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Toggleसीधी: सीधी में सिस्टम की बड़ी लापरवाही, जिंदा व्यक्ति को बना दिया ‘मृत’
मध्य प्रदेश के सीधी जिले से सामने आई एक घटना ने सरकारी व्यवस्थाओं की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. यहां एक दिव्यांग व्यक्ति को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया, जबकि वह जिंदा होकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है.
सीधी विधानसभा क्षेत्र के ग्राम मोहनिया निवासी बाबूलाल कोल आज सिर्फ अपनी पहचान साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं. सरकारी दस्तावेजों में उन्हें मृत दिखा दिए जाने के कारण उनकी राशन और पेंशन दोनों बंद हो चुकी हैं. हालत यह है कि अब उन्हें अपने वृद्ध माता-पिता का पेट भरने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.
यह मामला अब केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बहस का बड़ा मुद्दा बन चुका है.
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सरकारी रिकॉर्ड में ‘मौत’, जमीन पर जिंदा इंसान
दिव्यांग बाबूलाल कोल का कहना है कि कुछ समय पहले तक उन्हें नियमित रूप से राशन और पेंशन मिल रही थी. लेकिन अचानक योजनाओं का लाभ बंद हो गया. शुरुआत में उन्हें लगा कि यह तकनीकी समस्या होगी, लेकिन जब उन्होंने जानकारी जुटाई तो सच्चाई जानकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई.
गांव के एक कंप्यूटर संचालक ने उन्हें बताया कि सरकारी रिकॉर्ड में उनकी मृत्यु दर्ज हो चुकी है. इसी कारण उनका नाम योजनाओं से हटा दिया गया और सभी लाभ बंद कर दिए गए.
सोचिए, एक जिंदा व्यक्ति को खुद यह साबित करना पड़े कि वह जीवित है — इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है.
“साहब, मैं जिंदा हूं…” — जनसुनवाई में लगाई गुहार
बाबूलाल ने बताया कि करीब एक माह पहले वह कलेक्टर जनसुनवाई में पहुंचे थे. वहां उन्होंने अधिकारियों के सामने हाथ जोड़कर अपनी पीड़ा बताई.
उन्होंने अधिकारियों से कहा —
“साहब, मैं जिंदा हूं… मेरी राशन और पेंशन चालू कर दीजिए.”
लेकिन आरोप है कि उनकी शिकायत के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. सरकारी प्रक्रियाओं की धीमी रफ्तार ने बाबूलाल और उनके परिवार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं.
बूढ़े माता-पिता के सामने भूख का संकट
बाबूलाल स्वयं दिव्यांग हैं और आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवार से आते हैं. सरकारी योजनाओं से मिलने वाली पेंशन और राशन ही परिवार का मुख्य सहारा था.
जब ये सुविधाएं बंद हुईं तो परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया. उनके वृद्ध माता-पिता अब दूसरों की मदद पर निर्भर हैं. गांव में यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल उठा रहे हैं.
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते मामले का समाधान नहीं हुआ तो परिवार भुखमरी जैसी स्थिति में पहुंच सकता है.
कांग्रेस नेताओं ने पहुंचकर सुनी पीड़ा
रविवार को कांग्रेस पार्टी के जिला अध्यक्ष ज्ञान सिंह बाबूलाल के घर पहुंचे और परिवार की स्थिति का जायजा लिया. इस दौरान कांग्रेस नेताओं ने प्रशासन पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया.
कांग्रेस के युवा नेता ज्ञानेंद्र अग्निहोत्री ने भी परिवार से मुलाकात की और राशन सामग्री उपलब्ध कराई. उन्होंने कहा कि यह घटना केवल एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता का उदाहरण है.
उन्होंने प्रशासन से मांग की कि बाबूलाल को तत्काल सरकारी रिकॉर्ड में जीवित घोषित किया जाए और उनकी राशन व पेंशन दोबारा शुरू की जाए.
सोशल मीडिया पर गरमाई राजनीति
यह मामला धीरे-धीरे राजनीतिक रंग भी लेने लगा है. मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए राज्य सरकार को घेरा.
कांग्रेस ने अपने पोस्ट में कहा कि किसी जीवित व्यक्ति को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित करना बेहद शर्मनाक और निंदनीय है. पार्टी ने इसे प्रशासनिक विफलता बताते हुए सरकार से जवाब मांगा.
सोशल मीडिया पर भी लोग इस घटना को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि यदि एक व्यक्ति को जिंदा होते हुए मृत घोषित किया जा सकता है, तो आम नागरिक सरकारी डेटा पर कैसे भरोसा करें?
प्रशासन ने क्या कहा?
मामला तूल पकड़ने के बाद जिला पंचायत सीईओ शैलेंद्र सिंह सोलंकी का बयान सामने आया. उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के माध्यम से मामला संज्ञान में आया है और इसकी जांच कराई जाएगी.
सीईओ ने आश्वासन दिया कि यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.
हालांकि अब तक बाबूलाल की राशन और पेंशन बहाल नहीं हो सकी है. ऐसे में परिवार को प्रशासनिक कार्रवाई का इंतजार है.
सवालों के घेरे में सरकारी सिस्टम
यह घटना कई बड़े सवाल खड़े करती है—
- आखिर बिना सत्यापन किसी व्यक्ति को मृत कैसे घोषित कर दिया गया?
- क्या सरकारी रिकॉर्ड अपडेट करने की प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं?
- यदि बाबूलाल पढ़े-लिखे या जागरूक नहीं होते, तो क्या उनकी पहचान हमेशा के लिए खत्म हो जाती?
- क्या ग्रामीण और गरीब लोगों की समस्याओं को प्रशासन गंभीरता से नहीं लेता?
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल रिकॉर्ड और सरकारी पोर्टलों में छोटी गलती भी गरीब परिवारों के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है.
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
देश के अलग-अलग राज्यों से पहले भी ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जहां जीवित लोगों को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया.
कहीं पेंशन बंद हुई, कहीं जमीन पर अधिकार खत्म हो गया, तो कहीं बैंक खाते सीज हो गए. लेकिन अधिकतर मामलों में पीड़ितों को महीनों तक दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े.
सीधी का यह मामला भी उसी लापरवाह व्यवस्था की एक और तस्वीर माना जा रहा है.
गरीब और दिव्यांगों के लिए सबसे बड़ा संकट
सरकारी योजनाएं गरीब, बुजुर्ग और दिव्यांग लोगों के लिए जीवनरेखा मानी जाती हैं. लेकिन जब सिस्टम की गलती से इन्हीं लोगों को योजनाओं से बाहर कर दिया जाए, तो उनका जीवन संकट में पड़ जाता है.
बाबूलाल का मामला यह दिखाता है कि प्रशासनिक त्रुटि केवल कागजों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सीधे इंसानों की जिंदगी प्रभावित करती है.
क्या अब मिलेगा इंसाफ?
फिलहाल बाबूलाल कोल अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं. प्रशासन ने जांच और कार्रवाई का भरोसा दिया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बाबूलाल को जल्द न्याय मिलेगा?
क्या उनकी राशन और पेंशन दोबारा शुरू होगी?
क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी?
और सबसे महत्वपूर्ण — क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में तय करेंगे कि यह मामला सिर्फ एक खबर बनकर रह जाएगा या फिर सिस्टम में सुधार की वजह बनेगा.
निष्कर्ष
सीधी के बाबूलाल कोल की कहानी केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं है. यह उस सरकारी व्यवस्था का आईना है, जहां कभी-कभी फाइलों और रिकॉर्ड्स में इंसान की जिंदगी से ज्यादा महत्व कागजों को मिल जाता है.
एक दिव्यांग व्यक्ति का यह कहना —
“साहब, मैं जिंदा हूं…”
सिर्फ मदद की गुहार नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम से पूछा गया एक बड़ा सवाल है.
अब देखना होगा कि प्रशासन इस सवाल का जवाब कार्रवाई से देता है या फिर बाबूलाल जैसे लोग यूं ही अपने अस्तित्व के लिए लड़ते रहेंगे.
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