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रीवा: डभौरा में एक महीने से अंधेरे में धुरकुच, बूंद-बूंद पानी को तरसे आदिवासी

रीवा के डभौरा में इंसानियत को झकझोर देने वाली तस्वीर! एक महीने से अंधेरे में जी रहा धुरकुच गांव, बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते लोग।

रीवा: डभौरा में एक महीने से अंधेरे में धुरकुच, बूंद-बूंद पानी को तरसे आदिवासी

मध्य प्रदेश के रीवा जिले से एक बेहद चिंताजनक और मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आई है. विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच नगर परिषद डभौरा के वार्ड क्रमांक 7 स्थित धुरकुच गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है. यहां पिछले एक महीने से बिजली ठप है और भीषण गर्मी के बीच पानी का संकट इतना गहरा गया है कि ग्रामीण गंदा पानी पीने को मजबूर हो गए हैं.

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एक महीने से अंधेरे में डूबा गांव

धुरकुच गांव, जो आदिवासी बहुल क्षेत्र है, पिछले एक महीने से अंधेरे में जीवन जी रहा है. गांव की बिजली सप्लाई पूरी तरह से बंद है. ग्रामीणों के अनुसार, एक महीने पहले अज्ञात चोरों द्वारा बिजली केबल काट ली गई थी, जिसके बाद से अब तक मरम्मत नहीं की गई.

इस घटना के बाद ग्रामीणों ने बिजली विभाग से लेकर मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 181 तक कई बार शिकायत दर्ज कराई, लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं. बिजली विभाग की उदासीनता ने गांव की समस्याओं को और गंभीर बना दिया है.

पानी के लिए संघर्ष: गड्ढा खोदकर पी रहे गंदा पानी

बिजली की अनुपलब्धता का सीधा असर पानी की व्यवस्था पर पड़ा है. गांव में लगे सरकारी बोरवेल पूरी तरह बेकार हो चुके हैं क्योंकि उन्हें चलाने के लिए बिजली नहीं है.

नतीजतन, ग्रामीणों को पानी के लिए करीब 2 किलोमीटर दूर जंगल की ओर जाना पड़ रहा है. वहां एक सूखी नदी में गड्ढा खोदकर जो थोड़ा बहुत पानी निकलता है, उसी को पीकर अपनी प्यास बुझा रहे हैं.

यह पानी न केवल गंदा है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. ऐसे हालात में बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है.

भीषण गर्मी ने बढ़ाई मुश्किलें

प्रदेश इस समय भीषण गर्मी और लू की चपेट में है. तापमान लगातार 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना हुआ है. ऐसे में बिना बिजली और स्वच्छ पानी के जीवन जीना ग्रामीणों के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं है.

बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं की स्थिति सबसे ज्यादा दयनीय हो गई है. दिनभर की तपती गर्मी में पानी की तलाश करना उनकी मजबूरी बन चुकी है.

जनप्रतिनिधियों का आरोप: अधिकारी नहीं दे रहे ध्यान

वार्ड क्रमांक 7 की पार्षद आसमा देवी ने प्रशासन और बिजली विभाग पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि:

  • बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर फोन तक नहीं उठाते
  • नगर परिषद द्वारा पानी के टैंकर भी नियमित रूप से नहीं भेजे जाते
  • शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई

यह स्थिति स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े करती है.

मीडिया के हस्तक्षेप के बाद जागा प्रशासन

जब यह मामला मीडिया के जरिए प्रशासन तक पहुंचा, तब जाकर हरकत देखने को मिली. रीवा कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने मामले का संज्ञान लेते हुए जल्द ही बिजली और पानी की व्यवस्था दुरुस्त करने का आश्वासन दिया है.

हालांकि, यह देखना अभी बाकी है कि यह आश्वासन जमीन पर कब तक उतरता है.

विकास के दावों पर उठते सवाल

यह घटना कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है:

  • क्या ग्रामीण क्षेत्रों में विकास सिर्फ कागजों तक सीमित है?
  • क्या आदिवासी क्षेत्रों को अब भी नजरअंदाज किया जा रहा है?
  • क्या बुनियादी सुविधाएं देना प्रशासन की प्राथमिकता नहीं है?

धुरकुच गांव की स्थिति यह बताती है कि आज भी कई गांव ऐसे हैं जहां बिजली और पानी जैसी मूलभूत जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं.

स्वास्थ्य पर मंडराता खतरा

गंदा पानी पीने से डायरिया, टाइफाइड, हैजा जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो यह एक बड़े स्वास्थ्य संकट में बदल सकता है.

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की परिस्थितियों में तत्काल स्वच्छ पानी और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना बेहद जरूरी होता है.

क्या मिलेगा समाधान या जारी रहेगा संघर्ष?

कलेक्टर द्वारा दिए गए आश्वासन के बाद अब ग्रामीणों को उम्मीद जरूर जगी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह उम्मीद जल्द ही राहत में बदलेगी?

या फिर धुरकुच के आदिवासी परिवारों को अभी और दिनों तक इसी तरह गंदा पानी पीकर जीवन बिताना पड़ेगा?

निष्कर्ष

डभौरा के धुरकुच गांव की यह तस्वीर न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि आज भी देश के कई हिस्सों में लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

अब समय आ गया है कि सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई की जाए, ताकि हर नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार मिल सके.

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