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ToggleGen Z: Gen Z और 2029 की राजनीति, युवा वोट पर क्यों है सबकी नजर?
कल्पना कीजिए एक ऐसी पीढ़ी की, जो किसी राजनीतिक पार्टी का झंडा उठाने से पहले उसके वादों को इंटरनेट पर खोजती है. जो नेताओं के भाषण सुनती जरूर है, लेकिन साथ ही पूछती है—पेपर लीक क्यों हुआ? भर्ती समय पर क्यों नहीं हुई? नौकरी कहां है? और शिक्षा के बाद अवसर क्यों नहीं मिल रहे?
यही है भारत की नई युवा पीढ़ी—Gen Z.
आज का युवा सिर्फ वोटर नहीं है. वह सोशल मीडिया पर राय बनाने वाला, सरकार से सवाल पूछने वाला और जरूरत पड़ने पर सड़क पर उतरने वाला नागरिक भी है. यही कारण है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले युवाओं का मुद्दा सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता जा रहा है.
एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी युवाओं को AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, स्पेस टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के जरिए भारत को नई ऊंचाई पर ले जाने का विजन देते हैं.
दूसरी तरफ राहुल गांधी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के बीच जाकर बेरोजगारी, पेपर लीक, आर्थिक असमानता और रोजगार जैसे सवालों को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं.
तो सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि युवा किसके साथ जाएगा?
बड़ा सवाल यह है कि युवा आखिर चाहता क्या है?
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भारत की Gen Z इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है. 18 से 27 साल की उम्र के लाखों युवा आने वाले वर्षों में पहली बार या शुरुआती दौर में मतदान करेंगे.
इस पीढ़ी का व्यवहार पिछली पीढ़ियों से काफी अलग है. यह इंटरनेट के दौर में बड़ी हुई है. इसके लिए सूचना का सबसे बड़ा स्रोत सिर्फ अखबार या टेलीविजन नहीं, बल्कि YouTube, Instagram, X और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म भी हैं.
यह पीढ़ी किसी नेता के भाषण को केवल सुनती नहीं है, बल्कि उसे तुरंत गूगल भी करती है.
किसी योजना का दावा किया गया तो युवा उसका आंकड़ा खोज सकता है. किसी भर्ती की घोषणा हुई तो वह पुराने भर्ती कैलेंडर से उसकी तुलना कर सकता है. परीक्षा में गड़बड़ी हुई तो कुछ ही घंटों में उसकी जानकारी देशभर में फैल सकती है.
यही डिजिटल ताकत युवा को एक अलग तरह का राजनीतिक प्रभाव देती है.
युवा राजनीति का केंद्र क्यों बन गया?
राजनीति में युवाओं की अहमियत केवल उनकी संख्या की वजह से नहीं है.
एक बेरोजगार युवा की समस्या सिर्फ उसकी व्यक्तिगत समस्या नहीं रहती. उसका असर परिवार पर पड़ता है. उसके माता-पिता की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है. शादी, घर, करियर और भविष्य जैसे फैसले प्रभावित होते हैं.
यानी रोजगार का सवाल धीरे-धीरे सामाजिक और राजनीतिक सवाल बन जाता है.
यही वजह है कि रोजगार, भर्ती परीक्षा, पेपर लीक, शिक्षा की गुणवत्ता और कौशल विकास जैसे मुद्दे अब चुनावी राजनीति के महत्वपूर्ण हिस्से बन चुके हैं.
मोदी का मॉडल: युवा बने ‘प्रॉब्लम सॉल्वर’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से युवाओं को भारत के भविष्य का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बताते रहे हैं.
उनके भाषणों में AI, सेमीकंडक्टर, क्वांटम टेक्नोलॉजी, स्पेस, स्टार्टअप और इनोवेशन जैसे विषय प्रमुखता से दिखाई देते हैं.
यह दृष्टिकोण एक ऐसे भारत की तस्वीर पेश करता है जो टेक्नोलॉजी के जरिए दुनिया में नेतृत्व करना चाहता है.
यह निश्चित रूप से महत्वाकांक्षी विजन है.
लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा होता है.
अगर देश के युवाओं से विश्वस्तरीय रिसर्च और इनोवेशन की उम्मीद है, तो क्या उन्हें वैसा ही रिसर्च इकोसिस्टम भी मिल रहा है?
भारत में R&D पर होने वाला खर्च विकसित देशों की तुलना में अभी भी कम है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत अपने युवाओं की प्रतिभा का पूरी तरह इस्तेमाल कर पा रहा है?
युवा सिर्फ भाषणों से वैज्ञानिक नहीं बनेगा. उसके लिए बेहतर विश्वविद्यालय, आधुनिक प्रयोगशालाएं, पर्याप्त फंडिंग, उद्योग और अकादमिक संस्थानों के बीच सहयोग तथा लंबे समय की नीति चाहिए.
दूसरी तरफ राहुल गांधी का ‘युवा असंतोष’ मॉडल
विपक्षी नेता राहुल गांधी ने युवाओं के एक अलग वर्ग पर ज्यादा फोकस किया है—प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाला युवा.
यह वह वर्ग है जो सरकारी नौकरी को स्थिर और सम्मानजनक करियर के रूप में देखता है.
कई छात्र वर्षों तक UPSC, SSC, रेलवे, बैंकिंग, पुलिस, शिक्षक भर्ती और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं.
समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब परीक्षा में देरी हो, भर्ती प्रक्रिया लंबी चले या पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आएं.
एक छात्र के लिए इसका मतलब सिर्फ एक परीक्षा का नुकसान नहीं है.
इसका मतलब है—एक और साल की तैयारी.
एक और साल का खर्च.
एक और साल परिवार पर निर्भरता.
और सबसे बड़ी बात—भविष्य को लेकर बढ़ती अनिश्चितता.
यही वह दर्द है जिसे विपक्ष राजनीतिक मुद्दे में बदलने की कोशिश करता है.
पेपर लीक: युवा असंतोष का सबसे बड़ा प्रतीक
भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर सबसे बड़ी चिंताओं में पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता शामिल है.
जब कोई छात्र महीनों या वर्षों तक पढ़ाई करता है और परीक्षा से ठीक पहले पेपर लीक की खबर सामने आती है, तो उसका भरोसा केवल परीक्षा व्यवस्था से नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था से कमजोर होता है.
यहां सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पेपर लीक किसने किया.
सवाल यह भी है कि सिस्टम में ऐसी कमजोरी क्यों थी कि पेपर लीक हो सका?
जिम्मेदारी किसकी थी?
जांच कितनी तेजी से हुई?
दोषियों को कितनी जल्दी सजा मिली?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या अगली परीक्षा के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई गई जिससे वही घटना दोबारा न हो?
युवा इन सवालों के जवाब चाहता है.
बेरोजगारी का आंकड़ा क्या कहता है?
युवाओं की राजनीति को समझने के लिए भावनाओं के साथ आंकड़ों को देखना भी जरूरी है.
भारत सरकार के Periodic Labour Force Survey यानी PLFS में युवाओं की रोजगार स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण आंकड़े सामने आते रहे हैं.
वहीं International Labour Organization की India Employment Report ने भी भारत में युवा बेरोजगारी और शिक्षित युवाओं की रोजगार संबंधी चुनौतियों को रेखांकित किया है.
ILO की रिपोर्ट के अनुसार भारत के कुल बेरोजगारों में युवाओं की हिस्सेदारी बहुत अधिक है. रिपोर्ट ने यह भी दिखाया कि बेरोजगारी का बोझ शिक्षित युवाओं में खास तौर पर गंभीर है.
इसका मतलब यह है कि समस्या सिर्फ ‘नौकरी नहीं है’ तक सीमित नहीं है.
समस्या यह भी है कि शिक्षा और रोजगार के बीच का अंतर बढ़ रहा है.
एक युवा डिग्री हासिल करता है, प्रतियोगी परीक्षा देता है, कौशल सीखता है, लेकिन फिर भी उसे अपनी योग्यता और उम्मीद के अनुरूप अवसर नहीं मिलता.
यही निराशा धीरे-धीरे राजनीतिक असंतोष में बदल सकती है.
1974 से आज तक: युवा आंदोलन क्यों महत्वपूर्ण रहे हैं?
भारत के राजनीतिक इतिहास में छात्र आंदोलनों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
1974 का गुजरात और बिहार छात्र आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है. छात्र आंदोलन से शुरू हुई राजनीतिक हलचल आगे चलकर व्यापक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन में बदल गई.
इस दौर ने भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया.
इससे एक बात साफ होती है—जब युवाओं की नाराजगी किसी बड़े मुद्दे से जुड़ती है, तो उसका असर सिर्फ कैंपस तक सीमित नहीं रहता.
आज परिस्थितियां अलग हैं.
तब आंदोलन के लिए सड़क और संगठन जरूरी थे.
आज एक वीडियो, एक पोस्ट या एक वायरल हैशटैग भी हजारों-लाखों लोगों तक कुछ ही समय में पहुंच सकता है.
इसलिए डिजिटल दौर का युवा आंदोलन कहीं ज्यादा तेज गति से आकार ले सकता है.
लेकिन क्या पूरा Gen Z एक जैसा सोचता है?
यहां सावधानी जरूरी है.
भारत का युवा कोई एकसमान राजनीतिक समूह नहीं है.
एक ग्रामीण युवा की प्राथमिकता अलग हो सकती है.
एक महानगर में रहने वाले युवा की प्राथमिकता अलग हो सकती है.
किसी के लिए सरकारी नौकरी सबसे बड़ा लक्ष्य है तो कोई स्टार्टअप करना चाहता है.
किसी के लिए महंगाई बड़ा मुद्दा है तो किसी के लिए शिक्षा.
किसी के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा महत्वपूर्ण है तो किसी के लिए स्थानीय रोजगार.
इसलिए यह मान लेना गलत होगा कि पूरी Gen Z किसी एक पार्टी या विचारधारा के साथ जाएगी.
लेकिन एक बात जरूर समान दिखाई देती है—युवा अब सवाल पूछना चाहता है.
2029 से पहले राजनीतिक पार्टियों के सामने असली चुनौती
आने वाले चुनावों में राजनीतिक पार्टियों के सामने चुनौती सिर्फ युवाओं को आकर्षित करने की नहीं होगी.
चुनौती होगी—उनके भरोसे को बनाए रखने की.
युवा घोषणापत्र में सिर्फ बड़ी-बड़ी योजनाएं नहीं देखेगा.
वह पूछेगा—
भर्ती कब होगी?
परीक्षा कब होगी?
रिजल्ट कब आएगा?
नौकरी कितनी मिलेगी?
पेपर लीक रोकने की व्यवस्था क्या है?
कॉलेज से निकलने के बाद रोजगार का रास्ता क्या है?
स्टार्टअप के लिए फंडिंग कितनी उपलब्ध है?
रिसर्च पर कितना खर्च किया जा रहा है?
और सबसे महत्वपूर्ण—सरकार अपने वादों को पूरा कैसे करेगी?
यानी आने वाले वर्षों में युवा राजनीति सिर्फ भावनाओं की राजनीति नहीं, बल्कि परफॉर्मेंस की राजनीति को भी प्रभावित कर सकती है.
युवा सिर्फ नौकरी नहीं, भरोसा चाहता है
युवा रोजगार चाहता है, लेकिन केवल रोजगार ही उसकी पूरी मांग नहीं है.
वह एक ऐसी व्यवस्था चाहता है जिसमें मेहनत का परिणाम दिखाई दे.
अगर वह परीक्षा देता है तो उसे भरोसा हो कि परीक्षा निष्पक्ष होगी.
अगर वह डिग्री हासिल करता है तो उसे उम्मीद हो कि उसकी योग्यता के अनुसार अवसर मिलेंगे.
अगर वह स्टार्टअप शुरू करता है तो उसे ऐसा माहौल मिले जहां नियम स्पष्ट हों.
अगर वह रिसर्च करना चाहता है तो उसे संसाधन और संस्थागत समर्थन मिले.
और अगर सरकार से सवाल करता है तो उसे जवाब मिले.
यही लोकतंत्र की बुनियादी अपेक्षा है.
असली सवाल: जिम्मेदार कौन?
अब उस सवाल पर लौटते हैं जिससे पूरी बहस शुरू हुई थी—युवाओं के इस दर्द का जिम्मेदार कौन है?
इसका जवाब किसी एक पार्टी, एक सरकार या एक नेता के नाम में तलाशना आसान होगा, लेकिन समस्या उससे कहीं बड़ी है.
रोजगार की समस्या कई दशकों से चली आ रही आर्थिक और संरचनात्मक चुनौतियों से जुड़ी है.
शिक्षा और उद्योग के बीच अंतर, कौशल की कमी, पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण नौकरियों का न बनना, भर्ती प्रक्रिया में देरी और परीक्षा व्यवस्था की कमजोरियां—इन सभी की भूमिका है.
इसलिए समाधान भी सिर्फ राजनीतिक बयान से नहीं आएगा.
इसके लिए शिक्षा से लेकर रोजगार तक पूरी व्यवस्था में सुधार की जरूरत होगी.
2029 का युवा क्या पूछेगा?
2029 अभी दूर दिखाई देता है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए उसकी तैयारी आज से शुरू हो चुकी है.
क्योंकि आज का युवा कल का मतदाता है.
और यह मतदाता पहले से ज्यादा डिजिटल, ज्यादा जागरूक और ज्यादा सवाल करने वाला है.
वह किसी पार्टी का समर्थन कर सकता है.
किसी नेता से प्रभावित भी हो सकता है.
लेकिन अब उसके पास सवाल पूछने और जवाब खोजने के पहले से कहीं ज्यादा साधन हैं.
इसलिए आने वाले समय की राजनीति में शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होगा कि कौन सबसे अच्छा भाषण देता है?
बल्कि यह होगा—
कौन युवा को बेहतर भविष्य देने का भरोसा सबसे विश्वसनीय तरीके से साबित कर सकता है?
भारत की युवा आबादी देश की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है.
लेकिन इसके लिए उसे सिर्फ ‘देश का भविष्य’ कह देना पर्याप्त नहीं है.
उसे वर्तमान में अवसर देना होगा.
बेहतर शिक्षा देनी होगी.
पारदर्शी परीक्षाएं करानी होंगी.
समय पर भर्तियां करनी होंगी.
रिसर्च और इनोवेशन में निवेश बढ़ाना होगा.
और सबसे जरूरी—युवा और सरकार के बीच भरोसे का रिश्ता मजबूत करना होगा.
क्योंकि जिस दिन युवा यह मान ले कि उसकी मेहनत का मूल्य है, उसकी आवाज सुनी जाती है और उसकी योग्यता के लिए अवसर मौजूद हैं, उसी दिन भारत की युवा शक्ति वास्तव में उसकी सबसे बड़ी आर्थिक और राजनीतिक ताकत बन सकती है.
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