Vindhya First

रीवा: टीकर जंगल में बाक्साइट खनन, विकास या विनाश?

रीवा के टीकर जंगल पर मंडरा रहा है बड़ा खतरा! बाक्साइट खनन के लिए 75 एकड़ वन भूमि को मिली मंजूरी, हजारों पेड़ों की कटाई और हाथियों-बाघों के आशियाने पर संकट गहराया

Table of Contents

रीवा: टीकर जंगल में बाक्साइट खनन, विकास या विनाश?

रीवा के टीकर वन क्षेत्र में बाक्साइट खनन के लिए केंद्र सरकार ने सशर्त मंजूरी दे दी है.  इस फैसले के बाद अब उस घने जंगल पर खतरा मंडराने लगा है जो न केवल हजारों पेड़ों का घर है, बल्कि हाथियों, बाघों और तेंदुओं सहित कई वन्यजीवों का सुरक्षित आशियाना भी माना जाता है.

एक ओर सरकार और कंपनियां इसे औद्योगिक विकास की दिशा में बड़ा कदम बता रही हैं, तो दूसरी ओर पर्यावरणविद, स्थानीय ग्रामीण और वन्यजीव प्रेमी इसे प्राकृतिक धरोहर के विनाश की शुरुआत मान रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या एल्युमीनियम की चमक के लिए हजारों पेड़ों की बलि और वन्यजीवों का विस्थापन स्वीकार्य है?

कटनी मिनरल्स को मिली खनन की मंजूरी

रीवा के टीकर वन क्षेत्र के नीचे बाक्साइट के विशाल भंडार लंबे समय से खनन कंपनियों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं. इन्हीं भंडारों पर कब्जा जमाने के लिए कई कंपनियों ने लीज प्राप्त करने की कोशिश की, लेकिन बाजी आखिरकार कटनी मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड के हाथ लगी.

मध्यप्रदेश शासन की सिफारिश के बाद केंद्र सरकार ने प्रस्ताव क्रमांक FP/MP/MIN/QRY/437171/2023 को मंजूरी प्रदान की. इस मंजूरी के तहत कंपनी को 31.416 हेक्टेयर, यानी लगभग 75 एकड़ वन भूमि खनन के लिए आवंटित की जाएगी.

हालांकि अनुमति सशर्त दी गई है, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी वन भूमि पर खनन शुरू होना क्षेत्र की पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकता है.

यह भी पढ़ें-कृषि विवाद: कृषि मेले पर सियासी टकराव जीतू पटवारी ने लगाए गंभीर आरोप

75 एकड़ घने जंगल पर संकट

खनन परियोजना का सबसे चिंताजनक पहलू इसका पर्यावरणीय प्रभाव है. प्रस्तावित क्षेत्र में घना वन क्षेत्र फैला हुआ है, जिसमें बड़ी संख्या में पुराने और परिपक्व पेड़ मौजूद हैं.

हजारों पेड़ों की कटाई तय

विशेषज्ञों के अनुसार खदान, मशीनरी और परिवहन मार्ग तैयार करने के लिए लगभग 4,000 से 6,000 पेड़ों की कटाई हो सकती है. यह सिर्फ पेड़ों का नुकसान नहीं होगा, बल्कि पूरे क्षेत्र की जलवायु, भूजल स्तर और जैव-विविधता पर दीर्घकालिक असर डालेगा.

खनन और सड़क के लिए अलग उपयोग

स्वीकृत भूमि में से-

  • 28.079 हेक्टेयर क्षेत्र में सीधा बाक्साइट उत्खनन होगा
  • लगभग 3 हेक्टेयर भूमि भारी वाहनों और परिवहन मार्ग के लिए उपयोग होगी

यानी जंगल का एक बड़ा हिस्सा स्थायी रूप से औद्योगिक क्षेत्र में तब्दील हो जाएगा.

वन्यजीवों का आशियाना खतरे में

टीकर वन क्षेत्र केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि मध्य भारत की जैव-विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है. यहां कई दुर्लभ और संवेदनशील वन्यजीव पाए जाते हैं.

हाथियों का नया ठिकाना

वन विभाग के अनुसार वर्तमान में हाथियों का एक जोड़ा इस क्षेत्र में स्थायी रूप से विचरण कर रहा है. यह क्षेत्र उनके लिए सुरक्षित कॉरिडोर का हिस्सा बन चुका है.

बाघ और तेंदुओं की मौजूदगी

स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार—

  • क्षेत्र में बाघों की आवाजाही दर्ज की गई है
  • तेंदुए और अन्य शिकारी जीव नियमित रूप से देखे जाते हैं
  • बड़ी संख्या में हिरण, नीलगाय, जंगली सूअर और अन्य शाकाहारी जीव भी यहां निवास करते हैं

खनन शुरू होने के बाद विस्फोट, मशीनों का शोर और मानव गतिविधि बढ़ने से वन्यजीवों का प्राकृतिक व्यवहार प्रभावित होगा.

बढ़ सकता है मानव-वन्यजीव संघर्ष

विशेषज्ञों का कहना है कि जब वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होता है तो वे मानव बस्तियों की ओर बढ़ते हैं. इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं तेजी से बढ़ती हैं.

रीवा और आसपास के क्षेत्रों में पहले ही हाथियों की मौजूदगी के कारण कई बार फसल नुकसान और ग्रामीणों पर हमले की घटनाएं सामने आ चुकी हैं. यदि टीकर क्षेत्र में खनन शुरू हुआ तो यह खतरा और बढ़ सकता है.

दूसरी कंपनी की फाइल भी कतार में

कटनी मिनरल्स को अनुमति मिलने के बाद अब दूसरी कंपनियों की उम्मीदें भी बढ़ गई हैं.

सूत्रों के अनुसार किरण देवी वर्मा की फर्म ने करीब 80 एकड़ भूमि पर दो अलग-अलग खदानों के रिन्यूअल की मांग की है. यह प्रस्ताव अभी प्रक्रिया में है.

यदि इसे भी मंजूरी मिलती है तो पूरे क्षेत्र में खनन गतिविधियां कई गुना बढ़ सकती हैं, जिससे टीकर वन क्षेत्र का बड़ा हिस्सा औद्योगिक ज़ोन में बदल जाएगा.

पहले 2 हेक्टेयर, अब 75+ एकड़: खनन का विस्तार

करीब 14 वर्ष पहले इसी क्षेत्र में केवल 2 हेक्टेयर क्षेत्र में सीमित खनन होता था. लेकिन अब खनन का दायरा कई गुना बढ़ चुका है.

यह दर्शाता है कि धीरे-धीरे छोटे स्तर का खनन अब बड़े कॉर्पोरेट खनन मॉडल में बदल रहा है, जिसका प्रभाव केवल जमीन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी पारिस्थितिकी पर पड़ेगा.

आखिर बाक्साइट की इतनी डिमांड क्यों?

बाक्साइट विश्वभर में अत्यंत महत्वपूर्ण खनिज है क्योंकि यही एल्युमीनियम का प्रमुख स्रोत है.

एल्युमीनियम का उपयोग

एल्युमीनियम का इस्तेमाल होता है—

  • हवाई जहाज निर्माण में
  • ऑटोमोबाइल उद्योग में
  • इलेक्ट्रॉनिक्स और वायरिंग में
  • पैकेजिंग और सोडा कैन में
  • निर्माण कार्य और इंफ्रास्ट्रक्चर में

वैश्विक औद्योगिक मांग बढ़ने के कारण बाक्साइट की कीमत और महत्व दोनों तेजी से बढ़े हैं.

लेकिन मुनाफा किसका, नुकसान किसका?

स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सवाल है कि—

“अगर बाक्साइट रीवा से निकलेगा, रिफाइनिंग दूसरे राज्यों में होगी, मुनाफा कंपनियों को मिलेगा—तो फिर स्थानीय जनता को क्या मिलेगा?”

संभावित नुकसान

  • जंगल का स्थायी विनाश
  • वन्यजीवों का विस्थापन
  • भूजल स्तर में गिरावट
  • धूल और प्रदूषण
  • ग्रामीणों की आजीविका पर असर
  • खेती और जल स्रोत प्रभावित

क्या सशर्त मंजूरी पर्याप्त सुरक्षा दे पाएगी?

केंद्र सरकार ने अनुमति सशर्त दी है, यानी कंपनी को पर्यावरणीय और वन संरक्षण से जुड़ी कई शर्तों का पालन करना होगा.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि-

क्या जमीनी स्तर पर निगरानी होगी?

भारत में कई परियोजनाओं में देखा गया है कि-

  • शर्तें कागज़ों तक सीमित रह जाती हैं
  • पौधारोपण सिर्फ रिकॉर्ड में होता है
  • वन्यजीव संरक्षण उपायों का पालन नहीं होता
  • स्थानीय प्रशासन पर कंपनियों का दबाव रहता है

यदि यही स्थिति यहां रही तो टीकर का जंगल धीरे-धीरे खत्म हो सकता है.

विकास बनाम पर्यावरण: कौन जीतेगा?

यह मामला केवल रीवा का नहीं, बल्कि पूरे देश में विकास बनाम पर्यावरण की बहस का प्रतीक है.

एक पक्ष कहता है-

  • उद्योग जरूरी हैं
  • खनन से रोजगार मिलेगा
  • राज्य को राजस्व प्राप्त होगा

दूसरा पक्ष पूछता है-

  • क्या विकास का मतलब जंगल खत्म करना है?
  • क्या रोजगार के लिए प्रकृति का विनाश उचित है?
  • क्या आने वाली पीढ़ियों के हिस्से का पर्यावरण आज बेचा जा सकता है?

स्थानीय लोगों की बढ़ती चिंता

टीकर और आसपास के गांवों में रहने वाले लोग अब चिंता में हैं कि—

  • जंगल खत्म हुआ तो जल स्रोत सूखेंगे
  • वन उपज पर निर्भर परिवार प्रभावित होंगे
  • वन्यजीव गांवों की ओर आएंगे
  • धूल और ट्रकों से जनजीवन प्रभावित होगा

कई ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें परियोजना के वास्तविक प्रभावों की पूरी जानकारी तक नहीं दी गई.

निष्कर्ष: क्या इतिहास बन जाएगा टीकर का जंगल?

टीकर जंगल आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां से उसका भविष्य तय होना है। यदि प्रशासन ने सख्ती से पर्यावरणीय नियमों का पालन नहीं कराया, तो यह खनन परियोजना केवल बाक्साइट नहीं निकालेगी – यह हजारों पेड़ों, वन्यजीवों और प्राकृतिक संतुलन को भी निगल जाएगी.

केंद्र सरकार ने अनुमति दे दी है, लेकिन असली परीक्षा अब राज्य सरकार, प्रशासन और वन विभाग की है. उन्हें तय करना होगा कि विकास के नाम पर प्रकृति की कितनी कीमत चुकाई जा सकती है.

यह भी पढ़ें-विनेश चंदेल: विंध्य का लाल, देश का पॉलिटिकल स्ट्रैटेजिस्ट