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चुनाव : Google Ads का करोड़ों का खेल

Google, YouTube और Facebook पर करोड़ों रुपये खर्च कर राजनीतिक दल वोटर्स तक पहुंचने की रणनीति बना रहे हैं

चुनाव में Google Ads का करोड़ों का खेल

भारत में चुनाव सिर्फ लोकतंत्र का पर्व नहीं, बल्कि रणनीति, संसाधन और प्रभाव का सबसे बड़ा मैदान भी है. पहले जहां राजनीतिक दलों की ताकत रैलियों, पोस्टरों और जनसभाओं से मापी जाती थी, वहीं अब यह लड़ाई मोबाइल स्क्रीन, YouTube वीडियो और Facebook फीड तक पहुंच चुकी है.

आज हर वोटर के हाथ में स्मार्टफोन है और यही वजह है कि चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा रणक्षेत्र अब डिजिटल प्लेटफॉर्म बन चुका है. YouTube, Google और Facebook जैसे प्लेटफॉर्म अब सिर्फ मनोरंजन या जानकारी के साधन नहीं रहे, बल्कि राजनीतिक प्रभाव के सबसे मजबूत हथियार बन गए हैं.

जैसे ही चुनाव आयोग तारीखों का ऐलान करता है, अचानक राजनीतिक विज्ञापनों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है. सवाल यह है कि आखिर चुनाव के समय राजनीतिक दल करोड़ों रुपये Google Ads पर क्यों खर्च करते हैं? इसके पीछे क्या रणनीति होती है? कौन सबसे ज्यादा खर्च करता है? और क्या ये विज्ञापन वास्तव में वोटर के फैसले को प्रभावित करते हैं?

आइए समझते हैं चुनाव और Google Ads के इस करोड़ों के खेल को.

चुनाव आते ही क्यों बढ़ जाता है डिजिटल विज्ञापनों का बजट?

भारत में चुनाव किसी त्योहार से कम नहीं होते. लोकसभा चुनाव हो, विधानसभा चुनाव हो या नगर निकाय चुनाव-हर चुनाव के साथ राजनीतिक दलों की सक्रियता चरम पर पहुंच जाती है.

सालभर जो विज्ञापन बजट सीमित रहता है, वही चुनाव की घोषणा होते ही अचानक रॉकेट की तरह ऊपर चला जाता है. इसका सबसे बड़ा कारण है-वोटर तक सीधे पहुंच बनाना.

आज का मतदाता टीवी से ज्यादा मोबाइल पर समय बिताता है. YouTube वीडियो, Instagram Reels, Facebook पोस्ट और Google Search-यही उसकी रोजमर्रा की दुनिया है. ऐसे में राजनीतिक दल जानते हैं कि अगर वोटर का ध्यान जीतना है, तो उसकी स्क्रीन पर दिखाई देना जरूरी है.

2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान सिर्फ पहले चरण में ही 36 करोड़ रुपये से अधिक के डिजिटल विज्ञापन दिखाए गए. यह आंकड़ा बताता है कि अब चुनावी लड़ाई जमीन से ज्यादा डिजिटल दुनिया में लड़ी जा रही है.

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विज्ञापन खर्च होता है पूरी रणनीति के साथ

यह पैसा हर जगह एक साथ नहीं लगाया जाता. राजनीतिक दल इसे बेहद योजनाबद्ध तरीके से खर्च करते हैं.

भारत में चुनाव कई चरणों में होते हैं. इसलिए विज्ञापन रणनीति भी ‘फेज वाइज’ बनाई जाती है. जिस राज्य या क्षेत्र में जिस दिन मतदान होना होता है, वहां के मतदाताओं को सबसे ज्यादा विज्ञापन दिखाए जाते हैं.

उदाहरण के लिए, यदि मध्य प्रदेश या उत्तर प्रदेश के किसी क्षेत्र में अगले सप्ताह मतदान है, तो वहां YouTube और Google पर उसी क्षेत्र से जुड़े नेताओं, उम्मीदवारों और मुद्दों के विज्ञापन तेजी से बढ़ जाते हैं.

इसका उद्देश्य साफ होता है-मतदाता के मन में आखिरी समय तक अपनी मौजूदगी बनाए रखना.

‘Silent Period’ से पहले सबसे ज्यादा हमला

चुनाव प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण नियम होता है-‘Silent Period’ यानी मतदान से 48 घंटे पहले का समय.

इस दौरान प्रत्यक्ष चुनाव प्रचार पर रोक लग जाती है. इसलिए राजनीतिक दल मतदान से ठीक पहले अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं.

इसी समय सबसे अधिक वीडियो विज्ञापन, प्रचार संदेश और उम्मीदवारों के प्रचार अभियान चलाए जाते हैं. यह मनोवैज्ञानिक रणनीति होती है ताकि वोटर के दिमाग में आखिरी प्रभाव उसी पार्टी का रहे.

डिजिटल विज्ञापन इस काम के लिए सबसे प्रभावी माने जाते हैं क्योंकि वे तेजी से लाखों लोगों तक पहुंचते हैं और बार-बार दिखाई देते हैं.

सबसे ज्यादा खर्च कौन करता है?

जब बात डिजिटल चुनावी विज्ञापनों की आती है, तो सबसे बड़ा नाम भारतीय जनता पार्टी (BJP) का सामने आता है.

Google की Transparency Reports के अनुसार, BJP लंबे समय से डिजिटल राजनीतिक विज्ञापनों में सबसे आगे रही है. पार्टी ने YouTube, Google Search और Display Ads के माध्यम से व्यापक स्तर पर प्रचार किया है.

इसके बाद कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, DMK, TMC और अन्य क्षेत्रीय दल भी इस दौड़ में शामिल हैं. हालांकि उनकी रणनीति अलग होती है.

राष्ट्रीय दल पूरे देश को लक्ष्य बनाते हैं, जबकि क्षेत्रीय दल अपने प्रभाव वाले राज्यों और सीटों पर केंद्रित विज्ञापन चलाते हैं. उदाहरण के लिए, DMK का फोकस तमिलनाडु पर होता है, जबकि TMC पश्चिम बंगाल पर अधिक ध्यान देती है.

इससे स्पष्ट होता है कि डिजिटल विज्ञापन सिर्फ खर्च नहीं, बल्कि चुनावी गणित का हिस्सा हैं.

चुनाव से पहले और बाद में कैसे बदलते हैं विज्ञापन?

चुनावी विज्ञापनों की भाषा और विषय भी समय के साथ बदलते हैं.

चुनाव से पहले विज्ञापन आमतौर पर विकास, उपलब्धियों, सरकारी योजनाओं और नेतृत्व की छवि पर आधारित होते हैं. इनमें जनता को यह बताया जाता है कि सरकार ने क्या काम किए हैं.

लेकिन जैसे ही चुनाव की तारीखें घोषित होती हैं, विज्ञापन का स्वर पूरी तरह बदल जाता है.

अब फोकस होता है-

  • घोषणापत्र
  • वादे
  • विपक्ष की कमियां
  • उम्मीदवार की छवि
  • स्थानीय मुद्दे
  • भावनात्मक अपील

यानी विकास से ज्यादा सीधा राजनीतिक संदेश दिया जाता है.

यही कारण है कि चुनावी मौसम में विज्ञापन अधिक आक्रामक, भावनात्मक और प्रभावशाली दिखाई देते हैं.

माइक्रो-टारगेटिंग पर रोक और नई रणनीति

पहले राजनीतिक दल विशेष समूहों को बहुत सटीक तरीके से टारगेट कर सकते थे-जैसे उम्र, जाति, रुचि, क्षेत्र और व्यवहार के आधार पर.

इसे माइक्रो-टारगेटिंग कहा जाता था.

लेकिन Google और Meta जैसी कंपनियों ने राजनीतिक विज्ञापनों के लिए अपनी नीतियां सख्त कर दी हैं. अब अत्यधिक व्यक्तिगत स्तर पर टारगेटिंग की सीमाएं तय कर दी गई हैं.

इसका असर यह हुआ कि पार्टियां अब बड़े पैमाने पर वीडियो विज्ञापन और व्यापक पहुंच वाले अभियान चलाने लगी हैं.

अब रणनीति यह है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा जाए, बजाय केवल चुनिंदा समूहों को प्रभावित करने के.

यही वजह है कि YouTube वीडियो विज्ञापन चुनावी मौसम में सबसे ज्यादा दिखाई देते हैं.

क्या ये विज्ञापन वास्तव में वोट बदलते हैं?

यह सबसे बड़ा सवाल है.

क्या YouTube पर दिखा एक विज्ञापन किसी व्यक्ति का वोट बदल सकता है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि डिजिटल विज्ञापन सीधे वोट नहीं बदलते, लेकिन वे मतदाता की सोच, धारणा और प्राथमिकताओं को प्रभावित जरूर करते हैं.

अगर कोई संदेश बार-बार दिखे, कोई चेहरा लगातार नजर आए और कोई मुद्दा लगातार दोहराया जाए, तो उसका असर मनोवैज्ञानिक रूप से पड़ता है.

डिजिटल विज्ञापन खासतौर पर युवा वोटर्स, पहली बार मतदान करने वालों और शहरी मतदाताओं पर अधिक प्रभाव डालते हैं.

यानी ये विज्ञापन फैसला नहीं, लेकिन फैसले की दिशा जरूर तय कर सकते हैं.

लोकतंत्र की नई लड़ाई: स्क्रीन पर कब्जा

पहले कहा जाता था कि चुनाव सड़कों पर जीते जाते हैं. अब यह बात बदल चुकी है.

आज चुनाव मोबाइल स्क्रीन पर जीते जा रहे हैं.

रैलियां अब भी जरूरी हैं, लेकिन असली लड़ाई उस जगह हो रही है जहां वोटर सबसे ज्यादा समय बिताता है-उसका फोन.

राजनीतिक दल अब जानते हैं कि अगर स्क्रीन पर कब्जा हो गया, तो दिमाग तक पहुंच आसान हो जाती है.

इसीलिए करोड़ों रुपये Google Ads पर खर्च किए जा रहे हैं.

यह सिर्फ प्रचार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नई डिजिटल रणनीति है.

निष्कर्ष

अगली बार जब आप YouTube पर कोई चुनावी विज्ञापन देखें, Facebook पर किसी नेता का प्रमोशनल वीडियो आए या Google Search पर राजनीतिक संदेश दिखाई दे, तो समझ जाइए कि यह सिर्फ एक विज्ञापन नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये की सुनियोजित चुनावी रणनीति का हिस्सा है.

आपके एक वोट की कीमत सिर्फ लोकतांत्रिक नहीं, बल्कि डिजिटल बाजार में भी बहुत बड़ी है.

चुनाव अब सिर्फ मतदान केंद्र तक सीमित नहीं हैं-वे आपकी स्क्रीन, आपकी सोच और आपके निर्णय तक पहुंच चुके हैं.

अब सवाल यह है-क्या ये विज्ञापन आपके फैसले को प्रभावित करते हैं?

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