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Toggleशिक्षा: क्या बिना ट्यूशन के भी बच्चे हासिल कर सकते हैं बेहतर परिणाम?
आज के दौर में प्रतियोगिता बढ़ने के साथ बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है. स्कूल की फीस के बाद निजी ट्यूशन, कोचिंग और अलग-अलग विषयों की अतिरिक्त कक्षाएं अभिभावकों के बजट पर दबाव डालती हैं. कई परिवारों के लिए यह खर्च मजबूरी बन चुका है.
लेकिन देश के कुछ सरकारी स्कूलों से निकलती तस्वीर इस धारणा को चुनौती देती है कि बेहतर परिणाम के लिए निजी ट्यूशन जरूरी है.
गुजरात के मेहसाणा और महाराष्ट्र के अहिल्यानगर के कुछ सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के ऐसे मॉडल पर काम किया जा रहा है, जिसमें बच्चों को निजी ट्यूशन के बजाय स्कूल में ही अतिरिक्त शैक्षणिक सहयोग दिया जाता है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि इन स्कूलों में एक्स्ट्रा क्लास, नियमित परीक्षा अभ्यास, अखबार पढ़ने, किताबों का सार लिखने, सवाल-जवाब और बोलने की गतिविधियों को पढ़ाई का हिस्सा बनाया गया है. इसका असर विद्यार्थियों के परिणाम और आत्मविश्वास में भी दिखाई देने का दावा किया गया है.
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डेढ़ महीने पहले पूरा हो जाता है कोर्स
इस मॉडल की सबसे खास बात यह है कि स्कूल में पाठ्यक्रम को परीक्षा के ठीक पहले तक खींचने के बजाय उसे समय से पहले पूरा करने पर जोर दिया गया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र के अहिल्यानगर स्थित एक सरकारी स्कूल में बोर्ड परीक्षा से लगभग डेढ़ महीने पहले पाठ्यक्रम पूरा कर लिया जाता है. इसके बाद विद्यार्थियों को रिवीजन, मॉडल पेपर और परीक्षा की तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिलता है.
आमतौर पर स्कूलों में पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद परीक्षा की तैयारी के लिए बहुत कम समय बचता है. ऐसे में बच्चों पर अंतिम समय में पढ़ाई का दबाव बढ़ जाता है.
लेकिन अगर पाठ्यक्रम पहले ही पूरा हो जाए तो विद्यार्थी एक ही विषय को दोबारा पढ़ सकते हैं, कठिन अध्यायों को समझ सकते हैं और परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों का अभ्यास कर सकते हैं.
यही रणनीति इस मॉडल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है.
हर शनिवार सवालों की क्लास
सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा करना ही इस व्यवस्था का आधार नहीं है. विद्यार्थियों की समझ को मजबूत करने के लिए नियमित अभ्यास पर भी जोर दिया गया है.
रिपोर्ट के अनुसार, हर शनिवार विद्यार्थियों के लिए सवालों की विशेष कक्षा आयोजित की जाती है. बच्चे अपनी जिज्ञासा और समस्याओं से जुड़े सवाल पूछते हैं और शिक्षक उनका जवाब देते हैं.
यह तरीका पारंपरिक ‘शिक्षक बोले और विद्यार्थी सुनें’ वाली व्यवस्था से थोड़ा अलग है.
इसमें विद्यार्थी को सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. इससे दो फायदे हो सकते हैं—पहला, शिक्षक को पता चलता है कि बच्चे को किस हिस्से में परेशानी है और दूसरा, विद्यार्थी में अपनी बात रखने का आत्मविश्वास विकसित होता है.
‘आप पूछिए, हम बताएंगे’
इस मॉडल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बच्चों के सवालों को महत्व देना है.
अगर किसी विद्यार्थी को किसी विषय का कोई हिस्सा समझ नहीं आता, तो उसे केवल परीक्षा के समय तक इंतजार नहीं करना पड़ता. नियमित सवाल-जवाब की प्रक्रिया के जरिए उसकी समस्या को समय रहते दूर करने की कोशिश की जाती है.
शिक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि सिर्फ किताब पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है. बच्चों को सवाल पूछने, चर्चा करने और अपनी समझ को व्यक्त करने का अवसर भी मिलना चाहिए.
रोज अखबार पढ़ना और किताबों का सार लिखना
इस मॉडल में सिर्फ परीक्षा के अंकों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा. विद्यार्थियों की सामान्य जानकारी, भाषा कौशल और अभिव्यक्ति क्षमता बढ़ाने के लिए भी गतिविधियां कराई जा रही हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, विद्यार्थियों को रोज अखबार पढ़ने और किताबों का सार लिखने जैसे काम दिए जाते हैं.
यह छोटी-सी गतिविधि कई स्तरों पर बच्चों के लिए उपयोगी हो सकती है.
अखबार पढ़ने से विद्यार्थी देश-दुनिया की घटनाओं से परिचित होते हैं. वहीं किसी खबर या किताब का सार अपने शब्दों में लिखने से पढ़ने और लिखने की क्षमता मजबूत होती है.
इसके अलावा विद्यार्थियों को बोलने का अभ्यास भी कराया जाता है. यानी स्कूल में पढ़ाई को केवल पाठ्यपुस्तक और परीक्षा तक सीमित रखने के बजाय उसे व्यवहारिक कौशल से जोड़ने की कोशिश की जा रही है.
‘मिशन आरंभ’ से आधुनिक कक्षाओं तक
रिपोर्ट में गुजरात के मेहसाणा जिले के एक सरकारी स्कूल का भी उल्लेख है, जहां स्कूल के स्तर पर विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण देने के लिए कई प्रयोग किए गए.
यहां ‘मिशन आरंभ’ और आधुनिक कक्षाओं जैसी पहल का जिक्र किया गया है. विद्यार्थियों के लिए सुबह के समय अतिरिक्त शैक्षणिक गतिविधियां आयोजित की जाती हैं.
इस तरह की व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों को नियमित स्कूल समय के अलावा भी सीखने का अवसर देना है.
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है—अतिरिक्त समय को केवल ट्यूशन की तरह इस्तेमाल करने के बजाय उसे स्कूल की अपनी शैक्षणिक व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया है.
कमजोर विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान
किसी भी परीक्षा परिणाम को बेहतर बनाने के लिए सिर्फ अच्छे विद्यार्थियों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होता. असली चुनौती उन बच्चों को आगे लाने की होती है, जो किसी कारण से पढ़ाई में पीछे रह जाते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, इन स्कूलों में कमजोर विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान दिया गया. शिक्षकों ने विद्यार्थियों की कठिनाइयों को समझने और उनकी कमियों को दूर करने पर काम किया.
जब कोई बच्चा किसी विषय में लगातार कमजोर रहता है, तो उसे केवल ‘कमजोर छात्र’ मान लेना समस्या का समाधान नहीं है.
जरूरत इस बात की है कि यह समझा जाए कि समस्या कहां है—क्या बच्चे को मूल अवधारणा समझ नहीं आई? क्या उसे पर्याप्त अभ्यास नहीं मिला? क्या उसे सवाल पूछने में झिझक होती है? या फिर उसकी पढ़ने-लिखने की गति अपेक्षाकृत धीमी है?
इस मॉडल में इसी तरह की कमियों पर काम करने की कोशिश दिखाई देती है.
60 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक पहुंचा परिणाम
रिपोर्ट में एक स्कूल के परिणाम का उदाहरण भी दिया गया है. बताया गया है कि लगभग तीन साल पहले कक्षा 10 का परिणाम 60 प्रतिशत था, जो बाद में 100 प्रतिशत तक पहुंच गया।
यह बदलाव निश्चित तौर पर उल्लेखनीय है.
हालांकि किसी स्कूल के परिणाम में सुधार के पीछे कई कारण हो सकते हैं. शिक्षकों की मेहनत, विद्यार्थियों की नियमित उपस्थिति, अभिभावकों का सहयोग, स्कूल का वातावरण और परीक्षा रणनीति—इन सभी का योगदान हो सकता है.
इसलिए केवल एक पहल को परिणाम का अकेला कारण मानने के बजाय इसे एक व्यापक शैक्षणिक मॉडल के हिस्से के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा.
प्राइवेट ट्यूशन नहीं, स्कूल में ही तैयारी
इस मॉडल का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि यदि स्कूल की व्यवस्था मजबूत हो, शिक्षक विद्यार्थियों पर व्यक्तिगत ध्यान दें और बच्चों को नियमित अभ्यास का अवसर मिले तो निजी ट्यूशन पर निर्भरता कम की जा सकती है.
रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित स्कूलों में विद्यार्थियों को निजी ट्यूशन लेने की अनुमति नहीं है और स्कूल में ही पढ़ाई की एक समान व्यवस्था पर जोर दिया जाता है.
इसका सीधा फायदा अभिभावकों पर पड़ने वाले आर्थिक दबाव को कम करने के रूप में देखा जा सकता है.
हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि हर बच्चे की सीखने की जरूरत अलग होती है. इसलिए किसी भी मॉडल को लागू करने से पहले स्थानीय परिस्थितियों, शिक्षक उपलब्धता और विद्यार्थियों की जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है.
सिर्फ बिल्डिंग नहीं, पढ़ाई के तरीके में बदलाव
इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल स्कूल की नई इमारत या बेहतर सुविधाएं नहीं हैं.
रिपोर्ट में एक सरकारी स्कूल के बुनियादी ढांचे में बदलाव का भी उल्लेख है. सीएसआर फंड के माध्यम से स्कूल के विकास और नई इमारत से जुड़ी जानकारी दी गई है.
लेकिन किसी स्कूल को बेहतर बनाने के लिए सिर्फ सुंदर इमारत पर्याप्त नहीं है.
एक आधुनिक स्कूल की पहचान उसकी शिक्षण पद्धति, शिक्षक-विद्यार्थी संवाद, नियमित मूल्यांकन, पुस्तकालय, खेल, तकनीक और बच्चों के मानसिक विकास से भी होती है.
यही वजह है कि इस मॉडल में भवन के साथ-साथ पढ़ाई के तरीके में बदलाव को भी महत्व दिया गया है.
क्या यह मॉडल पूरे देश में लागू हो सकता है?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है.
भारत में सरकारी स्कूलों की परिस्थितियां हर राज्य और हर जिले में अलग हैं. कहीं पर्याप्त शिक्षक हैं तो कहीं शिक्षक की कमी है। कहीं स्कूलों में स्मार्ट क्लास और प्रयोगशालाएं हैं तो कहीं बुनियादी सुविधाओं की भी चुनौती है.
ऐसे में गुजरात या महाराष्ट्र के किसी स्कूल के मॉडल को ज्यों का त्यों हर जगह लागू करना आसान नहीं होगा.
लेकिन इसके मूल सिद्धांत निश्चित रूप से दूसरे स्कूलों के लिए प्रेरणा बन सकते हैं.
इस मॉडल से क्या सीखा जा सकता है?
- पाठ्यक्रम समय से पहले पूरा करना.
- परीक्षा से पहले पर्याप्त रिवीजन का समय देना.
- हर सप्ताह प्रश्न और चर्चा की कक्षा रखना.
- कमजोर विद्यार्थियों के लिए अलग रणनीति बनाना.
- रोज पढ़ने की आदत विकसित करना.
- विद्यार्थियों से किताबों और खबरों का सार लिखवाना.
- बोलने और अपनी बात रखने का अभ्यास कराना.
- नियमित टेस्ट और मॉडल पेपर से परीक्षा की तैयारी कराना.
- अभिभावकों पर अनावश्यक ट्यूशन खर्च का दबाव कम करना.
शिक्षा का असली लक्ष्य सिर्फ नंबर नहीं
आज शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा परिणाम को सफलता का सबसे बड़ा पैमाना मान लिया गया है. निश्चित तौर पर अच्छे अंक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में नंबर हासिल करना नहीं होना चाहिए.
एक विद्यार्थी कितना बेहतर सोच सकता है, सवाल पूछ सकता है, अपनी बात स्पष्ट तरीके से रख सकता है, नई जानकारी को समझ सकता है और वास्तविक जीवन की समस्याओं का समाधान खोज सकता है—यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है.
अखबार पढ़ना, किताबों का सार लिखना, सवाल पूछना और बोलने का अभ्यास जैसी गतिविधियां इसी व्यापक शिक्षा की ओर इशारा करती हैं.
सरकारी स्कूलों के लिए बड़ा संदेश
गुजरात के मेहसाणा और महाराष्ट्र के अहिल्यानगर से सामने आया यह मॉडल सरकारी स्कूलों के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़ा करता है—क्या बेहतर शिक्षा के लिए हमेशा महंगी फीस और निजी कोचिंग जरूरी है?
इसका जवाब शायद ‘नहीं’ है.
अगर स्कूल के भीतर ही गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई, नियमित अभ्यास, व्यक्तिगत मार्गदर्शन और परीक्षा की वैज्ञानिक तैयारी उपलब्ध हो, तो विद्यार्थियों को बाहर अतिरिक्त ट्यूशन की जरूरत कम पड़ सकती है.
लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी है—मजबूत स्कूल व्यवस्था और समर्पित शिक्षक.
निष्कर्ष
शिक्षा की गुणवत्ता केवल स्कूल की दीवारों से तय नहीं होती. असली बदलाव कक्षा के अंदर होता है—जब शिक्षक बच्चे की कमजोरी पहचानता है, जब विद्यार्थी बिना डर के सवाल पूछता है, जब पाठ्यक्रम समय पर पूरा होता है और जब परीक्षा से पहले पर्याप्त अभ्यास कराया जाता है.
गुजरात और महाराष्ट्र के जिन सरकारी स्कूलों का उदाहरण सामने आया है, वह इसी दिशा में एक प्रयोग के तौर पर देखा जा सकता है.
ट्यूशन पर निर्भरता कम करने का रास्ता सिर्फ ट्यूशन बंद करना नहीं, बल्कि स्कूल को इतना सक्षम बनाना है कि बच्चे को सीखने के लिए बाहर जाने की जरूरत ही कम पड़े.
यही किसी भी मजबूत सरकारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा और सबसे बड़ी संभावना है.
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