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Toggleबेरोजगारी: 8.7 करोड़ युवा शिक्षा और रोजगार से बाहर, नीति आयोग की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है. यही युवा आबादी भारत के आर्थिक विकास और 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की महत्वाकांक्षा की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है. लेकिन इसी युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा, रोजगार और कौशल प्रशिक्षण की मुख्यधारा से बाहर है.
नीति आयोग की अगस्त 2026 में जारी ‘Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047’ रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 29 वर्ष की उम्र के करीब 8.7 करोड़ युवा NEET श्रेणी में आते हैं. यहां NEET का मतलब किसी मेडिकल प्रवेश परीक्षा से नहीं, बल्कि Not in Education, Employment or Training से है—यानी ऐसे युवा जो न पढ़ाई कर रहे हैं, न काम कर रहे हैं और न ही किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा हैं. यह अनुमान 2021 के 78वें दौर के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों पर आधारित है.
यही वह बिंदु है जहां इस खबर को सिर्फ ‘बेरोजगारी’ की खबर मानना अधूरा होगा.
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यह सिर्फ नौकरी न मिलने की कहानी नहीं
पहली नजर में 8.7 करोड़ का आंकड़ा बेरोजगारी से जुड़ा दिखाई देता है, लेकिन नीति आयोग की रिपोर्ट तस्वीर को इससे कहीं ज्यादा जटिल बताती है.
NEET श्रेणी में बेरोजगार युवा शामिल हैं, लेकिन इसमें ऐसे लोग भी हैं जो किसी कारण से शिक्षा, नौकरी या प्रशिक्षण से बाहर हो चुके हैं. रिपोर्ट के अनुसार इस समूह का करीब 88 प्रतिशत हिस्सा घरेलू जिम्मेदारियों में लगा हुआ है.
इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि युवाओं को नौकरी क्यों नहीं मिल रही.
बड़ा सवाल यह है कि कितने युवा ऐसी परिस्थितियों में पहुंच रहे हैं जहां वे शिक्षा से रोजगार तक का सामान्य रास्ता ही पूरा नहीं कर पा रहे हैं?
घरेलू जिम्मेदारियां भी बड़ी बाधा
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू घरेलू जिम्मेदारियों से जुड़ा है. खासकर महिलाओं के मामले में शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के बीच आने वाली बाधाएं केवल आर्थिक नहीं हैं.
परिवार की जिम्मेदारी, बच्चों की देखभाल, आने-जाने की सुविधा, सुरक्षा, प्रशिक्षण केंद्र की दूरी और पूरे दिन चलने वाले कोर्स जैसी परिस्थितियां कई लोगों के लिए कौशल प्रशिक्षण तक पहुंच को मुश्किल बना देती हैं.
यानी किसी युवा के लिए प्रशिक्षण उपलब्ध होना और उस प्रशिक्षण तक वास्तव में पहुंच पाना—दो अलग-अलग बातें हैं.
इसी वजह से नीति आयोग ने ज्यादा लचीले, स्थानीय और किफायती प्रशिक्षण मॉडल की जरूरत पर जोर दिया है. रिपोर्ट में महिलाओं के लिए पार्ट-टाइम और कम अवधि के प्रशिक्षण विकल्पों जैसी जरूरतों को भी रेखांकित किया गया है.
डिग्री है, लेकिन नौकरी अलग क्षेत्र में
भारत की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक और आंकड़ा इस पूरी तस्वीर को और गंभीर बनाता है.
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 8.25 प्रतिशत ग्रेजुएट ही ऐसी नौकरियों में काम कर रहे हैं जो उनकी शैक्षणिक योग्यता से मेल खाती हैं. यह आंकड़ा बताता है कि समस्या केवल नौकरी की संख्या की नहीं, बल्कि डिग्री और नौकरी के बीच तालमेल की भी है.
यानी कोई युवा वर्षों तक पढ़ाई करके डिग्री हासिल करता है, लेकिन जब नौकरी के बाजार में पहुंचता है तो उसकी पढ़ाई और उद्योग की जरूरतों के बीच अंतर सामने आ जाता है.
यही अंतर आगे चलकर कई युवाओं को अतिरिक्त कोर्स, प्रतियोगी परीक्षाओं या दूसरे क्षेत्रों की नौकरियों की ओर धकेलता है.
पढ़ाई और रोजगार के बीच कहां टूट रही है कड़ी?
आज रोजगार बाजार तेजी से बदल रहा है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन, ग्रीन टेक्नोलॉजी और बदलती वैश्विक सप्लाई चेन ने कंपनियों की जरूरतों को भी बदला है.
नीति आयोग की रिपोर्ट भी मानती है कि भविष्य के रोजगार के लिए केवल पारंपरिक डिग्री पर्याप्त नहीं होगी. शिक्षा के साथ व्यावहारिक कौशल, उद्योग का अनुभव और लगातार नई स्किल सीखने की क्षमता जरूरी होगी.
समस्या यह है कि भारत की बड़ी संख्या में शिक्षा संस्थाओं में व्यावसायिक शिक्षा अभी भी सीमित है. रिपोर्ट के मुताबिक माध्यमिक स्तर के 12 में से एक से भी कम स्कूलों में व्यावसायिक विषय उपलब्ध हैं.
ऐसे में छात्र लंबे समय तक किताबी शिक्षा लेते हैं, लेकिन उन्हें यह पता नहीं चल पाता कि वास्तविक नौकरी बाजार उनसे किस तरह की क्षमता की मांग कर रहा है.
नीति आयोग का समाधान क्या है?
रिपोर्ट में केवल समस्या का उल्लेख नहीं किया गया है, बल्कि स्किलिंग व्यवस्था को बदलने के लिए कई सुझाव भी दिए गए हैं.
1. स्कूल से ही स्किलिंग
नीति आयोग का सुझाव है कि कौशल विकास की शुरुआत स्कूल स्तर से होनी चाहिए. कक्षा 6 से विद्यार्थियों को सामान्य रोजगार और उद्यमिता से जुड़े कौशल सिखाने तथा कक्षा 9 से संरचित व्यावसायिक विकल्प देने की दिशा में काम करने की बात कही गई है.
इसका उद्देश्य यह है कि छात्र डिग्री पूरी करने के बाद पहली बार रोजगार बाजार को न समझे, बल्कि स्कूल के दौरान ही अलग-अलग करियर विकल्पों से परिचित हो.
2. कॉलेज और उद्योग के बीच मजबूत संबंध
रिपोर्ट उच्च शिक्षा को उद्योग से जोड़ने पर भी जोर देती है.
इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, वर्क-इंटीग्रेटेड डिग्री और उद्योग आधारित प्रशिक्षण को बढ़ाने का सुझाव दिया गया है. इससे छात्रों को पढ़ाई के साथ वास्तविक कार्यस्थल का अनुभव मिल सकता है.
3. अप्रेंटिसशिप को मुख्य रास्ता बनाना
अप्रेंटिसशिप को केवल प्रशिक्षण की औपचारिकता के बजाय रोजगार की ओर जाने वाले महत्वपूर्ण रास्ते के रूप में विकसित करने की जरूरत बताई गई है.
इससे युवा काम करते हुए सीख सकता है और उद्योग को भी प्रशिक्षित मानव संसाधन मिल सकता है.
4. स्किल पासपोर्ट और डिजिटल रिकॉर्ड
रिपोर्ट में Digital Lifelong Learning Accounts या Skill Passports की अवधारणा भी सामने रखी गई है.
इसका मकसद यह है कि व्यक्ति ने स्कूल, कॉलेज, ट्रेनिंग सेंटर या नौकरी के दौरान कौन-कौन से कौशल हासिल किए हैं, उसका डिजिटल रिकॉर्ड मौजूद रहे. इससे भविष्य में नौकरी या नए प्रशिक्षण के दौरान उसकी वास्तविक क्षमता को पहचानना आसान हो सकता है.
5. स्किल के आधार पर भर्ती
रिपोर्ट में केवल डिग्री आधारित नियुक्ति के बजाय skills-first hiring को बढ़ावा देने की बात कही गई है.
इसका मतलब है कि कंपनियां उम्मीदवार के पास मौजूद वास्तविक कौशल को भी उतना ही महत्व दें, जितना उसकी औपचारिक डिग्री को.
सरकार ने अब तक क्या किया?
यह कहना भी सही नहीं होगा कि भारत में कौशल विकास के लिए कोई प्रयास नहीं हुए हैं.
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2014-15 से अब तक 7.67 करोड़ से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है. वित्त वर्ष 2025-26 के केंद्रीय बजट में विभिन्न मंत्रालयों के माध्यम से स्किलिंग से संबंधित खर्च के लिए करीब 34,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था.
लेकिन रिपोर्ट खुद मानती है कि प्रशिक्षण की संख्या बढ़ने के बावजूद उसके परिणाम समान नहीं रहे हैं.
यानी असली सवाल यह नहीं है कि कितने लोगों को ट्रेनिंग दी गई?
सवाल यह है कि ट्रेनिंग के बाद कितने लोगों को स्थायी रोजगार, बेहतर आय या सफल स्वरोजगार मिला?
8.7 करोड़ युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
इस पूरे मुद्दे को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है.
पहला—शिक्षा।
क्या शिक्षा युवाओं को भविष्य की नौकरियों के लिए तैयार कर रही है?
दूसरा—कौशल।
क्या युवाओं के पास उद्योग की जरूरत के मुताबिक व्यावहारिक कौशल है?
तीसरा—रोजगार।
क्या प्रशिक्षण और कौशल वास्तव में सम्मानजनक और टिकाऊ रोजगार में बदल रहे हैं?
अगर इन तीनों के बीच कड़ी कमजोर रहती है तो केवल डिग्री बढ़ाने या प्रशिक्षण केंद्रों की संख्या बढ़ाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा.
युवाओं के लिए इसका क्या मतलब है?
आज के युवा के लिए सिर्फ एक डिग्री पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है. बदलती अर्थव्यवस्था में लगातार सीखना, डिजिटल कौशल विकसित करना, व्यावहारिक अनुभव हासिल करना और उद्योग की जरूरत समझना महत्वपूर्ण होता जा रहा है.
सरकारी नौकरी की तैयारी करना गलत नहीं है, लेकिन हर युवा के लिए रोजगार का एकमात्र रास्ता सरकारी नौकरी नहीं हो सकता.
अप्रेंटिसशिप, निजी क्षेत्र, स्वरोजगार, डिजिटल सेवाएं, तकनीकी कौशल और स्थानीय उद्योगों से जुड़े अवसर भी रोजगार के महत्वपूर्ण रास्ते बन सकते हैं.
सबसे बड़ा सवाल: भारत अपनी युवा आबादी को अवसर कैसे देगा?
भारत के पास दुनिया की बड़ी युवा आबादी है. यह जनसांख्यिकीय लाभ तभी आर्थिक ताकत बनेगा, जब युवा शिक्षा से कौशल और कौशल से रोजगार की ओर आसानी से बढ़ सकें.
अगर करोड़ों युवा इस प्रक्रिया से बाहर रह जाते हैं, तो यह सिर्फ उनके व्यक्तिगत करियर की समस्या नहीं है. इसका असर परिवार की आय, उत्पादकता, खपत, सामाजिक गतिशीलता और देश की आर्थिक क्षमता पर भी पड़ सकता है.
नीति आयोग की रिपोर्ट इसी वजह से स्किलिंग को किसी एक मंत्रालय या योजना तक सीमित रखने के बजाय स्कूल, कॉलेज, उद्योग, सरकार और प्रशिक्षण संस्थानों को जोड़ने वाली पूरी व्यवस्था के रूप में देखने की बात करती है.
निष्कर्ष: 8.7 करोड़ का आंकड़ा चेतावनी भी है और मौका भी
8.7 करोड़ युवा सिर्फ एक संख्या नहीं है. यह भारत के शिक्षा और रोजगार तंत्र के बीच मौजूद उस अंतर की ओर इशारा करता है, जिसे भरना आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगा.
हालांकि एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—यह आंकड़ा 2021 के सर्वे डेटा पर आधारित अनुमान है, इसलिए इसे अगस्त 2026 की वास्तविक वर्तमान संख्या के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए. नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में स्वयं डेटा और शोध पद्धति की सीमाओं को लेकर डिस्क्लेमर दिया है.
फिर भी रिपोर्ट का संदेश बेहद स्पष्ट है.
भारत को केवल ज्यादा डिग्रीधारी युवा नहीं चाहिए. उसे ऐसे युवा चाहिए जिनके पास सीखने, काम करने और बदलती अर्थव्यवस्था के साथ खुद को ढालने की क्षमता हो.
अगर स्कूल से कौशल, कॉलेज से उद्योग, प्रशिक्षण से रोजगार और रोजगार से लगातार सीखने की व्यवस्था जुड़ जाती है, तो यही युवा आबादी भारत की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है.
लेकिन अगर शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई बढ़ती रही, तो 8.7 करोड़ का यह आंकड़ा आने वाले वर्षों में सिर्फ एक रिपोर्ट का आंकड़ा नहीं रहेगा—यह भारत के विकास मॉडल के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल बन जाएगा.
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