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मध्य प्रदेश, जिसे भारत का हृदय प्रदेश कहा जाता है, वर्तमान में एक गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहा है. हाल ही में जारी सैटेलाइट आंकड़ों ने राज्य की एक डरावनी तस्वीर पेश की है. देश में नरवाई (फसल अवशेष) जलाने के मामले में मध्य प्रदेश सबसे आगे निकल गया है, जो न केवल मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर रहा है बल्कि वायु प्रदूषण के स्तर को भी खतरनाक बना रहा है.
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देश की 66% नरवाई अकेले मध्य प्रदेश में खाक
कंसोर्टियम फॉर रिसर्च ऑन एग्रोइकोसिस्टम मॉनिटरिंग एंड मॉडलिंग फ्रॉम स्पेस (CREAMS) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के ताज़ा आंकड़े चौंकाने वाले हैं. आंकड़ों के अनुसार, देश के प्रमुख 5 राज्यों में होने वाली नरवाई दहन की कुल घटनाओं में से 60% से अधिक हिस्सेदारी अकेले मध्य प्रदेश की है.
अप्रैल महीने की बात करें तो इन 5 राज्यों में कुल 48,524 मामले दर्ज किए गए, जिनमें से अकेले मध्य प्रदेश में 32,211 घटनाएं हुईं. यह स्थिति दर्शाती है कि प्रशासन की तमाम कोशिशों के बावजूद जमीन पर स्थिति अब भी बेकाबू है.
मध्य प्रदेश के टॉप 10 प्रभावित जिले
हैरानी की बात यह है कि देश के टॉप 10 सबसे अधिक नरवाई जलाने वाले जिलों में से 8 जिले अकेले मध्य प्रदेश के हैं.
| रैंक | जिला | घटनाओं की संख्या |
| 1 | विदिशा | 3928 |
| 2 | सिद्धार्थ नगर (उत्तर प्रदेश) | 3169 |
| 3 | रायसेन | 2839 |
| 4 | सिवनी | 2744 |
| 5 | उज्जैन | 2328 |
| 6 | नर्मदापुरम | 1721 |
| 7 | छिंदवाड़ा | 1583 |
| 8 | गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) | 1410 |
| 9 | गुना | 1389 |
| 10 | सागर | 1241 |
क्यों बेअसर हो रहे हैं नियम और जुर्माने?
सरकार ने नरवाई जलाने पर 15 हजार रुपये तक के जुर्माने और एफआईआर (FIR) का प्रावधान किया है, लेकिन धरातल पर यह सख्ती काम नहीं आ रही है. किसानों का मानना है कि अगली फसल की बुआई के लिए खेत तैयार करने का यह सबसे सस्ता और आसान तरीका है. हालांकि, वे यह भूल जाते हैं कि आग की लपटों के साथ मिट्टी के मित्र कीट और जैविक कार्बन भी जलकर राख हो रहे हैं.
बायोमास प्लान की विफलता: एक बड़ा कारण
पर्यावरण को बचाने के लिए सरकार ने नरवाई से बिजली बनाने की योजना (Biomass to Energy) तैयार की थी. केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के निर्देश थे कि ताप विद्युत गृहों में कोयले के साथ बायोमास का उपयोग किया जाए.
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लक्ष्य के अनुसार, 46 से 58 लाख टन बायोमास का उपयोग होना था.
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हकीकत में केवल 1.27 लाख टन का ही उपयोग हो पाया है.
यह विफलता दर्शाती है कि फसल अवशेषों के प्रबंधन की श्रृंखला में अभी भी कई कमियां हैं.
विशेषज्ञ की राय: समाधान क्या है?
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि नरवाई को जलाना किसी भी समस्या का हल नहीं है. डॉ. वी.के. गर्ग (दीन कृषि कॉलेज, गंजबासौदा) के अनुसार, इसके बेहतर विकल्प मौजूद हैं:
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यूरिया और डीकंपोजर का उपयोग: नरवाई पर यूरिया और वेस्ट डीकंपोजर के छिड़काव से इसे खाद में बदला जा सकता है. इससे मिट्टी को प्राकृतिक पोषक तत्व मिलते हैं.
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मशीनीकरण: बेलर मशीन के जरिए नरवाई के बंडल बनाकर उन्हें औद्योगिक उपयोग में लाया जा सकता है.
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जीरो टिलेज तकनीक: सुपर फीडर और सीड ड्रिल मशीनों की मदद से बिना नरवाई हटाए सीधी बुआई की जा सकती है, जिससे लागत कम होती है और नमी बनी रहती है.
निष्कर्ष
नरवाई दहन केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौती है. विदिशा और रायसेन जैसे जिलों में बढ़ती घटनाएं चेतावनी हैं कि यदि हमने समय रहते आधुनिक कृषि तकनीकों को नहीं अपनाया, तो हमारी ‘उपजाऊ धरती’ बंजर होने की कगार पर पहुँच जाएगी. प्रशासन को जुर्माने के साथ-साथ किसानों को संसाधन उपलब्ध कराने पर भी ध्यान देना होगा.