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Toggleमध्यप्रदेश: कागजों पर सक्रिय या जमीन पर? मप्र के 94% NGOs का डिजिटल रिकॉर्ड गायब!
मध्य प्रदेश में सामाजिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनकल्याण के नाम पर काम कर रहे गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा खुलासा सामने आया है. प्रदेश में जमीनी स्तर पर सक्रिय दावों के बीच यह बात उजागर हुई है कि राज्य के पंजीकृत करीब डेढ़ लाख एनजीओ में से अधिकांश का कोई डिजिटल वजूद ही नहीं मिल रहा है.
केंद्र सरकार के नीति आयोग द्वारा संचालित ‘एनजीओ दर्पण’ (NGO Darpan) पोर्टल के आंकड़ों से पता चला है कि मध्य प्रदेश के कुल NGOs में से सिर्फ 8,148 संस्थाओं ने ही अब तक इस पोर्टल पर अपना रजिस्ट्रेशन और डिजिटल वेरिफिकेशन कराया है. इसका सीधा और हैरान करने वाला मतलब यह है कि 94 प्रतिशत से ज्यादा एनजीओ अब भी केंद्र सरकार की डिजिटल वेरिफिकेशन व्यवस्था से पूरी तरह बाहर चल रहे हैं.
इस स्थिति ने प्रशासनिक हलकों से लेकर सामाजिक क्षेत्रों तक कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आखिर ये संस्थाएं सामने आने से क्यों कतरा रही हैं?
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क्या है नीति आयोग का ‘दर्पण पोर्टल’?
डिजिटल पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए केंद्र सरकार ने ‘एनजीओ दर्पण’ पोर्टल की शुरुआत की है. यह नीति आयोग का एक राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो देश के सभी गैर-सरकारी संगठनों को एक छत के नीचे लाता है.
दर्पण पोर्टल की मुख्य विशेषताएं:
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यूनिक आईडी (Unique ID): पोर्टल पर सफलतापूर्वक रजिस्ट्रेशन करने के बाद हर संस्था को एक विशिष्ट पहचान संख्या (Unique ID) मिलती है.
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अनिवार्य पहचान: किसी भी सरकारी फंडिंग, अनुदान, या केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत काम पाने के लिए यह दर्पण आईडी अब एक अनिवार्य दस्तावेज बन चुकी है。
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वित्तीय और प्रशासनिक रिकॉर्ड: इस पोर्टल पर संबंधित एनजीओ को अपनी प्रशासनिक और वित्तीय जानकारियां दर्ज करनी होती हैं.
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विभागीय समन्वय: देश के सभी मंत्रालय और सरकारी विभाग इसी पोर्टल के डेटाबेस का उपयोग कर संस्थाओं की साख की जांच करते हैं.
सबसे खास बात यह है कि दर्पण पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन की यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से ऑनलाइन और निःशुल्क (Free of Cost) है. इसके बावजूद 94% संस्थाओं का इससे दूरी बनाना कई संदेह पैदा करता है.
कागजों पर सक्रिय या जमीन पर? क्यों जरूरी था वेरिफिकेशन?
यदि ये डेढ़ लाख संस्थाएं खुद को दर्पण पोर्टल पर रजिस्टर करा लेतीं, तो सरकारी एजेंसियों और आम जनता के पास कई महत्वपूर्ण सवालों के स्पष्ट जवाब होते:
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वास्तविक स्थिति का पता चलना: यह साफ हो पाता कि इनमें से कितनी संस्थाएं वास्तव में जमीन पर सक्रिय हैं और कितनी सिर्फ कागजों पर चल रही हैं.
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फंडिंग का स्रोत: किस संस्था को कहां से, किस माध्यम से और कितना फंड मिल रहा है, इसका पारदर्शिता के साथ पता चलता.
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धन का सदुपयोग: जनता और दाताओं से मिला पैसा किस काम में और कहाँ खर्च हो रहा है, इसका पूरा ट्रैक रिकॉर्ड उपलब्ध रहता.
डिजिटल रिकॉर्ड न होने से अब यह आशंका गहरा गई है कि कई संस्थाएं केवल सरकारी अनुदान हड़पने या टैक्स बचाने के उद्देश्य से कागजों पर खड़ी की गई हो सकती हैं.
बिना दर्पण आईडी के नहीं मिलेगा ‘सरकारी फंड’
केंद्र सरकार ने अब एनजीओ के लिए वित्तीय नियमों को बेहद कड़ा कर दिया है. यदि मध्य प्रदेश की ये गैर-पंजीकृत संस्थाएं भविष्य में सरकारी मदद की उम्मीद कर रही हैं, तो उनके लिए रास्ते बंद हो चुके हैं.
नियमों का शिकंजा: केंद्र सरकार ने सरकारी अनुदान (Government Grants), टेंडर, सरकारी परियोजनाओं और किसी भी प्रकार की वित्तीय प्रक्रिया का हिस्सा बनने के लिए ‘दर्पण आईडी’ को पूरी तरह अनिवार्य कर दिया है. इसके बिना किसी भी संस्था को सरकारी योजनाओं और प्रोजेक्ट्स के लिए पात्र (Eligible) नहीं माना जाएगा.
मध्य प्रदेश की कई संस्थाएं सांसद-विधायक निधि, कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड, विदेशी संस्थाओं और अन्य कल्याणकारी सरकारी योजनाओं से आर्थिक सहायता प्राप्त करती आई हैं. लेकिन अब बिना डिजिटल रिकॉर्ड के यह पता लगाना मुश्किल है कि इन अपंजीकृत संस्थाओं को फंडिंग कहाँ से मिल रही है.
अपंजीकृत NGOs पर मंडरा रहा है बड़ा खतरा!
बैंकिंग सेक्टर और वित्तीय विनियामकों (Regulators) द्वारा अपने ‘नो योर कस्टमर’ (KYC) नियमों को सख्त करने के बाद अब इन अपंजीकृत संस्थाओं की मुश्किलें और अधिक बढ़ने वाली हैं.
वित्तीय और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई भी एनजीओ खुद को केंद्र सरकार के डिजिटल रिकॉर्ड (दर्पण पोर्टल) में दर्ज नहीं कराता है, तो आने वाले समय में उसके खिलाफ निम्नलिखित बड़ी कार्रवाइयां हो सकती हैं:
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बैंक खाते हो सकते हैं फ्रीज: बिना डिजिटल सत्यापन के संस्थाओं के बैंक खातों के संचालन पर रोक लगाई जा सकती है.
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वित्तीय लेनदेन पर सवाल: संस्था द्वारा किए जाने वाले किसी भी प्रकार के वित्तीय लेनदेन और डोनेशन को संदिग्ध माना जा सकता है और वे जांच के दायरे में आ सकते हैं.
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मान्यताओं पर संकट: सीएसआर (CSR) फंडिंग, विदेशी फंडिंग के लिए जरूरी एफसीआरए (FCRA) क्लीयरेंस और आयकर अधिनियम की धारा 12A व 80G जैसी महत्वपूर्ण टैक्स छूट वाली मान्यताएं भी खतरे में पड़ सकती हैं.
निष्कर्ष: पारदर्शिता ही एकमात्र विकल्प
मध्य प्रदेश की यह स्थिति देश के सामाजिक क्षेत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है. गैर-सरकारी संगठन समाज के विकास और अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति की मदद के लिए एक सेतु का काम करते हैं. लेकिन इस पवित्र काम में पारदर्शिता और ईमानदारी का होना पहली शर्त है.
जब पोर्टल पूरी तरह ऑनलाइन, सुलभ और पूरी तरह से मुफ्त है, तो संस्थाओं को आगे बढ़कर अपना रजिस्ट्रेशन कराना चाहिए. जो संस्थाएं ऐसा करने से बच रही हैं, उन्हें यह समझना होगा कि अब डिजिटल युग में जवाबदेही से बचना मुमकिन नहीं है. सरकार को भी इन अपंजीकृत संस्थाओं की स्क्रूटनी तेज करनी चाहिए ताकि जो वास्तव में नेक नीयत से काम कर रहे हैं, उनकी साख बची रहे और कागजी संस्थाओं पर नकेल कसी जा सके.
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