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CJP: CJP अभी पार्टी नहीं बनेगी, संस्थापक अभिजीत दीपके बोले- “पार्टी बनते ही आसानी से तोड़ दी जाएगी

CJP अभी पार्टी नहीं बनेगी! अभिजीत दीपके ने कहा- पहले जनता से संवाद, फिर तय होगा राजनीति का अगला कदम. सितंबर से शुरू होगा ‘क्या बोलती पब्लिक’ कार्यक्रम

CJP: CJP अभी पार्टी नहीं बनेगी, संस्थापक अभिजीत दीपके बोले- “पार्टी बनते ही आसानी से तोड़ दी जाएगी

राजनीति में बदलाव की बात अक्सर नई पार्टियों के गठन से शुरू होती है, लेकिन क्या हर राजनीतिक आंदोलन का अंतिम पड़ाव चुनावी राजनीति ही होता है? कॉकroach जनता पार्टी यानी CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके का जवाब फिलहाल ‘नहीं’ है.

जंतर-मंतर आंदोलन के बाद चर्चा में आए अभिजीत दीपके ने एक इंटरव्यू में स्पष्ट किया है कि CJP अभी राजनीतिक पार्टी नहीं बनेगी. उनका कहना है कि अगर संगठन जल्दबाजी में राजनीतिक दल का रूप लेता है तो उसे तोड़ना आसान हो सकता है. इसलिए फिलहाल संगठन का फोकस जनता के बीच जाकर मुद्दों को समझने और अपनी राजनीतिक दिशा तय करने पर है.

दीपके के मुताबिक, सितंबर से ‘क्या बोलती पब्लिक’ नाम का कार्यक्रम शुरू किया जाएगा. इसके जरिए अलग-अलग इलाकों के लोगों से सीधे बातचीत कर यह समझने की कोशिश होगी कि जनता की प्राथमिकताएं क्या हैं और किन मुद्दों को राजनीतिक एजेंडे में शामिल किया जाना चाहिए.

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CJP के सामने सबसे बड़ा सवाल- पार्टी बने या आंदोलन रहे?

कॉकroach जनता पार्टी की चर्चा ऐसे समय में हुई है जब देश में युवाओं और आम नागरिकों के बीच राजनीतिक व्यवस्था, रोजगार, शिक्षा, पेपर लीक, महंगाई और सरकारी नीतियों को लेकर बहस तेज है.

CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके का कहना है कि संगठन को अभी राजनीतिक पार्टी बनाने की जल्दबाजी नहीं है. उनके अनुसार, पहले यह समझना जरूरी है कि जनता वास्तव में क्या चाहती है और किन मुद्दों पर वह बदलाव देखना चाहती है.

यही वजह है कि संगठन फिलहाल चुनावी राजनीति में उतरने के बजाय जनता से संवाद को प्राथमिकता देने की बात कर रहा है.

दीपके का तर्क है कि किसी भी नए राजनीतिक संगठन के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि एक मजबूत और टिकाऊ संगठन खड़ा करना है. यदि संगठन बिना पर्याप्त तैयारी के पार्टी बन जाता है तो राजनीतिक दबाव और अंदरूनी खींचतान उसे कमजोर कर सकती है.

“पार्टी बनते ही आसानी से तोड़ दी जाएगी”

इंटरव्यू में अभिजीत दीपके ने CJP को तत्काल राजनीतिक पार्टी में बदलने को लेकर अपनी चिंता जाहिर की. उनका मानना है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में किसी नए संगठन के लिए केवल चुनाव लड़ना पर्याप्त नहीं है.

उनके मुताबिक, जब कोई आंदोलन या संगठन राजनीतिक दल बनता है तो उसके सामने कई तरह की चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं. संगठन के भीतर नेतृत्व, संसाधन, चुनावी रणनीति और राजनीतिक गठजोड़ जैसे सवाल सामने आने लगते हैं.

इसीलिए CJP फिलहाल खुद को एक व्यापक जनसंवाद और राजनीतिक पहल के तौर पर आगे बढ़ाना चाहती है.

हालांकि, यह भी साफ है कि भविष्य में संगठन की दिशा क्या होगी, यह जनता के साथ संवाद और परिस्थितियों के आधार पर तय की जा सकती है.

सितंबर से शुरू होगा ‘क्या बोलती पब्लिक’ कार्यक्रम

CJP की आगामी रणनीति में सबसे महत्वपूर्ण नाम ‘क्या बोलती पब्लिक’ कार्यक्रम का है.

अभिजीत दीपके के अनुसार, सितंबर से इस कार्यक्रम के जरिए लोगों के बीच जाने की योजना है. इसका उद्देश्य केवल भाषण देना नहीं, बल्कि जनता की बात सुनना और उसके आधार पर आगे की दिशा तय करना बताया गया है.

यानी CJP पहले यह जानना चाहती है कि आम नागरिक किन समस्याओं को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानता है.

रोजगार, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, महंगाई, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएं, सरकारी सेवाएं और स्थानीय स्तर के मुद्दे—इनमें से कौन-से मुद्दे लोगों की प्राथमिकता में हैं, इसे समझने की कोशिश की जाएगी.

यह तरीका पारंपरिक राजनीतिक दलों की चुनावी रणनीति से अलग दिखाई देता है, क्योंकि यहां संगठन पहले जनता की राय इकट्ठा करने और फिर एजेंडा तैयार करने की बात कर रहा है.

“फर्जीवाल पार्ट-2” के सवाल पर क्या बोले दीपके?

इंटरव्यू में अभिजीत दीपके से यह भी पूछा गया कि क्या CJP को ‘फर्जीवाल पार्ट-2’ कहा जा रहा है.

इस पर उन्होंने इस तुलना को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने आम आदमी पार्टी के साथ काम किया है, लेकिन वहां से अलग होने के बाद उन्होंने खुद को किसी पुराने मॉडल की कॉपी के तौर पर स्थापित नहीं किया.

उनका कहना था कि उन्होंने कुछ समय आम आदमी पार्टी के लिए काम किया था और कुछ लोगों ने उन्हें ‘आप’ से जोड़ने की कोशिश की. लेकिन CJP की अपनी अलग दिशा और सोच है.

इस जवाब से यह संकेत मिलता है कि संगठन अपने राजनीतिक मॉडल को किसी मौजूदा दल की सीधी नकल के रूप में पेश नहीं करना चाहता.

क्या CJP में दूसरे दलों के लोगों को जगह मिलेगी?

नए राजनीतिक संगठन के सामने एक बड़ा सवाल यह भी होता है कि उसकी टीम में कौन-कौन लोग शामिल होंगे.

दीपके से जब कोर कमेटी में दूसरे दलों से जुड़े लोगों को जगह देने के आरोपों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि कोर कमेटी में ऐसे लोगों को शामिल किया गया है जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में काम किया है.

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संगठन का उद्देश्य केवल राजनीतिक पहचान के आधार पर लोगों को जोड़ना नहीं, बल्कि काम और अनुभव के आधार पर टीम तैयार करना है.

यानी CJP की कोशिश ऐसे लोगों को साथ लाने की है जिनका अपने क्षेत्र में सामाजिक या सार्वजनिक काम से जुड़ाव रहा हो.

हालांकि, किसी भी नए संगठन के लिए यह चुनौती बनी रहेगी कि अलग-अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों के बीच विचारों की एकरूपता कैसे कायम रखी जाए.

चुनाव लड़ने से पहले जनता की राय क्यों?

आज के दौर में चुनाव लड़ना किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए आसान नहीं है. चुनाव के लिए मजबूत संगठन, संसाधन, कार्यकर्ता, उम्मीदवार, बूथ स्तर की तैयारी और लगातार जनसंपर्क की जरूरत होती है.

CJP का मॉडल फिलहाल इससे अलग दिखाई दे रहा है.

संगठन पहले जनता से बातचीत करके यह जानना चाहता है कि लोग किन मुद्दों को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हैं. इसके बाद उसी आधार पर एजेंडा तैयार करने की बात कही जा रही है.

यह प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में कई राजनीतिक आंदोलन बाद में राजनीतिक पार्टियों में बदले हैं. लेकिन हर आंदोलन का राजनीतिक दल बनना जरूरी नहीं है.

किसी संगठन का प्रभाव प्रेशर ग्रुप, जनआंदोलन या नागरिक मंच के रूप में भी हो सकता है.

आंदोलन से राजनीति तक का सफर कितना आसान?

CJP का उदाहरण भारतीय राजनीति के सामने एक पुराने लेकिन महत्वपूर्ण सवाल को फिर खड़ा करता है—क्या सामाजिक आंदोलन को राजनीतिक बदलाव में बदलने के लिए चुनावी राजनीति जरूरी है?

एक तरफ राजनीतिक पार्टी बनने से संगठन को चुनाव लड़ने और सत्ता में भागीदारी का अवसर मिलता है. दूसरी तरफ पार्टी बनते ही संगठन को चुनावी गणित, फंडिंग, उम्मीदवार चयन, गठबंधन और संगठनात्मक अनुशासन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

यही कारण है कि अभिजीत दीपके फिलहाल जल्दबाजी से बचने की बात कर रहे हैं.

उनके मुताबिक, पहले जनता के बीच जाकर मुद्दों को समझना और फिर आगे की रणनीति तय करना ज्यादा जरूरी है.

2024 के बाद बदली राजनीति और वोटर की भूमिका

इंटरव्यू में चुनाव प्रक्रिया और ईवीएम से जुड़े सवालों पर भी चर्चा हुई. दीपके ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर जनता के बीच मौजूद सवालों और चिंताओं पर चर्चा जरूरी है.

यहां एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आज का मतदाता केवल चुनाव के समय सक्रिय नहीं है. सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और जनआंदोलनों ने नागरिकों को अपनी बात रखने के नए माध्यम दिए हैं.

ऐसे माहौल में नए संगठन अगर राजनीति में जगह बनाना चाहते हैं तो उन्हें केवल चुनावी भाषणों के बजाय लगातार जनता के बीच रहना होगा.

यही CJP के सामने भी सबसे बड़ी परीक्षा होगी.

मीडिया की भूमिका पर भी उठे सवाल

इंटरव्यू के दौरान मीडिया की भूमिका को लेकर भी सवाल किया गया. दीपके ने मीडिया के निष्पक्ष रहने की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है.

हालांकि, मीडिया और राजनीतिक संगठनों के बीच संबंध हमेशा संवेदनशील रहे हैं. किसी भी नए राजनीतिक आंदोलन के लिए मीडिया कवरेज उसे जनता तक पहुंचाने में मदद कर सकती है, लेकिन लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखने के लिए संगठन को अपने काम और जमीनी मौजूदगी पर निर्भर रहना पड़ता है.

CJP के सामने अब असली चुनौती क्या है?

CJP के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती केवल यह नहीं है कि वह राजनीतिक पार्टी बनेगी या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या वह जनता के बीच एक भरोसेमंद विकल्प की पहचान बना पाएगी?

सितंबर से शुरू होने वाला ‘क्या बोलती पब्लिक’ कार्यक्रम इस दिशा में पहला बड़ा कदम हो सकता है.

यदि संगठन वास्तव में बड़ी संख्या में लोगों से संवाद करता है और उनकी समस्याओं को एक स्पष्ट एजेंडे में बदल पाता है, तो उसे एक नई राजनीतिक-सामाजिक ताकत के रूप में देखा जा सकता है.

लेकिन इसके लिए संगठन को कई सवालों के जवाब भी देने होंगे.

उसका स्पष्ट वैचारिक आधार क्या होगा? संगठन का आर्थिक मॉडल क्या होगा? नेतृत्व किस तरह काम करेगा? निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होगी? चुनाव लड़ने की स्थिति में उम्मीदवारों का चयन कैसे होगा? और सबसे अहम—जनता के साथ किए गए वादों को जमीन पर उतारने की रणनीति क्या होगी?

इन सवालों के जवाब ही CJP के भविष्य की दिशा तय करेंगे.

क्या CJP भविष्य में पार्टी बन सकती है?

अभी CJP की ओर से राजनीतिक पार्टी बनने की जल्दबाजी से इनकार किया गया है. लेकिन राजनीति में परिस्थितियां तेजी से बदलती हैं.

यदि जनता के बीच संगठन का समर्थन बढ़ता है, उसका जनाधार मजबूत होता है और ‘क्या बोलती पब्लिक’ जैसे कार्यक्रमों से एक स्पष्ट एजेंडा सामने आता है, तो भविष्य में राजनीतिक पार्टी बनने की संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती.

फिलहाल अभिजीत दीपके का संदेश साफ है—पहले जनता से बात होगी, फिर एजेंडा बनेगा और उसके बाद ही राजनीति की अगली दिशा तय होगी.

यानी CJP की कहानी अभी चुनावी मैदान से ज्यादा जनता के बीच शुरू होने जा रही है.

अब देखना यह होगा कि सितंबर से शुरू होने वाला जनसंवाद इस संगठन को किस दिशा में ले जाता है—एक राजनीतिक पार्टी की ओर, एक बड़े जनआंदोलन की ओर या फिर एक ऐसे दबाव समूह की ओर जो मौजूदा राजनीति और नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करे.

फिलहाल इतना तय है कि CJP ने चुनावी राजनीति में उतरने से पहले जनता की नब्ज टटोलने का रास्ता चुना है. आने वाले महीनों में इसी जनसंवाद से संगठन की वास्तविक ताकत और भविष्य की राजनीतिक दिशा सामने आएगी.