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Toggleरीवा: रीवा अस्पताल में मीडिया एंट्री पर विवाद, पत्रकारों का धरना
कल्पना मिश्रा और उनके नवजात बच्चे की मौत का मामला सामने आने के बाद रीवा के संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल की व्यवस्थाओं और अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली को लेकर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं. अब इसी मामले से जुड़े घटनाक्रम के बीच सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में पत्रकारों की एंट्री और मीडिया कवरेज को लेकर विवाद सामने आया है.
पत्रकारों का आरोप है कि अस्पताल परिसर में कवरेज के दौरान मीडिया कर्मियों के साथ कथित तौर पर बदसलूकी की गई, कैमरे बंद करवाने का दबाव बनाया गया और उन्हें अस्पताल के भीतर रिपोर्टिंग करने से रोका गया. इसके विरोध में बुधवार को रीवा के पत्रकार एकजुट हुए और सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के बाहर धरने पर बैठ गए.
कल्पना मिश्रा केस के बाद बढ़ा सवालों का दायरा
रीवा के संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल में कल्पना मिश्रा और उनके नवजात बच्चे की मौत का मामला पिछले कई दिनों से चर्चा में है. परिवार की ओर से इलाज में लापरवाही के आरोप लगाए गए हैं और मामले में निष्पक्ष जांच तथा जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग को लेकर धरना भी जारी रहा है.
मामले में प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई हुई है. संजय गांधी अस्पताल के अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा को पद से हटाया गया और बाद में मामले की मजिस्ट्रियल जांच शुरू होने की जानकारी सामने आई. जांच में सीसीटीवी और ड्यूटी रिकॉर्ड जैसे दस्तावेजों की पड़ताल की मांग भी उठी है.
ऐसे समय में अस्पताल परिसर में मीडिया की मौजूदगी और पत्रकारों की रिपोर्टिंग को लेकर पैदा हुआ विवाद मामले को एक नए सवाल के सामने खड़ा करता है—क्या संवेदनशील मामलों में मीडिया की भूमिका को सीमित किया जा रहा है या अस्पताल प्रशासन सुरक्षा और व्यवस्था के नाम पर कोई अलग व्यवस्था लागू कर रहा है?
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पत्रकारों ने अस्पताल के बाहर दिया धरना
पत्रकारों का कहना है कि अस्पताल में खबरों की कवरेज के दौरान उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा. आरोप है कि कुछ कर्मचारियों ने पत्रकारों से कथित तौर पर अभद्र व्यवहार किया और कैमरा बंद करने के लिए कहा.
इसी के विरोध में रीवा के अलग-अलग मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकार एकजुट हुए और सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के बाहर धरने पर बैठ गए.
पत्रकारों की मांग है कि मीडिया कर्मियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित किया जाए और अस्पताल में पत्रकारों की कवरेज को लेकर स्पष्ट नियम बनाए जाएं. उनका कहना है कि यदि किसी क्षेत्र में मरीजों की निजता, सुरक्षा या संवेदनशीलता से जुड़ी कोई सीमा है तो अस्पताल प्रबंधन उसे स्पष्ट रूप से बताए, लेकिन पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार या दबाव की स्थिति स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए.
सवाल सिर्फ एंट्री का नहीं, पारदर्शिता का भी
अस्पतालों में मीडिया कवरेज को लेकर मरीजों की निजता और सुरक्षा महत्वपूर्ण विषय हैं. किसी भी पत्रकार को मरीज की निजी जानकारी, मेडिकल रिकॉर्ड या संवेदनशील दृश्य बिना अनुमति के सार्वजनिक नहीं करने चाहिए. लेकिन दूसरी ओर, सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में व्यवस्था, जवाबदेही और जनहित से जुड़े सवालों की रिपोर्टिंग भी पत्रकारिता का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यही वजह है कि इस पूरे विवाद को सिर्फ ‘पत्रकारों की एंट्री बंद’ होने तक सीमित करके देखने के बजाय यह समझना जरूरी है कि अस्पताल प्रशासन और मीडिया के बीच संवाद की व्यवस्था क्या है.
अगर अस्पताल प्रबंधन ने मीडिया प्रवेश को लेकर कोई नया प्रोटोकॉल बनाया है, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए. इससे पत्रकारों को भी अपनी रिपोर्टिंग की सीमाओं की जानकारी रहेगी और अस्पताल प्रशासन की ओर से भी पारदर्शिता बनी रहेगी.
कल्पना मिश्रा मामले में मीडिया की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?
कल्पना मिश्रा मामले में सामने आए वीडियो, परिवार के आरोप और प्रशासनिक कार्रवाई ने पूरे घटनाक्रम को सार्वजनिक चर्चा में ला दिया है. अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में मामले से जुड़े आरोपों और प्रशासन की कार्रवाई को सामने रखा गया है.
मामले की वास्तविक स्थिति जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी. ऐसे में मीडिया का काम किसी पक्ष को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों, आधिकारिक दस्तावेजों, परिवार के आरोपों और प्रशासन के जवाब को जनता तक पहुंचाना है.
इसी कारण अस्पताल जैसे सार्वजनिक संस्थान में मीडिया और प्रशासन के बीच संवाद की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है.
अस्पताल प्रबंधन के सामने भी कई सवाल
इस पूरे विवाद के बीच अस्पताल प्रबंधन से कुछ सीधे सवाल उठते हैं—
क्या सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में पत्रकारों के प्रवेश को लेकर कोई नया आदेश जारी किया गया है?
अगर मीडिया की एंट्री प्रतिबंधित की गई है तो इसका आधार क्या है?
क्या यह प्रतिबंध सभी पत्रकारों पर समान रूप से लागू है?
क्या अस्पताल में मीडिया कवरेज के लिए कोई अधिकृत अधिकारी या मीडिया समन्वय व्यवस्था है?
अगर पत्रकारों के साथ किसी कर्मचारी द्वारा कथित तौर पर बदसलूकी हुई है तो क्या अस्पताल प्रबंधन ने इसकी जांच शुरू की है?
और सबसे अहम—क्या अस्पताल प्रशासन पत्रकारों के सवालों का जवाब देने के लिए कोई औपचारिक व्यवस्था तैयार करेगा?
‘सच दबाने की कोशिश?’—या व्यवस्था का सवाल?
पत्रकारों के धरने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि अस्पताल परिसर में मीडिया की मौजूदगी को लेकर आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी.
क्या यह केवल अस्पताल की सुरक्षा और मरीजों की निजता से जुड़ा प्रशासनिक निर्णय है या फिर पत्रकारों की रिपोर्टिंग को सीमित करने का प्रयास?
इसका स्पष्ट जवाब अस्पताल प्रबंधन के आधिकारिक पक्ष और किसी लिखित आदेश से ही मिल सकता है.
फिलहाल इतना जरूर है कि कल्पना मिश्रा मामले के बाद अस्पताल व्यवस्था पर उठे सवालों के बीच मीडिया और अस्पताल प्रशासन के बीच नया विवाद सामने आ गया है. एक तरफ परिवार न्याय और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है, दूसरी तरफ पत्रकार अस्पताल में कवरेज को लेकर धरने पर बैठे हैं.
ऐसे में पूरे विवाद का समाधान टकराव से नहीं, बल्कि स्पष्ट नियम, पारदर्शिता और संवाद से निकलना जरूरी है.
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पत्रकार अस्पताल के अंदर जा सकते हैं या नहीं. सवाल यह भी है कि जनता को अस्पताल की व्यवस्थाओं और उससे जुड़े गंभीर सवालों की जानकारी कैसे मिलेगी?
अब निगाह अस्पताल प्रबंधन और प्रशासन के अगले कदम पर है.
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