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पेट्रोल-डीजल: कच्चा तेल सस्ता, फिर भी पेट्रोल-डीजल महंगा क्यों? जानिए पूरा सच

पेट्रोल-डीजल के दाम क्यों नहीं घट रहे? जानिए पूरा सच.

पेट्रोल-डीजल: कच्चा तेल सस्ता, फिर भी पेट्रोल-डीजल महंगा क्यों? जानिए पूरा सच

भारत में जब भी पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर हर परिवार की जेब पर पड़ता है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा होता है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लगातार सस्ता हो रहा हो और इसके बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल के दाम जस के तस बने रहें.

हाल ही में सामने आए आंकड़ों ने इस बहस को और तेज कर दिया है. जानकारी के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत घटकर लगभग 68.69 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है, जो पिछले कई महीनों का निचला स्तर माना जा रहा है. इसके बावजूद देश में आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बड़ी राहत नहीं मिली.

दूसरी ओर, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के मुनाफे में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब कंपनियां बेहतर कमाई कर रही हैं और कच्चा तेल भी सस्ता है, तो आखिर उपभोक्ताओं तक इसका लाभ क्यों नहीं पहुंच रहा?

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कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट

कुछ समय पहले तक वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई थीं. रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन की समस्याओं के कारण तेल महंगा हो गया था.

लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं.

  • ब्रेंट क्रूड लगभग 68.69 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच चुका है.
  • यह पिछले छह महीनों का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है.
  • अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग और आपूर्ति के संतुलन ने कीमतों को नीचे लाने में बड़ी भूमिका निभाई है.

सामान्य तौर पर ऐसी स्थिति में पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी कम होनी चाहिए थीं, लेकिन भारत में ऐसा देखने को नहीं मिला.

तेल कंपनियों का बढ़ता मुनाफा

सरकारी तेल कंपनियों के वित्तीय परिणाम बताते हैं कि उनका लाभ पिछले वर्ष की तुलना में काफी बढ़ा है.

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार—

कंपनी 2025-26 (करोड़ रु.) 2024-25 (करोड़ रु.) वृद्धि
इंडियन ऑयल (IOCL) 15,176 8,398 80.7%
भारत पेट्रोलियम (BPCL) 3,214 2,509 28.1%
हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) 6,060 3,413 77.6%
कुल 24,450 14,320 70.7%

यानी तीनों प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों के संयुक्त मुनाफे में लगभग 71 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई.

क्या कंपनियां प्रति लीटर अधिक कमा रही हैं?

रिपोर्ट्स के अनुसार, मौजूदा समय में तेल कंपनियां—

  • पेट्रोल पर लगभग 10.5 रुपये प्रति लीटर
  • डीजल पर लगभग 11 रुपये प्रति लीटर

तक का सकल मार्जिन अर्जित कर रही हैं.

हालांकि यह समझना जरूरी है कि यह पूरा पैसा शुद्ध लाभ नहीं होता. इसमें रिफाइनिंग, परिवहन, विपणन, परिचालन खर्च और अन्य लागतें भी शामिल होती हैं.

फिर भी यह साफ संकेत है कि कंपनियों की वित्तीय स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हुई है.

सरकार पेट्रोल सस्ता क्यों नहीं करती?

यह सबसे बड़ा सवाल है.

असल में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं. इनके पीछे कई अन्य कारक भी होते हैं.

1. भारी टैक्स

भारत में पेट्रोल और डीजल पर केंद्र और राज्य सरकारें विभिन्न प्रकार के कर लगाती हैं.

इनमें शामिल हैं—

  • एक्साइज ड्यूटी
  • वैट (VAT)
  • सेस
  • अन्य स्थानीय कर

कई राज्यों में टैक्स का हिस्सा पेट्रोल की कीमत का बड़ा भाग होता है.

2. रुपये की कमजोरी

कच्चा तेल डॉलर में खरीदा जाता है.

यदि भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो सस्ता कच्चा तेल भी आयात करने में अधिक लागत आती है.

यानी केवल क्रूड सस्ता होने से पूरी कीमत कम नहीं हो जाती.

3. भविष्य की खरीद (Future Contracts)

तेल कंपनियां हमेशा आज की कीमत पर तेल नहीं खरीदतीं.

कई बार पहले से किए गए आयात अनुबंधों के कारण उन्हें पुराने और महंगे दामों पर तेल खरीदना पड़ता है.

इसका असर भी खुदरा कीमतों पर पड़ता है.

4. पुराने घाटे की भरपाई

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल बहुत महंगा था, तब कई बार कंपनियों ने उपभोक्ताओं पर पूरा बोझ नहीं डाला.

ऐसे में उनका दावा रहता है कि वर्तमान मुनाफा पहले हुए घाटे की भरपाई में भी इस्तेमाल हो रहा है.

क्या पहले भी ऐसा हुआ है?

यह पहली बार नहीं है.

वर्ष 2018

जब कच्चा तेल लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल था, तब दिल्ली में पेट्रोल करीब 72 रुपये प्रति लीटर बिक रहा था.

वर्ष 2020

कोरोना महामारी के दौरान कच्चा तेल लगभग 43 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गया, लेकिन पेट्रोल की कीमतों में उसी अनुपात में कमी नहीं आई.

वर्ष 2022

रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान तेल लगभग 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया और पेट्रोल-डीजल के दामों में तेजी से वृद्धि हुई.

यानी जब तेल महंगा होता है तो खुदरा कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, लेकिन जब तेल सस्ता होता है तो कीमतें उसी गति से नीचे नहीं आतीं. यही कारण है कि आम जनता के बीच असंतोष बढ़ता है.

आम जनता पर क्या असर पड़ रहा है?

पेट्रोल और डीजल केवल वाहन चलाने का ईंधन नहीं हैं.

इनकी कीमत बढ़ने से—

  • माल ढुलाई महंगी होती है.
  • सब्जियां और फल महंगे होते हैं.
  • परिवहन खर्च बढ़ता है.
  • खेती की लागत बढ़ती है.
  • उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है.
  • महंगाई पर व्यापक असर पड़ता है.

यानी पेट्रोल-डीजल की कीमतों का प्रभाव हर घर तक पहुंचता है.

क्या तेल कंपनियां पूरी तरह दोषी हैं?

इस सवाल का जवाब सीधा नहीं है.

विशेषज्ञों का मानना है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें तय करने में केवल तेल कंपनियां ही जिम्मेदार नहीं होतीं.

इसमें शामिल होते हैं—

  • अंतरराष्ट्रीय बाजार
  • सरकार की कर नीति
  • रुपये की स्थिति
  • आयात लागत
  • रिफाइनिंग खर्च
  • परिवहन
  • विपणन लागत

इसलिए किसी एक पक्ष को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा.

क्या भविष्य में पेट्रोल सस्ता हो सकता है?

यदि—

  • अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक सस्ता बना रहता है,
  • डॉलर के मुकाबले रुपया स्थिर रहता है,
  • सरकार टैक्स में राहत देती है,
  • और तेल कंपनियां लागत का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचाती हैं,

तो आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी संभव है.

हालांकि फिलहाल इसकी कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं है.

क्या सरकार को टैक्स कम करना चाहिए?

यह विषय आर्थिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है.

एक ओर सरकार को टैक्स से बड़ी आय प्राप्त होती है, जिससे सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य विकास कार्यों के लिए धन उपलब्ध होता है.

दूसरी ओर लगातार ऊंची ईंधन कीमतें आम नागरिकों और छोटे व्यवसायों पर आर्थिक दबाव बढ़ाती हैं.

ऐसे में विशेषज्ञ समय-समय पर टैक्स संरचना की समीक्षा और पारदर्शी मूल्य निर्धारण प्रणाली की मांग करते रहे हैं.

आर्थिक विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक कम बनी रहती हैं, तो उसका कुछ लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचना चाहिए.

साथ ही, मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने से जनता का विश्वास भी मजबूत हो सकता है.

निष्कर्ष

कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और तेल कंपनियों के बढ़ते मुनाफे ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि आखिर आम जनता को राहत कब मिलेगी. यह सच है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि टैक्स, आयात लागत, विनिमय दर और अन्य आर्थिक कारकों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है.

फिर भी, जब वैश्विक बाजार में कीमतें लगातार नीचे हों और कंपनियों की वित्तीय स्थिति मजबूत हो रही हो, तब आम नागरिकों की यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि ईंधन की कीमतों में भी कुछ राहत दिखाई दे. आने वाले समय में सरकार, तेल कंपनियों और वैश्विक बाजार की दिशा ही तय करेगी कि उपभोक्ताओं को वास्तविक लाभ कब और कितना मिल पाता है.

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