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ToggleShahdol: मेडिकल कॉलेज में स्ट्रेचर नहीं, चादर पर मरीज पहुंचा वार्ड
Shahdol: शहडोल जिले के बिरसा मुंडा मेडिकल कॉलेज की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है. अस्पताल में इलाज के लिए पहुंची एक बुजुर्ग महिला को समय पर स्ट्रेचर नहीं मिल सका. मजबूरी में परिजनों ने चादर का सहारा लेकर मरीज को डॉक्टर के पास पहुंचाया और फिर वार्ड तक ले गए. इस घटना का वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद अस्पताल प्रबंधन की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं.
हैरानी की बात यह है कि यह घटना ऐसे समय में सामने आई है, जब मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावे किए जाते रहे हैं. इसके बावजूद मरीजों को आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.
स्ट्रेचर नहीं मिला, चादर बनी सहारा.
जानकारी के अनुसार ग्राम कुदरी, वार्ड क्रमांक-11 की पंच सावित्री कुशवाहा अपनी सास का इलाज कराने बिरसा मुंडा मेडिकल कॉलेज पहुंची थीं. उनकी सास कमर की हड्डी की गंभीर समस्या से पीड़ित थीं और चलने-फिरने की स्थिति में नहीं थीं.
परिजनों ने अस्पताल परिसर में काफी देर तक स्ट्रेचर की तलाश की. उन्होंने कर्मचारियों से भी सहायता मांगी, लेकिन समय पर कोई स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं कराया गया. काफी इंतजार के बाद भी व्यवस्था नहीं बनने पर परिवार के लोगों ने चादर का सहारा लिया और उसी के माध्यम से मरीज को उठाकर डॉक्टर के पास पहुंचाया. इसके बाद इसी तरह मरीज को वार्ड तक ले जाया गया.
जनप्रतिनिधि को भी झेलनी पड़ी परेशानी.
इस मामले की सबसे अहम बात यह रही कि मरीज के साथ मौजूद सावित्री कुशवाहा स्वयं ग्राम पंचायत की निर्वाचित पंच हैं. वे अपने क्षेत्र की समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने के लिए सक्रिय रहती हैं.
इसके बावजूद जब उन्हें अपने ही परिवार के सदस्य का इलाज कराना पड़ा, तब अस्पताल में उन्हें मूलभूत सुविधा तक नहीं मिली. इससे यह सवाल और गहरा हो गया कि यदि जनप्रतिनिधि को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, तो आम मरीजों और उनके परिजनों की परेशानी कितनी गंभीर होगी.
70 करोड़ की स्वीकृति के बावजूद सवाल.
बिरसा मुंडा मेडिकल कॉलेज की स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने और सुविधाओं के विस्तार के लिए सरकार द्वारा करोड़ों रुपये की योजनाओं की घोषणा की जा चुकी है. बताया जाता है कि मेडिकल कॉलेज के विकास के लिए लगभग 70 करोड़ रुपये की राशि भी स्वीकृत की गई है.
इसके बावजूद यदि मरीजों को स्ट्रेचर जैसी सामान्य सुविधा भी समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रही है, तो यह अस्पताल की कार्यप्रणाली और संसाधन प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
स्वास्थ्य व्यवस्था पर फिर उठे सवाल.
यह पहला मौका नहीं है जब मेडिकल कॉलेज की व्यवस्थाओं पर सवाल उठे हों. इससे पहले भी अस्पताल में संसाधनों की कमी, मरीजों की परेशानी और व्यवस्थागत खामियों को लेकर कई शिकायतें सामने आ चुकी हैं.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी अस्पताल में स्ट्रेचर, व्हीलचेयर और अन्य आपातकालीन सुविधाएं हर समय उपलब्ध रहनी चाहिए. इनकी कमी मरीज की स्थिति को और गंभीर बना सकती है.
परिजनों ने जताई नाराजगी.
मरीज के परिजनों का कहना है कि अस्पताल पहुंचने के बाद उन्होंने कर्मचारियों से कई बार मदद मांगी, लेकिन समय पर कोई व्यवस्था नहीं की गई. मजबूरी में उन्हें स्वयं मरीज को चादर के सहारे उठाकर ले जाना पड़ा.
परिजनों का कहना है कि यदि अस्पताल में पर्याप्त संख्या में स्ट्रेचर उपलब्ध होते या उनका सही प्रबंधन किया जाता, तो उन्हें इस तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता.
प्रबंधन से उठ रहे जवाबदेही के सवाल.
घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं. लोगों का कहना है कि मेडिकल कॉलेज जैसे बड़े सरकारी अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं का अभाव चिंताजनक है.
स्थानीय लोगों का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए केवल बजट स्वीकृत करना पर्याप्त नहीं है. जरूरी यह भी है कि सुविधाएं मरीजों तक समय पर पहुंचें और संसाधनों का सही उपयोग हो.
अब लोगों की नजर प्रशासन पर.
इस घटना के सामने आने के बाद अब लोगों की नजर जिला प्रशासन और मेडिकल कॉलेज प्रबंधन की प्रतिक्रिया पर है. उम्मीद की जा रही है कि मामले की जांच कर यह स्पष्ट किया जाएगा कि मरीज को समय पर स्ट्रेचर क्यों नहीं मिला और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए क्या कदम उठाए जाएंगे.
स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर बेहतर व्यवस्था और जवाबदेही से ही संभव है. शहडोल मेडिकल कॉलेज की यह घटना एक बार फिर यह याद दिलाती है कि मरीजों को सम्मानजनक और समय पर इलाज उपलब्ध कराना किसी भी स्वास्थ्य संस्थान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है.
रिपोर्ट: कृष्णा तिवारी
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