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मध्य प्रदेश: फसल बीमा से किसानों का मोहभंग, 2 साल में 73 लाख किसानों ने छोड़ी योजना

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से किसानों का भरोसा क्यों घट रहा है? दो साल में 73 लाख किसानों के योजना से बाहर होने, कम क्लेम भुगतान और औसत नुकसान के आकलन पर जानिए पूरी कहानी

मध्य प्रदेश: फसल बीमा से किसानों का मोहभंग, 2 साल में 73 लाख किसानों ने छोड़ी योजना

किसानों को प्राकृतिक आपदाओं और फसल खराब होने से होने वाले आर्थिक नुकसान से सुरक्षा देने के उद्देश्य से शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना अब सवालों के घेरे में है. योजना का उद्देश्य किसानों को कम प्रीमियम पर फसल का बीमा उपलब्ध कराना और बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि, चक्रवात जैसी आपदाओं से होने वाले नुकसान की भरपाई करना है.

लेकिन आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में किसान अब इस योजना से दूरी बना रहे हैं. अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो वर्षों में करीब 73 लाख किसानों ने फसल बीमा योजना छोड़ दी है. यानी किसानों के एक बड़े वर्ग का इस योजना से भरोसा कम होता दिखाई दे रहा है.

सवाल यह है कि आखिर जिस योजना को किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा कवच माना गया था, उससे किसान बाहर क्यों हो रहे हैं?

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प्रीमियम देने के बावजूद क्लेम को लेकर असमंजस

फसल बीमा योजना में किसान को अपनी फसल के लिए एक निश्चित प्रीमियम देना होता है. इसके बदले प्राकृतिक आपदा या फसल खराब होने की स्थिति में बीमा कंपनी से मुआवजा मिलने की उम्मीद रहती है.

लेकिन किसानों की सबसे बड़ी शिकायत क्लेम के आकलन और भुगतान की प्रक्रिया को लेकर सामने आती है.

रिपोर्ट के मुताबिक, किसानों का आरोप है कि वास्तविक नुकसान के मुकाबले उन्हें मिलने वाला मुआवजा कई बार काफी कम होता है. यही वजह है कि किसान यह सवाल पूछने लगे हैं कि जब नुकसान की स्थिति में पर्याप्त राहत नहीं मिलती, तो हर साल प्रीमियम भरने का फायदा क्या है?

योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि कितने किसानों ने बीमा कराया. असली सवाल यह है कि नुकसान के समय किसान को कितनी जल्दी और कितनी पर्याप्त आर्थिक मदद मिलती है.

चार साल के आंकड़े क्या बताते हैं?

रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में बीमित किसानों की संख्या में लगातार कमी दिखाई देती है.

वर्ष बीमित किसान बीमित क्षेत्र प्रीमियम क्लेम
2023 2.40 करोड़ 314 लाख हेक्टेयर ₹20,409 करोड़ ₹13,277 करोड़
2024 2.47 करोड़ 310 लाख हेक्टेयर ₹18,903 करोड़ ₹8,750 करोड़
2025 2.01 करोड़ 249 लाख हेक्टेयर ₹12,834 करोड़ ₹8,061 करोड़
2026* 1.74 करोड़ 205.52 लाख हेक्टेयर ₹7,547.15 करोड़

*2026 के आंकड़े रिपोर्ट में उपलब्ध स्थिति के अनुसार हैं.

इन आंकड़ों से साफ संकेत मिलता है कि कुछ वर्षों में योजना के तहत बीमित किसानों और बीमित क्षेत्र दोनों में गिरावट आई है.

विशेष रूप से 2023 से 2026 के बीच बीमित किसानों की संख्या 2.40 करोड़ से घटकर 1.74 करोड़ रह गई। यानी लगभग 66 लाख की कमी दिखाई देती है. वहीं रिपोर्ट का शीर्षक पिछले दो वर्षों में करीब 73 लाख किसानों के योजना से बाहर होने की बात कहता है.

यह अंतर अलग-अलग वर्षों और आंकड़ों की गणना पद्धति के कारण हो सकता है, इसलिए दोनों आंकड़ों को एक ही आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए. लेकिन व्यापक तस्वीर यह बताती है कि फसल बीमा योजना में किसानों की भागीदारी घट रही है.

महाराष्ट्र का आंकड़ा सबसे ज्यादा चौंकाने वाला

रिपोर्ट में महाराष्ट्र का आंकड़ा विशेष रूप से ध्यान खींचता है.

महाराष्ट्र में पिछले दो वर्षों में करीब 36.83 लाख किसान फसल बीमा योजना से बाहर हुए. इसके अलावा राजस्थान में लगभग 6.79 लाख, मध्य प्रदेश में 6.15 लाख, ओडिशा में 4.31 लाख और असम में 2.18 लाख किसानों के योजना से बाहर होने का उल्लेख किया गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, इन राज्यों में भाजपा या एनडीए से जुड़ी सरकारें हैं. हालांकि किसानों के योजना से बाहर होने के पीछे केवल राजनीतिक कारण मान लेना उचित नहीं होगा. इसके पीछे योजना की संरचना, प्रीमियम, क्लेम प्रक्रिया, नुकसान का आकलन और किसानों के अनुभव जैसे कई आर्थिक और प्रशासनिक कारण हो सकते हैं.

सबसे बड़ा सवाल: नुकसान का आकलन कैसे होता है?

फसल खराब होने के बाद किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है—उसे कितने नुकसान का मुआवजा मिलेगा?

रिपोर्ट में कृषि बीमा विशेषज्ञ कमलजी सहाय के हवाले से बताया गया है कि क्लेम सेटलमेंट की प्रक्रिया में देरी होती है और कई मामलों में नुकसान का आकलन औसत के आधार पर किया जाता है.

यही व्यवस्था किसानों के लिए बड़ी परेशानी पैदा कर सकती है.

मान लीजिए किसी किसान के खेत में फसल का 80 या 100 प्रतिशत नुकसान हो गया, लेकिन पूरे क्षेत्र का औसत नुकसान 40 प्रतिशत निकला.  ऐसी स्थिति में किसान को अपने वास्तविक नुकसान के बराबर मुआवजा मिलना मुश्किल हो सकता है.

यानी किसान के खेत में नुकसान 100 प्रतिशत हो सकता है, लेकिन मुआवजा तय करने का आधार स्थानीय या क्षेत्रीय औसत बन जाए तो किसान को अपेक्षा से कम भुगतान मिल सकता है.

सैटेलाइट से आकलन, लेकिन सवाल बरकरार

आज फसल नुकसान का आकलन करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, फसल नुकसान के आकलन में सैटेलाइट आधारित तकनीक का भी उपयोग किया जाता है.

इसका उद्देश्य नुकसान का अधिक वैज्ञानिक और पारदर्शी मूल्यांकन करना है. लेकिन तकनीक के इस्तेमाल के बावजूद यदि किसान को अपने वास्तविक नुकसान के अनुरूप मुआवजा नहीं मिलता, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आकलन की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है.

विशेषज्ञों के मुताबिक, केवल सैटेलाइट से नुकसान का अनुमान लगाने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों, खेत की स्थिति और वास्तविक नुकसान को भी पर्याप्त महत्व दिया जाना जरूरी है.

क्लेम मिलने में देरी भी बड़ी समस्या

किसान के लिए फसल खराब होना केवल कृषि नुकसान नहीं है. उसकी पूरी आर्थिक व्यवस्था फसल पर निर्भर हो सकती है.

फसल खराब होने के बाद उसे अगली फसल के लिए बीज खरीदना होता है, खाद और कृषि उपकरणों का इंतजाम करना होता है. कई किसानों पर बैंक या साहूकार का कर्ज भी होता है.

ऐसे में यदि बीमा क्लेम लंबे समय तक अटका रहे, तो बीमा का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है.

रिपोर्ट में भी क्लेम सेटलमेंट में देरी को किसानों की प्रमुख शिकायतों में शामिल किया गया है.

यही कारण है कि किसानों के लिए तेज, पारदर्शी और वास्तविक नुकसान पर आधारित क्लेम प्रक्रिया बेहद जरूरी है.

प्रीमियम और मुआवजे का गणित भी समझना होगा

रिपोर्ट में सरकार द्वारा फसल बीमा योजना पर किए गए खर्च और किसानों द्वारा दिए गए प्रीमियम का भी उल्लेख है.

2019-20 से 2024-25 के बीच लगभग ₹1.03 लाख करोड़ का फसल बीमा किए जाने के बदले किसानों को लगभग ₹19,463 करोड़ के प्रीमियम का भुगतान करना पड़ा. रिपोर्ट में सरकार और किसानों के हिस्से के प्रीमियम का भी उल्लेख किया गया है.

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—बीमा व्यवस्था में प्रीमियम और क्लेम की राशि की सीधी तुलना हमेशा पूरी तस्वीर नहीं बताती. बीमा का उद्देश्य केवल उस साल जमा हुए प्रीमियम के बदले उसी साल भुगतान करना नहीं होता.

लेकिन किसानों के नजरिए से सवाल बिल्कुल अलग है.

वे जानना चाहते हैं कि जब प्राकृतिक आपदा आती है और उनकी पूरी फसल बर्बाद हो जाती है, तब उन्हें कितना, कब और किस आधार पर मुआवजा मिलेगा.

किसान क्यों छोड़ रहे हैं योजना?

किसानों के योजना से बाहर होने के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं—

पहला, क्लेम में देरी.
अगर नुकसान के महीनों बाद मुआवजा मिलता है, तो किसान की तत्काल आर्थिक जरूरत पूरी नहीं होती.

दूसरा, वास्तविक नुकसान और मुआवजे में अंतर.
किसान को लगता है कि उसके खेत में जितना नुकसान हुआ, उसके मुकाबले भुगतान काफी कम है.

तीसरा, औसत आधारित आकलन.
क्षेत्र का औसत नुकसान और किसी किसान के खेत का वास्तविक नुकसान अलग-अलग हो सकता है.

चौथा, प्रक्रिया की जटिलता.
किसान को शिकायत, सर्वे और क्लेम से जुड़ी प्रक्रियाओं में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.

पांचवां, भरोसे की कमी.
एक बार यदि किसान को लगता है कि मुश्किल समय में बीमा उसके काम नहीं आया, तो अगले सीजन में योजना से जुड़ने की उसकी इच्छा कम हो सकती है.

योजना को बचाने के लिए क्या जरूरी है?

फसल बीमा योजना को किसानों के लिए प्रभावी बनाने के लिए सबसे पहले क्लेम सेटलमेंट की प्रक्रिया को तेज करना होगा.

इसके साथ ही नुकसान का आकलन खेत और किसान के वास्तविक नुकसान के आधार पर करने की व्यवस्था को मजबूत करना होगा.

किसानों को यह भी स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि उनका क्लेम किस आधार पर तय किया गया, कितना नुकसान दर्ज हुआ और मुआवजे की राशि कैसे निर्धारित हुई.

तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना अच्छी बात है, लेकिन तकनीक के साथ जवाबदेही और पारदर्शिता भी जरूरी है.

किसान के लिए बीमा केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि उसकी पूरी आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा विषय है.

क्या फसल बीमा को फिर से भरोसेमंद बनाया जा सकता है?

इसका जवाब है—हां, लेकिन इसके लिए योजना को किसान के नजरिए से देखना होगा.

यदि किसान को प्रीमियम देने के बाद यह भरोसा हो कि प्राकृतिक आपदा आने पर उसका नुकसान निष्पक्ष तरीके से दर्ज होगा, क्लेम जल्दी मिलेगा और भुगतान वास्तविक नुकसान के अनुरूप होगा, तो योजना की उपयोगिता बढ़ सकती है.

लेकिन यदि किसान को बार-बार यह महसूस होता रहा कि प्रीमियम तो समय पर देना है, मगर नुकसान होने पर क्लेम के लिए लंबी प्रक्रिया और अनिश्चितता का सामना करना पड़ेगा, तो योजना से दूरी बढ़ना स्वाभाविक है.

निष्कर्ष: बीमा का मतलब सिर्फ पॉलिसी नहीं, भरोसा भी है

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से आर्थिक सुरक्षा देने के उद्देश्य से शुरू हुई थी. लेकिन हालिया आंकड़ों में किसानों की घटती भागीदारी इस बात का संकेत देती है कि योजना की जमीनी प्रभावशीलता पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.

73 लाख किसानों का दो वर्षों में योजना से बाहर होना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है. यह किसानों के भरोसे से जुड़ा सवाल है.

सरकार, बीमा कंपनियों और प्रशासन के सामने चुनौती यही है कि फसल बीमा को कागजों की योजना से आगे बढ़ाकर ऐसा सुरक्षा कवच बनाया जाए, जिस पर किसान संकट की घड़ी में वास्तव में भरोसा कर सके.

क्योंकि किसान के लिए फसल सिर्फ खेत में खड़ी फसल नहीं होती—उसमें उसका कर्ज, परिवार, अगली फसल की उम्मीद और पूरे साल की मेहनत जुड़ी होती है.

इसलिए जब फसल बर्बाद होती है, तो उसे सिर्फ मुआवजा नहीं चाहिए। उसे चाहिए समय पर न्यायसंगत मदद और यह भरोसा कि उसकी मेहनत पूरी तरह अकेली नहीं है.

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