाम का इंतजार कर रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी समस्याओं का समाधान होगा.
विकास और मानवाधिकार के बीच संतुलन जरूरी
यह मामला केवल एक गांव या एक खदान का नहीं है.
यह उस बड़े सवाल को सामने लाता है कि विकास परियोजनाओं और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.
खनन और उद्योग आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन किसी भी विकास मॉडल की सफलता तभी मानी जाएगी जब उससे प्रभावित लोगों की सुरक्षा, सम्मान और अधिकार भी सुनिश्चित हों.
निष्कर्ष
मऊगंज की यह कहानी विकास, विस्थापन और संघर्ष की कहानी है.
एक ओर खनन गतिविधियों से आर्थिक लाभ की उम्मीद है, तो दूसरी ओर आदिवासी परिवार अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं.
जब एक 80 वर्षीय महिला हाथ जोड़कर प्रशासन से अपने घर को बचाने की गुहार लगाती है, तब यह केवल एक प्रशासनिक शिकायत नहीं रह जाती. यह एक मानवीय सवाल बन जाती है.
अब नजरें जिला प्रशासन, खनन विभाग और शासन पर टिकी हैं. सवाल यह है कि क्या इन आदिवासी परिवारों की आवाज सुनी जाएगी या फिर उनकी पुकार भी खदानों की गूंज में कहीं खो जाएगी.
आने वाले दिनों में प्रशासन की कार्रवाई ही तय करेगी कि इन परिवारों को न्याय मिलता है या नहीं. फिलहाल, मऊगंज के आदिवासी अपने घर, अपनी जमीन और अपने भविष्य को बचाने की उम्मीद में प्रशासन की ओर देख रहे हैं.
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