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AI: माइक्रोसॉफ्ट से उबर तक… क्यों बिगड़ रहा है टेक कंपनियों का बजट?

एआई से कमाई की उम्मीद थी, लेकिन अब वही टेक कंपनियों पर बन रहा है सबसे बड़ा खर्च!

AI: माइक्रोसॉफ्ट से उबर तक… क्यों बिगड़ रहा है टेक कंपनियों का बजट?

दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां पिछले दो वर्षों से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को भविष्य की सबसे बड़ी ताकत बताती रही हैं. दावा किया गया कि एआई कंपनियों की लागत कम करेगा, कर्मचारियों की जरूरत घटाएगा और काम की गति कई गुना बढ़ा देगा.

इसी उम्मीद में माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, अमेजन, मेटा और उबर जैसी कंपनियों ने एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर अरबों डॉलर झोंक दिए. हजारों कर्मचारियों को एआई टूल्स दिए गए, नई तकनीकों पर रिसर्च शुरू हुई और निवेशकों ने भी इस सेक्टर में रिकॉर्ड पैसा लगाया.

लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है. जिन एआई टूल्स से कंपनियों को खर्च कम होने की उम्मीद थी, वही टूल अब उनके बजट पर भारी पड़ने लगे हैं. कई कंपनियों के एआई बिल इतने तेजी से बढ़े कि उन्हें अपने फैसले वापस लेने पड़े.

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माइक्रोसॉफ्ट को सबसे बड़ा झटका

दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने एआई स्टार्टअप एंथ्रोपिक में करीब 48 हजार करोड़ रुपए का निवेश किया. कंपनी ने अपने लगभग एक लाख इंजीनियरों को ‘क्लॉड कोड’ जैसे एडवांस एआई टूल्स का एक्सेस भी दिया.

उम्मीद थी कि इंजीनियर पहले से ज्यादा तेजी से कोड लिखेंगे और कंपनी की उत्पादकता बढ़ेगी. शुरुआत में ऐसा होता भी दिखाई दिया. लेकिन जल्द ही असली समस्या सामने आई—हर इस्तेमाल पर भारी लागत.

इन एआई टूल्स का मॉडल “पे पर यूज” यानी जितना इस्तेमाल, उतना भुगतान पर आधारित था. इंजीनियरों द्वारा लगातार कोडिंग, टेस्टिंग और डेटा प्रोसेसिंग के कारण कंपनी का खर्च तेजी से बढ़ने लगा.

स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि माइक्रोसॉफ्ट को जून तक कई लाइसेंस बंद करने पड़े. इसके बाद कंपनी ने अपने कर्मचारियों को बाहरी एआई टूल्स की जगह इन-हाउस यानी खुद के विकसित एआई प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट करना शुरू कर दिया.

उबर का सालभर का बजट 4 महीने में खत्म

कैब सेवा देने वाली वैश्विक कंपनी उबर ने दिसंबर 2025 में लगभग 5 हजार इंजीनियरों को क्लॉड कोड एआई सिस्टम उपलब्ध कराया.

शुरुआत में यह प्रयोग बेहद सफल माना गया. कंपनी के 84 प्रतिशत डेवलपर्स ने एआई का उपयोग शुरू कर दिया और करीब 70 प्रतिशत कोड एआई की मदद से तैयार होने लगा.

लेकिन सफलता के साथ खर्च भी विस्फोटक तरीके से बढ़ा. कई इंजीनियर हर महीने 47 हजार रुपए से लेकर 1.9 लाख रुपए तक का व्यक्तिगत एआई बिल बना रहे थे.

रिपोर्ट्स के मुताबिक एक सीटीओ ने केवल दो घंटे के डेमो के दौरान करीब 1.1 लाख रुपए खर्च कर दिए.

नतीजा यह हुआ कि अप्रैल आते-आते उबर का पूरा 2026 एआई बजट खत्म हो गया. यानी जिस बजट को पूरे साल चलना था, वह केवल चार महीनों में समाप्त हो गया.

एनवीडिया ने भी मानी बढ़ती लागत

दुनिया की सबसे बड़ी एआई चिप निर्माता कंपनी एनवीडिया ने भी स्वीकार किया कि एआई कंप्यूटिंग की लागत अब कई मामलों में कर्मचारियों की सैलरी से ज्यादा हो रही है.

दरअसल, साधारण चैटबॉट या बेसिक एआई सिस्टम अब सस्ते हो चुके हैं, लेकिन हाई-लेवल कोडिंग और जटिल कार्यों के लिए इस्तेमाल होने वाले प्रीमियम एआई मॉडल बेहद महंगे हैं.

एआई कंपनियां लगातार अपने मॉडल्स को अपग्रेड कर रही हैं. इससे कंप्यूटिंग पावर, डेटा सेंटर और ऊर्जा की मांग बढ़ रही है. इसका सीधा असर लागत पर पड़ रहा है.

ओपनएआई और एंथ्रोपिक ने बढ़ाए दाम

एआई सेक्टर में तेजी से बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच कंपनियां अपने मॉडल्स की कीमतें भी बढ़ा रही हैं.

ओपनएआई ने हाल ही में अपने नए मॉडल को पहले से लगभग दोगुनी कीमत पर लॉन्च किया. वहीं एंथ्रोपिक ने टेक्स्ट काउंटिंग का तरीका बदल दिया, जिससे ग्राहकों का बिल पहले से ज्यादा आने लगा.

यानी कंपनियों को अब केवल एआई खरीदने का नहीं, बल्कि उसे लगातार चलाने और अपग्रेड करने का भी भारी खर्च उठाना पड़ रहा है.

क्या एआई बबल फूटने वाला है?

लगातार बढ़ती लागत के बीच अब टेक इंडस्ट्री में “एआई बबल” की चर्चा भी तेज हो गई है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि कंपनियां जरूरत से ज्यादा निवेश कर रही हैं और भविष्य में यह आर्थिक दबाव बन सकता है.

हालांकि दुनिया के बड़े उद्योगपति इससे सहमत नहीं हैं.

अमेजन के संस्थापक Jeff Bezos ने कहा कि एआई संकट नहीं बल्कि “सदी का सबसे बड़ा अवसर” है.

वहीं Masayoshi Son लगभग 9.5 लाख करोड़ रुपए का नया एआई फंड “प्रोजेक्ट इजा नागी” लॉन्च करने की तैयारी में हैं. उनका मानना है कि आने वाले वर्षों में आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस इंसानी दिमाग से 10 गुना ज्यादा स्मार्ट हो सकता है.

एआई पर रिकॉर्ड निवेश

भले ही लागत बढ़ रही हो, लेकिन एआई में निवेश की रफ्तार कम नहीं हुई है.

माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, मेटा और अमेजन इस साल एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर रिकॉर्ड 69 लाख करोड़ रुपए खर्च कर रहे हैं.

रिसर्च फर्म गार्टनर के अनुसार वैश्विक एआई खर्च जल्द ही 240 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है.

माइक्रोसॉफ्ट का एआई बिजनेस लगभग 3.53 लाख करोड़ रुपए के अनुमानित रन रेट पर पहुंच चुका है, जबकि गूगल का क्लाउड बैकलॉग 43.93 लाख करोड़ रुपए पार कर गया है.

एंथ्रोपिक ने इस साल दो बड़े फंडिंग राउंड में करीब 2.86 लाख करोड़ रुपए जुटाए हैं, जिससे कंपनी की वैल्यूएशन 86 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई है.

भारत में भी एआई निवेश तेजी से बढ़ रहा है. Reliance Industries अगले सात वर्षों में भारत के एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगभग 10 लाख करोड़ रुपए निवेश करने की योजना बना रही है.

ट्रम्प प्रशासन और एआई कानून विवाद

अमेरिका में एआई को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस भी तेज हो चुकी है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump एक ऐसे सरकारी आदेश पर हस्ताक्षर करने वाले थे, जिसके तहत सरकार को किसी भी शक्तिशाली एआई मॉडल की लॉन्चिंग से पहले 90 दिनों तक सुरक्षा जांच का अधिकार मिलता.

इस फैसले के लिए कई बड़े टेक अधिकारी वॉशिंगटन पहुंचे थे. लेकिन अंतिम समय में ट्रम्प के पूर्व सलाहकार डेविड साक्स ने हस्तक्षेप किया. उनका तर्क था कि कड़े नियमों से अमेरिका की एआई रेस धीमी पड़ जाएगी और चीन को फायदा मिल सकता है.

बताया जा रहा है कि एलन मस्क और मार्क जुकरबर्ग जैसे दिग्गजों ने भी इसी तरह का दबाव बनाया. इसके बाद यह प्रस्ताव रद्द कर दिया गया.

इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां अब सरकारों की नीतियों को भी प्रभावित करने लगी हैं.

एआई का भविष्य: अवसर या खतरा?

आज पूरी दुनिया एआई को लेकर दो हिस्सों में बंटी दिखाई दे रही है.

एक पक्ष मानता है कि एआई भविष्य की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति है, जो स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन और उद्योगों को पूरी तरह बदल देगी.

दूसरा पक्ष चेतावनी दे रहा है कि बिना नियंत्रण के एआई आर्थिक असमानता, नौकरी संकट और कॉर्पोरेट निर्भरता को बढ़ा सकता है.

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कंपनियां एआई से उतना मुनाफा कमा पाएंगी, जितना वे उस पर खर्च कर रही हैं?

फिलहाल इतना तय है कि एआई की यह दौड़ केवल तकनीक की नहीं, बल्कि आर्थिक ताकत और वैश्विक नियंत्रण की लड़ाई बन चुकी है.

निष्कर्ष

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने टेक दुनिया में नई संभावनाएं जरूर पैदा की हैं, लेकिन इसकी वास्तविक लागत अब कंपनियों को चौंका रही है. माइक्रोसॉफ्ट, उबर और एनवीडिया जैसी दिग्गज कंपनियों के अनुभव यह दिखाते हैं कि एआई केवल सुविधा नहीं, बल्कि बेहद महंगा निवेश भी बन सकता है.

आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि एआई कंपनियों के लिए “सोने की खान” साबित होता है या “महंगा सपना”.

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