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साइबर क्राइम: डिजिटल अरेस्ट का जाल, नकली जज और CBI के नाम पर 63.52 लाख की ठगी

नकली CBI, फर्जी कोर्ट और डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 63.52 लाख की ठगी! देवास पुलिस ने 12 आरोपियों को दबोचा।

साइबर क्राइम: डिजिटल अरेस्ट का जाल, नकली जज और CBI के नाम पर 63.52 लाख की ठगी

साइबर ठगी का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें ठगों ने कानून और जांच एजेंसियों का डर दिखाकर एक सेवानिवृत्त व्यक्ति को अपने जाल में फंसा लिया. आरोपियों ने खुद को CBI की मुंबई क्राइम ब्रांच और टेलीकॉम विभाग का अधिकारी बताया. इसके बाद पीड़ित को मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में फंसाने की धमकी दी गई और वीडियो कॉल के जरिए बाकायदा नकली कोर्ट और फर्जी जज का पूरा सेटअप तैयार किया गया.

आरोपियों ने पीड़ित को करीब 9 दिन तक डिजिटल अरेस्ट जैसी स्थिति में रखा और बैंक खातों के सत्यापन के नाम पर अलग-अलग खातों में कुल 63.52 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए. देवास पुलिस ने 127 दिन की जांच के बाद इस गिरोह के 12 सदस्यों को गिरफ्तार किया है. पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से 54.84 लाख रुपये नकद, चेकबुक, एटीएम कार्ड और मोबाइल फोन समेत अन्य सामान बरामद किया है.

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नकली अधिकारी बनकर शुरू किया ठगी का खेल

पुलिस के अनुसार, ठगों ने बेहद सुनियोजित तरीके से पीड़ित को निशाना बनाया. पहले उसे फोन कर बताया गया कि उसका नाम एक कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सामने आया है. फोन करने वाले ने खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताया और कार्रवाई का डर दिखाया.

मामला यहीं नहीं रुका. ठगों ने पीड़ित को विश्वास दिलाने के लिए वीडियो कॉल का सहारा लिया. वीडियो कॉल के दौरान ऐसा माहौल बनाया गया, जैसे वह किसी वास्तविक जांच और न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हो.

पीड़ित को नकली कोर्टरूम दिखाया गया और एक व्यक्ति को जज की भूमिका में बैठाया गया. इस पूरे फर्जी सेटअप का उद्देश्य पीड़ित के मन में कानून और जांच एजेंसियों का इतना डर पैदा करना था कि वह आरोपियों के निर्देशों पर सवाल न उठाए.

9 दिन तक रखा डिजिटल अरेस्ट में

साइबर ठगी के इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पीड़ित को करीब 9 दिन तक डिजिटल अरेस्ट में रखा गया.

डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला ऐसा तरीका है, जिसमें पीड़ित को फोन या वीडियो कॉल पर लगातार निगरानी में रखने का दबाव बनाया जाता है. अपराधी उसे यह विश्वास दिलाते हैं कि वह किसी गंभीर कानूनी मामले में फंस चुका है और अगर उसने उनकी बात नहीं मानी तो पुलिस गिरफ्तारी या जेल जैसी कार्रवाई हो सकती है.

इसी डर का फायदा उठाकर आरोपी पीड़ित से लगातार संपर्क में रहे और उसे अपने निर्देशों के अनुसार काम करने के लिए मजबूर किया.

खातों के सत्यापन के नाम पर 63.52 लाख ट्रांसफर

आरोपियों ने पीड़ित से कहा कि उसके बैंक खातों का सत्यापन किया जाना है. इसी बहाने उससे अलग-अलग बैंक खातों में रकम ट्रांसफर कराई गई.

कुछ ही समय में पीड़ित के 63.52 लाख रुपये अलग-अलग बैंक खातों में पहुंच गए.

साइबर ठगी में यह तरीका काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. अपराधी अक्सर सीधे अपने खाते में पैसा लेने के बजाय कई अलग-अलग खातों का इस्तेमाल करते हैं. इससे रकम का वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थी तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है.

देवास पुलिस की जांच में भी बैंक ट्रांजेक्शन की कई परतें सामने आईं. पुलिस ने यह पता लगाने की कोशिश की कि पीड़ित के खाते से रकम किन खातों में गई और उसके बाद आगे किन-किन खातों में ट्रांसफर हुई.

127 दिन की जांच के बाद गिरोह का खुलासा

मामले की गंभीरता को देखते हुए देवास पुलिस ने विस्तृत जांच शुरू की. पुलिस ने करीब 127 दिन तक लगातार जांच की और बैंक ट्रांजेक्शन, मोबाइल लोकेशन तथा अन्य तकनीकी साक्ष्यों को खंगाला.

जांच के दौरान पुलिस को गिरोह से जुड़े कई महत्वपूर्ण सुराग मिले. इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए गिरोह के 12 सदस्यों को गिरफ्तार किया.

पुलिस की कार्रवाई से यह भी सामने आया कि मामला केवल एक-दो आरोपियों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा था.

70 पुलिसकर्मी और 19 टीमों ने संभाला ऑपरेशन

इस पूरे ऑपरेशन में देवास पुलिस ने बड़े स्तर पर कार्रवाई की. 70 पुलिसकर्मियों की 19 टीमें बनाई गईं.

जांच के दौरान बैंक ट्रांजेक्शन की एक-एक परत को खंगाला गया. जिन खातों में रकम पहुंची, उनके आगे के ट्रांजेक्शन की जानकारी जुटाई गई. इसके साथ ही आरोपियों के मोबाइल लोकेशन और बैंक शाखाओं से जुड़े CCTV फुटेज की भी जांच की गई.

पुलिस टीमों ने आरोपियों तक पहुंचने के लिए कई राज्यों में दबिश दी.

17 राज्यों के 33 जिलों में पहुंची पुलिस

पुलिस की जांच का दायरा काफी बड़ा था. टीमों ने राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली समेत 17 राज्यों के 33 जिलों में कार्रवाई की.

इस दौरान पुलिस टीमों ने करीब 58,315 किलोमीटर का सफर किया.

इतनी लंबी दूरी तक जांच और आरोपियों की तलाश यह संकेत देती है कि साइबर ठगी का नेटवर्क स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं था, बल्कि अलग-अलग राज्यों में फैला हुआ था.

54.84 लाख रुपये नकद समेत सामान बरामद

देवास पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों के कब्जे से 54.84 लाख रुपये नकद बरामद किए हैं. इसके अलावा चेकबुक, एटीएम कार्ड और मोबाइल फोन भी जब्त किए गए हैं.

मोबाइल फोन और बैंकिंग से जुड़े दस्तावेज इस मामले की जांच में महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकते हैं, क्योंकि इनके जरिए पुलिस गिरोह के अन्य सदस्यों और पैसों के लेन-देन की कड़ियों तक पहुंच सकती है.

नकली कोर्ट ने बनाया भरोसे का भ्रम

इस मामले में ठगों का सबसे खतरनाक तरीका था नकली कोर्ट और फर्जी जज का इस्तेमाल.

आम व्यक्ति के लिए कोर्ट, CBI, पुलिस और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे शब्द ही डर पैदा करने के लिए पर्याप्त हो सकते हैं. साइबर अपराधियों ने इसी मानसिक दबाव को अपने अपराध का हथियार बनाया.

वीडियो कॉल पर फर्जी कोर्टरूम दिखाकर पीड़ित को यह विश्वास दिलाया गया कि उसके खिलाफ वास्तविक कानूनी कार्रवाई चल रही है. इस तरह तकनीक का इस्तेमाल विश्वास पैदा करने के बजाय डर पैदा करने के लिए किया गया.

यही कारण है कि ऐसे मामलों में जागरूकता बेहद जरूरी है.

क्या है डिजिटल अरेस्ट?

डिजिटल अरेस्ट कोई वास्तविक कानूनी प्रक्रिया नहीं है. पुलिस या कोई जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को वीडियो कॉल पर कई दिनों तक अपने घर में बंद रहने या लगातार ऑनलाइन निगरानी में रहने का आदेश नहीं देती.

साइबर अपराधी अक्सर खुद को पुलिस, CBI, ED, RBI, नारकोटिक्स विभाग या टेलीकॉम अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं. इसके बाद कथित जांच, गिरफ्तारी या खाते सीज होने का भय दिखाकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करते हैं.

इस तरह के मामलों में सबसे बड़ा हथियार तकनीक नहीं, बल्कि डर और भरोसे का दुरुपयोग होता है.

अगर ऐसी कॉल आए तो क्या करें?

अगर कोई व्यक्ति फोन या वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस, CBI या किसी दूसरी सरकारी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर धमकाता है, तो घबराने की जरूरत नहीं है.

  • किसी अनजान व्यक्ति को बैंक डिटेल, OTP या पासवर्ड न दें.
  • किसी भी कथित जांच के नाम पर पैसा ट्रांसफर न करें.
  • वीडियो कॉल पर दिखाए जा रहे कोर्ट या पुलिस अधिकारी को देखकर तुरंत विश्वास न करें.
  • कॉल करने वाले के दबाव में आकर मोबाइल या बैंकिंग गतिविधियां उसके निर्देश पर न चलाएं.
  • संदिग्ध कॉल, मोबाइल नंबर, बैंक ट्रांजेक्शन और चैट के स्क्रीनशॉट सुरक्षित रखें.
  • किसी विश्वसनीय व्यक्ति को तुरंत पूरी जानकारी दें.
  • साइबर अपराध की आशंका होने पर संबंधित साइबर पुलिस या आधिकारिक साइबर अपराध शिकायत व्यवस्था से संपर्क करें.

साइबर अपराध का बदलता चेहरा

देवास का यह मामला केवल एक व्यक्ति से 63.52 लाख रुपये की ठगी का मामला नहीं है. यह बदलते साइबर अपराध की उस तस्वीर को सामने लाता है, जिसमें अपराधी तकनीक, फर्जी पहचान और मनोवैज्ञानिक दबाव को एक साथ इस्तेमाल कर रहे हैं.

पहले साइबर ठगी के मामलों में OTP, फर्जी लिंक या बैंक अधिकारी बनकर धोखाधड़ी जैसे तरीके आम थे. अब अपराधी उससे आगे बढ़ चुके हैं. वे वीडियो कॉल, नकली दस्तावेज, फर्जी सरकारी अधिकारी, नकली कोर्ट और कथित कानूनी कार्रवाई का पूरा माहौल तैयार कर रहे हैं.

इसलिए साइबर सुरक्षा अब केवल बैंकिंग जानकारी सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं रह गई है. डर के माहौल में लिया गया एक गलत फैसला भी लाखों रुपये का नुकसान करा सकता है.

निष्कर्ष

देवास पुलिस की कार्रवाई ने एक ऐसे साइबर गिरोह का खुलासा किया है, जिसने कानून और जांच एजेंसियों के नाम का डर दिखाकर एक सेवानिवृत्त व्यक्ति से 63.52 लाख रुपये ठग लिए. नकली कोर्ट, फर्जी जज, CBI अधिकारी और डिजिटल अरेस्ट जैसे हथकंडों का इस्तेमाल इस मामले को बेहद गंभीर बनाता है.

सबसे जरूरी बात यह है कि किसी भी सरकारी एजेंसी का नाम सुनकर घबराकर पैसा ट्रांसफर न करें. यदि कोई व्यक्ति वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी, कोर्ट या जांच का डर दिखाकर पैसों की मांग कर रहा है, तो यह साइबर ठगी का बड़ा संकेत हो सकता है.

साइबर अपराधियों का नेटवर्क कितना भी बड़ा क्यों न हो, जागरूकता और समय पर शिकायत के जरिए उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है. देवास पुलिस की 127 दिन की जांच और 17 राज्यों तक पहुंची कार्रवाई इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है.

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