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झारखंड: झारखंड में छात्र आंदोलन का असर, दो और परीक्षाएं रद्द

झारखंड में छात्र आंदोलन के दबाव के बीच 2 और परीक्षाएं रद्द। पेपर लीक और भर्ती प्रक्रिया पर उठे सवालों के बीच छात्रों ने निष्पक्ष जांच की मांग तेज कर दी है

झारखंड: झारखंड में छात्र आंदोलन का असर, दो और परीक्षाएं रद्द

झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर चल रहा छात्र आंदोलन अब बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बन चुका है. लंबे समय से परीक्षा में कथित गड़बड़ी, पेपर लीक और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों के दबाव के बीच दो और परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला सामने आया है. इस फैसले के बाद राज्य में प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रिया, सरकारी भर्ती व्यवस्था और छात्रों के भविष्य को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.

छात्रों का कहना है कि सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले हजारों अभ्यर्थी वर्षों तक मेहनत करते हैं. परीक्षा की तारीख आने के बाद यदि पेपर लीक या किसी दूसरी गड़बड़ी के कारण परीक्षा रद्द हो जाती है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान छात्रों को ही उठाना पड़ता है. वहीं सरकार और परीक्षा कराने वाली एजेंसियों के सामने चुनौती यह है कि भर्ती प्रक्रिया को इस तरह पारदर्शी और सुरक्षित बनाया जाए, जिससे भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न हो.

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25 जुलाई से जारी है छात्रों का आंदोलन

झारखंड में भर्ती परीक्षाओं की जांच सीबीआई से कराने और स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर छात्र आंदोलन 25 जुलाई से जारी है. आंदोलन कर रहे अभ्यर्थी लगातार सरकार से परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच कराने की मांग कर रहे हैं.

छात्रों का आरोप है कि भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी के कारण मेहनत करने वाले अभ्यर्थियों का भविष्य प्रभावित हो रहा है. कई छात्र ऐसे हैं जो लंबे समय से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. उम्र निकलने का दबाव, आर्थिक कठिनाइयां और बार-बार परीक्षा प्रक्रिया में बदलाव उनकी परेशानी को और बढ़ा रहे हैं.

इसी बीच आंदोलन ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है. विधानसभा से लेकर सड़क तक इस मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगा जा रहा है.

JPSC की परीक्षाओं को लेकर बड़ा फैसला

रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC की परीक्षाओं को लेकर सरकार ने बड़ा फैसला लिया है. 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा यानी PT के साथ वर्ष 2023 और 2025 में JPSC द्वारा आयोजित कुछ बैकलॉग परीक्षाओं को रद्द करने की बात सामने आई है.

सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि 11वीं और 13वीं JPSC परीक्षा तथा अन्य संबंधित परीक्षाओं की जांच कराई जाएगी। जांच के बाद आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी.

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि JPSC की परीक्षाएं राज्य की सबसे महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल हैं. इन परीक्षाओं के जरिए राज्य प्रशासन में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां की जाती हैं. ऐसे में परीक्षा रद्द होने का सीधा असर उन हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ता है, जिन्होंने महीनों और वर्षों तक इसकी तैयारी की है.

2022 के पेपर लीक मामले में गिरफ्तारी

छात्र आंदोलन के बीच पुलिस को वर्ष 2022 की एक भर्ती परीक्षा के कथित पेपर लीक मामले में कार्रवाई में सफलता मिली है. रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड कर्मचारी चयन आयोग यानी JSSC की 2022 की एक्साइज कॉन्स्टेबल भर्ती परीक्षा के पेपर लीक मामले में पुलिस ने कुछ आरोपियों को गिरफ्तार किया है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि परीक्षा कराने वाली एजेंसी एडसिल बिजनेस टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड के एक पूर्व अधिकारी सहित कंपनी से जुड़े लोगों पर कार्रवाई की गई है. पुलिस ने कंपनी के मैनेजर और कुछ पूर्व उम्मीदवारों को भी गिरफ्तार किया है.

बताया गया कि यह परीक्षा 1,279 पदों के लिए आयोजित की जानी थी और परीक्षा से पहले ही पेपर लीक होने का मामला सामने आया था.

यह घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा का पेपर लीक होना केवल एक परीक्षा की समस्या नहीं है. इसका असर पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर पड़ता है. जिन अभ्यर्थियों ने ईमानदारी से परीक्षा की तैयारी की, उनके लिए यह स्थिति बेहद निराशाजनक होती है.

सवाल सिर्फ परीक्षा रद्द होने का नहीं है

परीक्षा रद्द करना किसी भी गड़बड़ी की स्थिति में एक जरूरी कदम हो सकता है, लेकिन छात्रों का सवाल इससे आगे का है.

छात्र पूछ रहे हैं कि अगर परीक्षा में गड़बड़ी होती है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? पेपर लीक परीक्षा केंद्र तक पहुंचने से पहले कैसे हुआ? परीक्षा कराने वाली एजेंसी की निगरानी किसने की? और सबसे बड़ा सवाल—क्या जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों के खिलाफ समय पर कार्रवाई होगी?

क्योंकि परीक्षा रद्द होने के बाद दोबारा परीक्षा कराने की जिम्मेदारी तो सरकार और आयोग की होती है, लेकिन इसकी कीमत छात्रों को चुकानी पड़ती है.

एक अभ्यर्थी के लिए दोबारा परीक्षा का मतलब केवल एक और परीक्षा देना नहीं है. इसका मतलब है फिर से वही सिलेबस पढ़ना, फिर से परीक्षा शुल्क और यात्रा का खर्च उठाना और कई बार महीनों तक परिणाम का इंतजार करना.

आंदोलन के दौरान बढ़ा टकराव

झारखंड में जारी छात्र आंदोलन के बीच राजनीतिक गतिविधियां भी तेज हुई हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार को भाजपा ने राज्यभर में बंद का आयोजन किया. पार्टी कार्यकर्ताओं ने भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी के खिलाफ प्रदर्शन किया और सरकार से जवाब मांगा.

प्रदर्शन के दौरान विधानसभा की ओर बढ़ रहे भाजपा कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने की बात भी सामने आई. इसके बाद राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई.

भाजपा की ओर से सरकार पर आरोप लगाया गया कि वह भर्ती प्रक्रिया में युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है. वहीं सरकार की ओर से इस पूरे मामले में जांच और कार्रवाई की बात कही जा रही है.

यानी परीक्षा का मुद्दा अब सिर्फ छात्रों और आयोग के बीच नहीं रह गया है. यह राज्य की राजनीति का भी बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है.

भूख हड़ताल के 10वें दिन देवेंद्र नाथ महतो की चिट्ठी

इसी आंदोलन के बीच छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो की भूख हड़ताल भी चर्चा में रही. रिपोर्ट के मुताबिक, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी के खिलाफ आंदोलन के दौरान घायल छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए.

उन्होंने एक पत्र के माध्यम से कहा कि 10 अगस्त को विधानसभा घेराव के दौरान पुलिस ने बर्बरता से पीटा. उन्होंने दावा किया कि लाठीचार्ज में छात्रों की आवाज दबाई नहीं जा सकती और जब तक छात्रों को न्याय नहीं मिलता, उनका भूख हड़ताल का आंदोलन जारी रहेगा.

रिपोर्ट के अनुसार, देवेंद्र नाथ महतो का इलाज अस्पताल में चल रहा है. उन्होंने अपने पत्र में कहा कि उनका शरीर अस्पताल में उपचाराधीन है, लेकिन न्याय के लिए उनका संघर्ष और संकल्प अडिग है.

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि आंदोलन में शामिल छात्रों की मांग अब केवल परीक्षा रद्द करने या दोबारा परीक्षा कराने तक सीमित नहीं दिखाई दे रही है. छात्र भर्ती परीक्षाओं की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं.

सरकार के सामने दोहरी चुनौती

झारखंड सरकार के सामने इस समय दो बड़ी चुनौतियां हैं. पहली चुनौती उन परीक्षाओं को निष्पक्ष तरीके से दोबारा कराना है, जिनमें गड़बड़ी की शिकायतें सामने आई हैं. दूसरी चुनौती छात्रों के बीच भरोसा कायम करना है.

अगर कोई परीक्षा रद्द होती है तो सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अगली बार परीक्षा प्रक्रिया में ऐसी कोई खामी न रहे. परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा, प्रश्नपत्र की गोपनीयता, डिजिटल सिस्टम, परीक्षा एजेंसी की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी होगा.

सिर्फ परीक्षा रद्द करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा. जरूरत इस बात की है कि पूरी भर्ती प्रक्रिया में जवाबदेही तय हो.

छात्रों के लिए क्या मायने रखता है यह फैसला?

सरकार के इस फैसले से उन छात्रों को एक तरफ राहत मिल सकती है, जो लंबे समय से परीक्षा प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी की जांच की मांग कर रहे थे. लेकिन दूसरी तरफ उन अभ्यर्थियों की चिंता भी बढ़ सकती है, जिन्होंने पहले से परीक्षा की तैयारी की थी और अब दोबारा तैयारी करनी पड़ेगी.

कई प्रतियोगी छात्रों के लिए उम्र सबसे बड़ी चुनौती होती है. एक परीक्षा का आयोजन टलने या रद्द होने का मतलब उनके लिए कई महीने या कभी-कभी पूरा एक साल पीछे जाना हो सकता है.

इसलिए छात्रों की मांग सिर्फ यह नहीं है कि परीक्षा दोबारा हो. वे चाहते हैं कि अगली परीक्षा ऐसी व्यवस्था के तहत हो, जिसमें उन्हें भरोसा हो कि उनकी मेहनत सुरक्षित है और चयन प्रक्रिया निष्पक्ष होगी.

क्या परीक्षा रद्द करना समाधान है?

यह सवाल भी बेहद महत्वपूर्ण है कि क्या हर बार पेपर लीक या परीक्षा में गड़बड़ी की शिकायत सामने आने पर परीक्षा रद्द कर देना ही समाधान है?

एक तरफ, अगर परीक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हों तो परीक्षा रद्द करना जरूरी हो सकता है. लेकिन दूसरी तरफ बार-बार परीक्षा रद्द होने से ईमानदारी से तैयारी करने वाले छात्रों का नुकसान होता है.

इसलिए स्थायी समाधान परीक्षा के बाद कार्रवाई से ज्यादा परीक्षा से पहले की व्यवस्था को मजबूत करना है. प्रश्नपत्र की सुरक्षा, परीक्षा एजेंसी की जिम्मेदारी, कर्मचारियों का सत्यापन, डिजिटल निगरानी और शिकायतों की तत्काल जांच जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना होगा.

साथ ही यदि पेपर लीक या भर्ती में किसी प्रकार की अनियमितता साबित होती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जिससे भविष्य में कोई भी परीक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ करने से पहले कई बार सोचे.

अब आगे क्या?

झारखंड में छात्रों का आंदोलन फिलहाल पूरी तरह खत्म होता दिखाई नहीं दे रहा है. छात्रों की मांग है कि भर्ती परीक्षाओं की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो. दूसरी ओर सरकार और संबंधित एजेंसियों के सामने चुनौती है कि वह छात्रों को भरोसा दिलाएं कि भविष्य में भर्ती परीक्षाएं पारदर्शी तरीके से आयोजित होंगी.

दो परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला आंदोलन कर रहे छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम जरूर है, लेकिन असली परीक्षा अब सरकार की है. क्या वह सिर्फ परीक्षाएं रद्द करके मामला शांत करेगी या फिर उस पूरी व्यवस्था को दुरुस्त करेगी, जिसके कारण बार-बार पेपर लीक और परीक्षा विवाद सामने आते हैं?

क्योंकि बात सिर्फ एक परीक्षा की नहीं है. बात उन लाखों युवाओं की है, जो सरकारी नौकरी की उम्मीद में अपनी जिंदगी के कई साल किताबों के साथ गुजार देते हैं. उनके लिए परीक्षा सिर्फ प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका नहीं होती. उसमें परिवार की उम्मीद, आर्थिक संघर्ष और भविष्य के सपने जुड़े होते हैं.

इसलिए भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता बचाना सिर्फ सरकार या आयोग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी है.

और झारखंड का मौजूदा छात्र आंदोलन इसी सवाल को सामने रख रहा है—अगर मेहनत करने वाले छात्रों को ही अपनी परीक्षा और अपने भविष्य की निष्पक्षता के लिए सड़क पर उतरना पड़े, तो फिर भर्ती व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम होगा?

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