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Toggleमध्य प्रदेश: वेटिंग लिस्ट में गड़बड़ी के आरोप, गरीब मरीजों के अधिकार पर सवाल
किसी मरीज के लिए किडनी ट्रांसप्लांट सिर्फ एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत के बीच की उम्मीद होती है. महीनों या वर्षों तक डायलिसिस कराने वाला मरीज इस इंतजार में रहता है कि कब उसे उपयुक्त किडनी मिलेगी और कब उसकी जिंदगी फिर सामान्य हो सकेगी.
लेकिन अगर इसी इंतजार की सूची में गड़बड़ी होने लगे, किसी मरीज को कथित तौर पर पैसे के आधार पर प्राथमिकता मिलने लगे या रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी और वास्तविक स्थिति में अंतर दिखाई दे, तो सवाल सिर्फ एक अस्पताल या एक मरीज का नहीं रह जाता. सवाल पूरी ट्रांसप्लांट व्यवस्था की विश्वसनीयता पर उठता है.
मध्य प्रदेश में किडनी ट्रांसप्लांट से जुड़ी एक पड़ताल ने ऐसे ही गंभीर सवाल सामने रखे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मरीजों के रिकॉर्ड, वेटिंग लिस्ट और ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं. रिपोर्ट में ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया है, जहां मरीजों को किडनी लेने से इनकार करने के बावजूद वेटिंग लिस्ट में शामिल किया गया, एक मरीज से कथित तौर पर कई लाख रुपये रखने को कहा गया और एक अन्य मामले में रिकॉर्ड में ट्रांसप्लांट होने की बात सामने आने के बावजूद परिवार के मुताबिक मरीज को अब भी इंतजार करना पड़ रहा है.
इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और संबंधित संस्थानों का आधिकारिक पक्ष सामने आना बेहद जरूरी है. लेकिन इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या ऑर्गन ट्रांसप्लांट जैसी संवेदनशील व्यवस्था में गरीब और कमजोर मरीजों की पहुंच वास्तव में बराबर है?
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आखिर वेटिंग लिस्ट इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
किडनी ट्रांसप्लांट में वेटिंग लिस्ट का मतलब सिर्फ नामों की एक सूची नहीं है. यह उन मरीजों का रिकॉर्ड है जिन्हें मेडिकल जांच के बाद प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त माना गया है.
राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन यानी NOTTO के अनुसार, किसी मरीज को ट्रांसप्लांट वेटिंग लिस्ट में शामिल करने का निर्णय चिकित्सकीय मूल्यांकन के आधार पर होता है. किडनी के मामले में नियमित डायलिसिस पर बिताया गया समय भी महत्वपूर्ण मानदंडों में शामिल है. इसके अलावा ब्लड ग्रुप, मेडिकल स्थिति, उपलब्ध अंग और अन्य चिकित्सकीय मानदंडों के आधार पर प्राथमिकता तय होती है.
यानी सामान्य तौर पर यह व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें मरीज की आर्थिक स्थिति, पहचान या प्रभाव उसके अधिकार को निर्धारित न करे.
NOTTO की गाइडलाइन स्पष्ट करती है कि अंग आवंटन पूर्व निर्धारित चिकित्सकीय मानदंडों के आधार पर होना चाहिए. किसी व्यक्ति की संपत्ति या प्रभाव के आधार पर वेटिंग लिस्ट में छलांग लगाना नियमों के अनुरूप नहीं है.
यही वजह है कि वेटिंग लिस्ट में कथित हेरफेर का आरोप बेहद गंभीर हो जाता है.
केस-1: 17 मरीजों के रिकॉर्ड पर सवाल
रिपोर्ट में एक ऐसे मामले का जिक्र है जिसमें एक साथ 17 मरीजों के रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठे. रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मरीजों के रिकॉर्ड में यह दर्ज किया गया कि उन्होंने किडनी लेने से इनकार किया था.
लेकिन सवाल यह है कि अगर किसी मरीज ने किडनी लेने से इनकार कर दिया था, तो उसका नाम वेटिंग लिस्ट में क्यों मौजूद रहा?
रिपोर्ट के मुताबिक, एक अस्पताल के रिकॉर्ड और मरीजों की स्थिति में भी अंतर सामने आया। कुछ मरीजों के स्कोर में बदलाव का उल्लेख किया गया है. ट्रांसप्लांट जैसी प्रक्रिया में मरीज का स्कोर और उसकी वेटिंग स्थिति महत्वपूर्ण होती है, इसलिए ऐसे किसी भी बदलाव की स्पष्ट वजह और दस्तावेजी रिकॉर्ड होना जरूरी है.
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि—
क्या वेटिंग लिस्ट में शामिल प्रत्येक मरीज का रिकॉर्ड समय-समय पर स्वतंत्र रूप से ऑडिट होता है?
और अगर रिकॉर्ड में कोई बदलाव किया जाता है, तो क्या उसकी डिजिटल हिस्ट्री सुरक्षित रहती है?
केस-2: कथित तौर पर 4-5 लाख रुपये रखने की मांग
पड़ताल में सामने आए दूसरे मामले में वेटिंग लिस्ट में नंबर-1 बताए गए एक मरीज के परिजन से कथित तौर पर 4 से 5 लाख रुपये रखने को कहा गया.
अगर यह आरोप जांच में सही पाया जाता है, तो यह बेहद गंभीर मामला होगा. क्योंकि ऑर्गन ट्रांसप्लांट में किसी मरीज को आर्थिक क्षमता के आधार पर प्राथमिकता देना पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है.
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मरीज के परिजन ने इस कथित मांग को लेकर सवाल उठाए. इसके बाद अस्पताल की प्रक्रिया और मरीज की वेटिंग स्थिति को लेकर भी सवाल सामने आए.
हालांकि, ऐसे आरोपों को अंतिम सत्य मानने से पहले संबंधित अस्पताल, ट्रांसप्लांट प्राधिकरण और जांच एजेंसियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है.
केस-3: रिकॉर्ड में ट्रांसप्लांट, मरीज फिर भी इंतजार में?
सबसे चौंकाने वाला सवाल उस मामले से जुड़ा है जिसमें रिपोर्ट के अनुसार रिकॉर्ड में मरीज का किडनी ट्रांसप्लांट हो चुका बताया गया, जबकि परिवार का कहना है कि मरीज को आज भी ट्रांसप्लांट का इंतजार है.
अगर रिकॉर्ड और परिवार के बयान में ऐसा अंतर है, तो इसकी जांच बेहद जरूरी है.
क्योंकि ऑर्गन ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया में मरीज की पहचान, अस्पताल रिकॉर्ड, ट्रांसप्लांट रजिस्ट्रेशन, अंग आवंटन और सर्जरी से जुड़े दस्तावेज महत्वपूर्ण होते हैं.
ऐसे में सवाल उठता है—
क्या किसी मरीज के नाम पर ट्रांसप्लांट रिकॉर्ड में दर्ज हो सकता है, जबकि वास्तविकता कुछ और हो?
अगर ऐसा हुआ है, तो यह केवल रिकॉर्ड की गलती नहीं मानी जा सकती. इसकी प्रकृति और जिम्मेदारी की जांच जरूरी होगी.
वेटिंग लिस्ट में अमीर और गरीब का फर्क?
ऑर्गन ट्रांसप्लांट की सबसे बड़ी चुनौती ही यह है कि जरूरतमंद मरीजों की संख्या उपलब्ध अंगों से बहुत अधिक है.
NOTTO के अनुसार, देश में अंगों की मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है. इसी वजह से मरीजों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ सकता है. किडनी के मामले में डायलिसिस पर बिताया गया समय, मेडिकल स्थिति और अन्य निर्धारित मानदंड प्राथमिकता तय करने में भूमिका निभाते हैं.
ऐसी स्थिति में वेटिंग लिस्ट का हर नंबर किसी मरीज के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है.
मान लीजिए दो मरीज किडनी का इंतजार कर रहे हैं. एक गरीब परिवार से है, जो कई वर्षों से डायलिसिस का खर्च उठा रहा है। दूसरा आर्थिक रूप से मजबूत है.
अगर दोनों के लिए नियम समान हैं, तो पैसा किसी मरीज को नियमों से ऊपर नहीं कर सकता.
लेकिन यदि पैसे के बदले किसी मरीज की प्राथमिकता बदलने की कोशिश होती है, तो यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं होगा, बल्कि उस मरीज के अधिकारों पर भी सीधा असर पड़ेगा जो नियमों के मुताबिक अपनी बारी का इंतजार कर रहा है.
भारत में ऑर्गन आवंटन कैसे होता है?
भारत में अंग प्रत्यारोपण की व्यवस्था कानून और निर्धारित दिशानिर्देशों के तहत संचालित होती है.
NOTTO के अनुसार, उपलब्ध अंग का मिलान कई चिकित्सकीय मानदंडों के आधार पर किया जाता है. इनमें ब्लड ग्रुप, मेडिकल स्थिति, अंग की उपलब्धता और मरीज की प्राथमिकता जैसे कारक शामिल हो सकते हैं. किडनी के लिए टिश्यू मैचिंग भी महत्वपूर्ण है.
NOTTO के ट्रांसप्लांट मैनुअल में किडनी आवंटन के लिए डायलिसिस पर बिताया समय, कुछ विशेष चिकित्सकीय परिस्थितियां और अन्य निर्धारित मानदंडों के आधार पर स्कोरिंग व्यवस्था का उल्लेख है.
इसलिए किसी मरीज को केवल यह कहकर आगे नहीं किया जा सकता कि उसके पास ज्यादा पैसा है या वह प्रभावशाली है.
यही कारण है कि वेटिंग लिस्ट की पारदर्शिता बेहद जरूरी है.
सिस्टम में पारदर्शिता कैसे बढ़ सकती है?
ऑर्गन ट्रांसप्लांट जैसी व्यवस्था में सिर्फ नियम बनाना पर्याप्त नहीं है. उन नियमों का डिजिटल और स्वतंत्र तरीके से पालन सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है.
इसके लिए कुछ सवाल बेहद महत्वपूर्ण हैं—
- वेटिंग लिस्ट का डेटा किसके पास है?
- मरीज की रैंक में बदलाव कौन कर सकता है?
- बदलाव होने पर उसका डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है या नहीं?
- मरीज और उसके परिवार को अपनी वेटिंग स्थिति देखने की सुविधा कितनी पारदर्शी है?
- ऑर्गन आवंटन के बाद उसका पूरा ट्रेल रिकॉर्ड में दर्ज होता है या नहीं?
- अस्पतालों के रिकॉर्ड और राष्ट्रीय पोर्टल के डेटा का मिलान कितनी नियमितता से होता है?
- शिकायत मिलने पर जांच की जिम्मेदारी किस एजेंसी की है?
इन सवालों के जवाब व्यवस्था को अधिक भरोसेमंद बना सकते हैं.
हाल में राष्ट्रीय स्तर पर रियल-टाइम ऑर्गन ट्रांसप्लांट पोर्टल की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं, जिसका उद्देश्य अलग-अलग स्तरों पर बिखरी जानकारी को एकीकृत कर ऑर्गन आवंटन को ज्यादा पारदर्शी बनाना है.
गरीब मरीजों के लिए यह सवाल और बड़ा क्यों है?
किडनी फेलियर से जूझ रहे मरीज के लिए डायलिसिस लंबे समय तक चलने वाली और महंगी प्रक्रिया हो सकती है. कई परिवार इलाज का खर्च उठाने के लिए अपनी बचत तक खत्म कर देते हैं.
ऐसे परिवार के सामने अगर ट्रांसप्लांट के लिए कथित तौर पर लाखों रुपये की मांग की जाए, तो वह परिवार क्या करेगा?
यही वह बिंदु है जहां स्वास्थ्य व्यवस्था और सामाजिक न्याय एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं.
किसी गरीब मरीज के पास पैसा कम हो सकता है, लेकिन उसका इलाज पाने का अधिकार कम नहीं होना चाहिए.
ऑर्गन ट्रांसप्लांट का सिस्टम इस सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए कि अंग किसी की संपत्ति नहीं, बल्कि जीवन बचाने वाला संसाधन है.
किडनी की खरीद-फरोख्त कानूनन अपराध है
भारत में मानव अंगों की खरीद-बिक्री पर कानूनन रोक है. मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण से जुड़े कानूनों का उद्देश्य अंगों के अवैध व्यापार और शोषण को रोकना है. NOTTO की आधिकारिक जानकारी भी स्पष्ट करती है कि मानव अंगों को खरीदना या बेचना अवैध है.
इसलिए यदि किसी मरीज से अंग प्राप्त करने या वेटिंग लिस्ट में अनुचित लाभ देने के नाम पर पैसे मांगे जाने का आरोप सामने आता है, तो इसकी गंभीरता से जांच होना जरूरी है.
जांच में किन पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए?
यदि मध्य प्रदेश में सामने आए आरोपों की औपचारिक जांच होती है, तो जांच एजेंसियों को केवल मरीजों के बयान तक सीमित नहीं रहना चाहिए.
उन्हें अस्पताल की डिजिटल वेटिंग लिस्ट, मरीजों के रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड, मेडिकल बोर्ड के दस्तावेज, ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर की एंट्री, ऑर्गन अलॉटमेंट रिकॉर्ड और संबंधित राष्ट्रीय या राज्य पोर्टल के डेटा का मिलान करना चाहिए.
इसके अलावा जिस मरीज का स्कोर बदला गया, उसकी फाइल में बदलाव की तारीख और अधिकृत व्यक्ति की जानकारी भी देखी जानी चाहिए.
इसी तरह कथित पैसों की मांग के मामले में बैंकिंग लेनदेन, कॉल रिकॉर्ड, संदेश और संबंधित व्यक्तियों के बयान जांच का हिस्सा हो सकते हैं—बशर्ते कानून के तहत ऐसे साक्ष्य उपलब्ध हों.
सवाल सिर्फ एक अस्पताल का नहीं, पूरी व्यवस्था के भरोसे का है
किडनी ट्रांसप्लांट से जुड़े आरोपों की सच्चाई जांच के बाद ही सामने आएगी. लेकिन इस मामले ने एक जरूरी बहस जरूर शुरू कर दी है.
जब किसी मरीज का जीवन वेटिंग लिस्ट के एक नंबर पर टिका हो, तब उस नंबर के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ की आशंका भी गंभीर है.
जरूरत इस बात की है कि वेटिंग लिस्ट पारदर्शी हो, ऑर्गन आवंटन की प्रक्रिया ऑडिटेबल हो और मरीजों को अपने रिकॉर्ड की जानकारी आसानी से मिल सके.
किसी मरीज की आर्थिक स्थिति उसके इलाज की प्राथमिकता तय न करे—यही एक न्यायपूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था की बुनियादी शर्त है.
मध्य प्रदेश में सामने आए किडनी ट्रांसप्लांट से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि वास्तव में सिस्टम में गड़बड़ी हुई या रिकॉर्ड और प्रक्रिया को लेकर कोई अन्य वजह थी.
लेकिन एक बात तय है—जिस व्यवस्था का मकसद जिंदगी बचाना है, उसमें पारदर्शिता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए.
निष्कर्ष
ऑर्गन ट्रांसप्लांट चिकित्सा विज्ञान की बड़ी उपलब्धि है. भारत में हर साल हजारों मरीजों को इससे नई जिंदगी मिल रही है. लेकिन इसके साथ यह जिम्मेदारी भी आती है कि अंगों का आवंटन निष्पक्ष, पारदर्शी और नियमों के मुताबिक हो.
मध्य प्रदेश में सामने आए कथित किडनी घोटाले के आरोप इसी व्यवस्था की कमजोरियों पर सवाल उठा रहे हैं. आरोप सही हैं या नहीं, इसका फैसला जांच करेगी. लेकिन मरीजों और उनके परिवारों का भरोसा बनाए रखने के लिए हर ट्रांसप्लांट रिकॉर्ड, हर वेटिंग लिस्ट और हर ऑर्गन आवंटन का जवाबदेह होना जरूरी है.
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